मंगलवार, 18 दिसंबर 2018

आधुनिक विज्ञान ने भी माना कि भारत की देव भाषा संस्कृत मनुष्य के बुद्धिमत्ता और स्मरण शक्ति पर गहरा प्रभाव डालता है। अंग्रेज़ी का मोह छॊड़िये और संस्कृत पढ़िये।



आधुनिक विज्ञान ने भी माना कि भारत की देव भाषा संस्कृत मनुष्य के बुद्धिमत्ता और स्मरण शक्ति पर गहरा प्रभाव डालता है। अंग्रेज़ी का मोह छॊड़िये और संस्कृत पढ़िये।

                             वामपंथियों ने भारत के जन मानस में एक विचारधारा को जबरन डाल दिया है। वह यह है कि अंग्रेज़ी महान भाषा है और हमारे अपने ही धरती की संस्कृत भाषा अवैज्ञानिक और वार्तालाप के यॊग्य नहीं है। पिछले सात दशकों से हमें यही सिखाया गया है कि अंग्रेज़ी भाषा सीखना हमारे लिए कितना अवश्यक है। लेकिन दुनिया में हो रहे अनुसंधान संस्कृत को महान भाषा मान रही है। संस्कृत हमारे बुद्धिमत्ता और स्मरण शक्ती पर गहरा प्रभाव डालता इसे अब दुनिया के वैज्ञानिक भी मानते हैं।
                             न्यूरोसांयटिस्ट जेम्स हार्टज़ेल ने अनुसंधान द्वारा पता लगाया है कि किस प्रकार संस्कृत के श्लॊक व मंत्र के पठण करने से हमारे मस्तिश्क पर उसका प्रभाव पड़ता है। उन्होंने 21 व्यावसायिक रूप से योग्य संस्कृत पंडितों का अध्ययन किया और पाया कि वैदिक मंत्रों को याद रखने से संज्ञानात्मक कार्य से जुड़े मस्तिष्क क्षेत्रों का आकार बढ़ जाता है, जिसमें लघु और दीर्घकालिक स्मृति शामिल है। भारतीय परंपरा में मान्यता है कि मंत्रों को याद रखना और पढ़ना स्मृति और सोच को बढ़ाता है। यह खॊज इस बात की पुष्टी करती है।
                             अंग्रेज़ों ने भारत के महान परंपरा को बरबाद कर हमें बौद्धिक रूप से विकलांग बनाया है। भारत में मेकाले शिक्षण को महत्व देकर संस्कृत का उपहास किया गया है। लेकिन अब खुद पश्चिमी दुनिया ही संस्कृत की महानता को पहचान चुकी है और उसे खुले मन से स्वीकार रही है। जेम्स हार्टज़ेल स्पेन के बास्क सेंटर ऑन कॉग्निशन, ब्रेन एंड लैंग्वेज में एक पोस्ट डोक्टरल शोधकर्ता और संस्कृत भक्त हैं। इन्होने संस्कृत का अध्ययन और अनुवाद करने में कई साल बिताए हैं और मस्तिष्क पर इसके प्रभाव से मोहित हो गए हैं।
                             डॉ हार्टज़ेल का शोध संस्कृत विद्वानों के दिमाग की जांच करने वाला पहला अध्ययन है। भारत के राष्ट्रीय मस्तिष्क अनुसंधान केंद्र में संरचनात्मक चुंबकीय अनुनाद इमेजिंग (एमआरआई) का उपयोग करके, उन्होंने 21 संस्कृत पंडितों और 21 आम व्यक्तियों के मस्तिष्क को स्कैन किया। उन्होंने पाया कि संस्कृत पंडितों के मस्तिश्क के कुछ भाग आम सब्जेक्ट के मुकाबले नाटकीय रूप से बड़े थे, दोनों सेरेब्रल गोलार्धों में 10 प्रतिशत से अधिक भूरे रंग के पदार्थ, और कॉर्टिकल मोटाई में पर्याप्त वृद्धि हुई है।
                             तात्पर्य यह है कि संस्कृत पंडितों के संज्ञानात्मक क्षमता अन्य के मुकाबले ज्यादा है। जो व्यक्ती निरंतर रूप से संस्कृत का पठण करता है उसकी स्मरण शक्ती, बुद्धिमत्ता और संज्ञानात्मक क्षमता अन्य के मुकाबले ज्यादा होती है। प्राचीन काल में भारत के लोगों को “आर्य” व “आर्या” कहा जाता था। आर्य/आर्या यानी wise men/women. हमारे पूर्वज हमेशा संस्कृत में ही वार्तालाप करते थे। वेद और उपनिषदॊं की रचना भी संस्कृत में ही हुआ था। अब आधुनिक विज्ञान की खोज भी इस बात की पुष्टी कर रही है कि संस्कृत के पठन से हमारे मस्तिष्क पर गहरा असर पड़ता है।

                             आनेवाले दिनों में स्मरण शक्ती से जुड़े समस्या, भूलने की बीमारी, बच्चों में एकाग्रता कि समस्याऒं पर संस्कृत पठन के प्रभाव के बारें में अनुसंधान किया जायेगा। भारत के आयुर्वेद के वैद्यों का मानना है संस्कृत पठन से इन समस्याओं से मुक्ती पाई जा सकती है। अब अंग्रेज़ी का मोह त्याग कर संस्कृत अपनाइये। हमारे धरती की अपनी भाषा संस्कृत है। मनुश्य ही नहीं बल्की कंप्यूटर प्रोग्रांमिंग के लिए भी संस्कृत जितना उत्कृष भाषा कहीं पर भी नहीं है। गर्व कीजिए कि आप संस्कृत की जननी आर्यवर्त भारत के भारतीय नागरिक है।

रविवार, 12 अगस्त 2018

स्वतंत्रता - दिवसस्य संस्कृते भाषणम्

नमः सभायै सभापतिश्च समुपस्थिता: मम गुरव: अतिथिगणश्च सर्वेभ्यः प्रणाम:।

सर्वप्रथमम् सर्वेभ्यः अस्य स्वतन्त्र्यपूर्वण: नैका: शुभाभिकामना: यथा हि अस्माभि: विदितम् अस्ति यद् अद्य स्वातंत्र्यपर्वण: द्विसप्ततितम: वर्षग्रंथि: समायोज्यमाना अस्ति। भारतस्वतन्त्रतादिनम्  'अगस्त'-मासस्य पञ्चदशे (१५/८) दिनाङ्के राष्ट्रियोत्सवरूपेण आयोज्यते। १९४७ तमस्य वर्षस्य 'अगस्त'-मासस्य पञ्चदशे दिनाङ्के भारतगणराज्यं स्वतन्त्रम् अभवत्। अतः एतद् दिनं भारतस्वातन्त्र्यदिन - उत्सवत्वेन आचर्यते। तत्पूर्वं ब्रिटिश-जनाः भारतस्योपरि शासनं कुर्वन्ति स्म। १९४७ तमस्य वर्षस्य 'अगस्त'-मासस्य चतुर्दशे (१४/८/१९४७) दिनाङ्के मध्यरात्रौ द्वादशवादने आङ्ग्लाः भारतगणराज्यस्य शासनं भारतीयेभ्यः यच्छन्तः भारत- त्यागम् अकुर्वन्।भारतस्वतन्त्रतायाः तत् दिनं भारते राष्ट्रियपर्वत्वेन आचर्यते। स्वातन्त्र्योत्सवस्य प्रमुखः कार्यक्रमः देहली-महानगरस्थे रक्तदुर्गे (लालकिला) भारतगणराज्यस्य प्रधानमंत्रिण: भाषणेन आरभते। ततः प्रधानमन्त्रि-द्वारा-ध्वजारोहणं भवति। अनन्तरं प्रधानमन्त्री सर्वकारस्य कार्याणां योजनां प्रस्तुतं कुर्वन् सर्वेभ्यः शुभाशयं यच्छति। ततः सर्वेषां राज्यानां राजधानीषु मुख्यमन्त्रिणः ध्वजारोहणं कृत्वा जनेभ्यः शुभाशयं यच्छन्ति। स्वातन्त्र्यदिने प्रातः सप्तवादने ध्वजारोहणस्य कार्यकालः। भाषणानन्तरं भारत गणराज्यस्य प्रधानमन्त्री देशं सम्बोधयति। तस्मिन् दिने भारतीय-त्रिवर्णध्वजः सर्वत्र विराजते।

।।संस्कृतभारतम्।।
।।समर्थभारतम्।।

गुरुवार, 7 जून 2018

Cricket's words in Samskrit language

1) cricket ---कन्दुकक्रीडा
2) pitch--क्षिप्या
3) Bat--वैट
4) Ball--कन्दुकम्
5) wicket keeper---स्तोभरक्षकः
6) shot pitch--अवक्षिप्तम्
7) catch out--गृहीतः
8) stump out--स्तोभितः
9) Run out--धाविन्नष्टम्
10) Bold--गेन्दितः
11) LBW--पादवाधा
12) wide ball--अपकन्दुकम्
13) No ball--नोकन्दुकम्
14) Hit--वेधः
15) Four--चतुष्कम्
16) Six--षठकम्
17) Run-- धावनम्
18) umpire -- निर्णायकः
19) Batsman --वल्लकः
20) Baller--गेन्दकः
21) spinner --चक्रगेन्दकः
22) wicket --स्तोभः
23) over--पर्यासः
24) Bounce -- घातगेन्दु
25)Target-वेध्यम

सोमवार, 2 अप्रैल 2018

दश लकारों का व्यवहार

संस्कृत में काल दश भागों में विभाजित है जिनको दश लकार कहा जाता है :--

०१ ) लट् ---- ल् + अ + ट्
०२ ) लिट् ---- ल् + इ + ट्
०३ ) लुट् ---- ल् + उ + ट्
०४ ) लृट् ---- ल् + ऋ + ट्
०५ ) लेट् ---- ल् + ए + ट्
०६ ) लोट् ---- ल् + ओ + ट्
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०७ ) लङ् ---- ल् + अ + ङ्
०८ ) लिङ्---- ल् + इ + ङ्
०९ ) लुङ्---- ल् + उ + ङ्
१० ) लृङ्---- ल् + ऋ + ङ्
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इनको स्मरण करने की विधि :----

ल् में प्रत्याहार के क्रम से ( अ इ उ ऋ ए ओ )  जोड़ दो और क्रमानुसार ( ट् ) जोड़ते जाओ । फिर बाद में ( ङ् ) जोड़ते जाओ जब तक कि दश लकार पूरे न हो जाएँ । जैसे लट् लिट् लुट् लृट् लेट्  लोट् लङ् लिङ् लुङ्  लृङ्  ॥ इनमें लेट्  लकार केवल वेद में प्रयुक्त होता है । लोक के लिए नौ लकार शेष रहे । अब इन नौ लकारों में लङ् के दो भेद होते हैं :-- आशीर्लिङ् और विधिलिङ् । इस प्रकार लोक में दश के दश लकार हो गए ।

इन लकारों के काल :----
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(१) लट् लकार = वर्तमान काल । जैसे :-   रामः खेलति ।
राम खेलता है ।

(२) लिट् लकार = अनद्यतन परोक्ष भूतकाल । जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो । जैसे :--- रामः रावणं ममार ।
राम ने रावण को मारा  ।

(३) लुट् लकार = अनद्यतन भविष्यत काल । जो आज का दिन छोड़ कर आगे होनो वाला हो । जैसे :- -- रामः परश्वः विद्यालयं गन्ता ।
राम परसों विद्यालय जायेगा ।

(४) लृट् लकार = सामान्य भविष्य काल । जो आने वाले किसी भी समय में होने वाला हो । जैसे :- --- रामः इदं कार्यं करिष्यति ।  राम यह कार्य करेगा ।

(५) लेट् लकार = यह लकार केवल वेद में प्रयोग होता है ईश्वर के लिए क्योंकि वह किसी काल में बंधा नहीं है ।

(६) लोट् लकार = ये लकार आज्ञा, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना आदि में प्रयोग होता है । जैसे :-
भवान् गच्छतु ।
आप जाओ ,
सः क्रीडतु ।वह खेले,
त्वं खाद । तुम खाओ ,
किमहं वदानि ।क्या मैं बोलूँ ?

(७) लङ् लकार = अनद्यतन भूत काल । आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन जो हुआ हो । जैसे :-
भवान् तस्मिन् दिने भोजनमपचत् ।
आपने उस दिन भोजन पकाया था ।

(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं :--

(क) आशीर्लिङ् = किसी को आशिर्वाद देना हो । जैसे :-
भवान् जीव्यात् आप जीओ ,
त्वं सुखी भूयात् ।तुम सुखी रहो आदि ।

(ख) विधिलिङ् = किसी को विधि बतानी हो । जैसे :-
भवान् पठेत् ।आपको पढ़ना चाहिए ।
अहं गच्छेयम् ।मुझे जाना चाहिए आदि ।

(९) लुङ् लकार = सामान्य भूत काल । जो कभी भी बीत चुका हो । जैसे :-
अहं भोजनम् अबभक्षत् ।
मैंने खाना खाया ।

(१०) लृङ् लकार = ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान तक हो । जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो । जैसे :-
यदि त्वम् अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् भवितुम् अर्हिष्यत् ।
यदि तू पढ़ता तो विद्वान बनता ।

इन्हीं लकारों में सभी धातुरूप चलते हैं।