शुक्रवार, 25 अगस्त 2017

लखनऊ : संस्कृत भाषा को बढावा देने के लिए यहां संस्कृत भाषा में बिकती हैं सब्जियाँ।











लखनऊ : संस्कृत भाषा को बढावा देने के लिए यहां संस्कृत भाषा में बिकती हैं सब्जियाँ।

मार्केट में हर जगह लगा है संस्कृत में बोर्ड
                 लखनऊ : यहां निशांतगंज में एक ऐसी सब्जी मंडी है, जहां संस्कृत भाषा में सब्जिहयां ब‍िक रही हैं। सभी सब्जिटयों के नाम संस्कृत में लिखे हैं। इसके लिए मंडी में हर जगह बोर्ड भी लगाए गए हैं। यही नहीं, दुकानदार भी हमेशा सब्जिमयों के नाम संस्कृत में ही लेते हैं।

यहां संस्कृत में क्यों बेची जा रही हैं सब्जियां ?

               निशांतगंज गली नंबर-५ में सब्जी बेचनेवाले सुनील ने बताया, संस्कृत भाषा को बढावा देने के लिए मंडी के लोगों ने संस्कृत में सब्जी बेचना शुरू किया है ! संस्कृत हमारी मुख्य भाषा है। सरकार इस भाषा के साथ पक्षपात और अनदेखा कर रही है !
                ये पूछने पर कि, जिन लोगों को संस्कृत समझ नहीं आती वो कैसे समझेंगे ? इस पर दुकानदारों ने कहा, उन्हें समझाने के लिए ही ये प्रयास किया गया है। इस मार्केट में रोजाना सब्जी खरीदनेवाले अब संस्कृत में सब्जी के भाव पूछते हैं और खरीदकर ले जाते हैं !
               वहीं, इस मार्केट में सब्जी बेचनेवाली सुशीला देवी कहती हैं, जब हमारे जैसे कम पढे-ल‍िखे लोगों को ये भाषा समझ आ सकती है तो बुद्धि‍जीवी लोग तो आसानी से समझ सकते हैं ! यहां आनेवाले अब हर ग्राहक संस्कृत में मरिचिक (मिर्ची), रक्त्वृन्त्कम (टमाटर), भिन्दिक (भिन्डी), आद्रकम (अदरक), पटोल (परवल), कर्कटी (खीरा), पलांडू (प्याज) और निम्बुकम (निम्बू) आद‍ि मांगते हैं !

क्या कहते हैं संस्कृत संस्थान के अध‍िकारी ?
               उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान के प्रशासनिक अधिकारी जगदानंद झा ने बताया, ”अपनी भाषा को बचाने की यह एक प्रयास है। मेरे घर में पत्नी और दोनों बच्चे संस्कृत में ही बात करते हैं। सरकार को चाहिए क‍ि संस्कृत के लिए कुछ ऐसा करे, ताक‍ि आमजन की भाषा बन जाए !


सोमवार, 21 अगस्त 2017

क्या संस्कृत पढ़ने से अर्थार्जन नहीं हो सकता ?



क्या संस्कृत पढ़ने से अर्थार्जन नहीं हो सकता ?



समाज में एक भ्रम फैलाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से छात्र अर्थार्जन नहीं कर सकता। उसे केवल शिक्षक बनना पड़ता है या पुरोहित। मेरा इस प्रकार की धारणा रखनेवालों से प्रश्न है कि जो संस्कृतेतर छात्र B.A., B.Com, B.Sc. होते है उनके लिए कौनसी नौकरी बाट जोह रही है ? हमारे देश में स्नातक उपाधि को आधारभूत उपाधि माना जाता है । उसकी प्राप्ति के पश्चात् आप प्रतियोगी परीक्षा उत्तीर्ण कर नौकरी पा सकते है। जो संस्कृत विषय लेकर स्नातक बनते हैं, उनके लिए किस प्रतियोगी परीक्षा का द्वार बंद है ? उत्तर आयेगा किसी का नहीं। स्नातक बनने के पश्चात् अधिकतर छात्र प्रबन्धन शास्त्र (M.B.A.) पढ़ते हैं। क्या संस्कृत से स्नातक प्रबन्धन शास्त्र नही पढ़ सकते ? संस्कृत के छात्र UPSC परीक्षा उत्तीर्ण करते हैं। चोटीपुरा गुरुकुल की कन्या UPSC परीक्षा में तृतीय स्थान पर आयी। लखनऊ के संस्कृत परिवार का युवक IAS इसी वर्ष हुआ। बहुत से छात्र UPSC परीक्षा के लिए संस्कृत विषय लेते हैं, यह मेरा अनुभव है। IIT या अन्य अभियन्त्रण शास्त्र पढ़े छात्र भी पाठ्यक्रम के विषायों को छोड़ कर I.A.S. बनने के लिए संस्कृत विषय चुनते हैं और संभाषण सीखने के लिए संस्कृत भारती के पास आते हैं। आश्चर्य तब हुआ जब एक मुसलमान B.Tech. की हुई छात्रा संस्कृत सीखने संस्कृत भारती की ओर से संचालित संवादशाला में पहुची। वहां 14 दिन का आवासीय शिविर होता है। वह UPSC की परीक्षा देनेवाली थी।

विश्वभर में योग का प्रचलन बढ़ रहा है, यह सर्वविदित है। किन्तु अधिकतम लोगों को केवल आसन और प्राणायाम का कुछ हिस्सा ज्ञात है । अष्टांग योग की ओर अब कुछ लोग ( विशेषकर विदेशी ) उन्मुख होने लगे हैं। उन्हें पढ़ायेगा कौन ? जो योग दर्शन का ज्ञाता है वही न ? क्या विश्व की जिज्ञासा शांत करने के लिए हमारे पास योगदर्शन के पर्याप्त शिक्षक है ? इस वर्ष भारत सरकार के विदेश मन्त्रालय द्वारा पहला प्रयास किया गया। योग दिन के निमित्त भारत से कुछ योग दर्शन जानने वाले विद्वानों को विदेशों में भेजा गया। यह मांग बढ़ने वाली है। विश्व के कुछ ही देश आंग्ल भाषा समझते हैं। शेष सब अपनी अपनी भाषा में पढ़ते हैं, जैसे - जर्मन, फ्रेंच, रशियन, जापानी, चीनी, हीब्रू इत्यादि । इसलिए इन देशों मे योगदर्शन पढ़ाना है तो पहले संस्कृत पढ़ानी होगी, कारण आंग्ल भाषा से काम नही चलेगा। विश्व की सभी भाषाएं दार्शनिक पढ़ें, यह तो संभव नहीं है। वैसे भी योगशास्त्र, भाष्य ग्रन्थ, टीका ग्रन्थ इत्यादि पढ़ने के लिए संस्कृत आना अनिवार्य है ।

यही हाल आयुर्वेद का है। विदेशों मे आयुर्वेद की औषाधियों की मांग लगातार बढ़ रही है। कुछ समय पश्चात् आयुर्वेद पढ़ने के लिए विदेशी छात्र प्रवृत्त होंगे। तब आयुर्वेद के ग्रंथों को पढ़ने के लिए संस्कृत का ज्ञान आवश्यक हो जाएगा। जो जो भारतीय शास्त्र है, उनको पढ़ने के लिए संस्कृत अनिवार्य है । जैसी विदेशियों की जिज्ञासु प्रवृत्ति है वह अवश्य संस्कृत पढ़ेंगे। तब पढ़ाने वाले शिक्षकों की वैश्विक मांग होगी। जैसा की मैंने पूर्व में लिखा है – संस्कृत आंग्ल माध्यम में नहीं सिखा पाएंगे। अतः अनिवार्य रूप से संस्कृत माध्यम में पढ़ाना पड़ेगा। क्या भारत के शिक्षक इसके लिए तैय्यार हैं ? यह मेरी कल्पना का विलास भर नहीं है। एक वर्ष पूर्व संस्कृत भारती के पास एक स्पेनिश भाषी Architect महिला आयी । उसे भारतीय Architecture पढ़ना था। उसको यह समझ में आ गया की भारतीय Architecture पढ़ने के लिए संस्कृत आना अनिवार्य है। उसने संस्कृत भारती के बेंगलूरू कार्यालय में रुककर संस्कृत सीखा। तत्पश्चात भारतीय Architecture पर उसने अपना प्रबन्ध लिखा। यह हमारा दुर्भाग्य है कि भारतीय अपनी विद्या सीखने के लिए तत्पर नहीं हैं। नहीं तो जैसे आयुर्वेद के पाठ्यक्रम में संस्कृत सीखना अनिवार्य है, वैसा सभी व्यावसायिक महाविद्यालायों मे होता। वर्तमान केंद्र सरकार ने योजनापूर्वक व्यावसायिक महाविद्यालयों में ऐच्छिक विषय के रूप में संस्कृत लाने का प्रयास प्रारम्भ किया है। लगभग दो सौ महाविद्यालायों मे जहा संस्कृत विषय पाठ्यक्रम का हिस्सा नहीं है, वहां केंद्र सरकार ने अपनी ओर से वेतन की व्यवस्था कर प्राध्यापक को भेजा है। इच्छुक छात्र एवं प्राध्यापक संस्कृत की कक्षाओं मे बैठते हैं।

जहाँ तक विद्यालयीन शिक्षा का संबन्ध है, सर्वाधिक शिक्षक आङ्ग्ल भाषा के हैं। तत्पश्चात् संस्कृत का ही क्रम आता है। उच्च शिक्षा में तो संस्कृत प्राध्यापकों की संख्या सर्वाधिक है। कारण सामान्य महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में संस्कृत की शिक्षा दी जाती है। इस कारण प्राध्यापक भी नियुक्त होते है। इसके अलावा 15 की संख्या मे संस्कृत के विश्वविद्यालय हैं । इतनी संख्या में तो किसी विषय के विश्वविद्यालय नही हैं। प्रत्येक संस्कृत विश्वविद्यालय मे कम से कम साहित्य, व्याकरण, दर्शन, वेद, ज्योतिष एवं शिक्षाशास्त्र ये विभाग तो होते ही हैं। अतः प्रत्येक विभाग मे आचार्य, सह आचार्य, सहायक आचार्य ये तो पद सृजित किये ही जाते हैं । इस कारण महाविद्यालयीन प्राध्यापकों की संख्या बढ़ जाती है।

जहाँ तक पुरोहितों का प्रश्न है, वे तो आठ वर्ष की अवस्था में गुरुकुल मे प्रविष्ट होते हैं । वहाँ छह से 12 वर्ष तक वेदाध्ययन कर गुरुकुल के विद्यार्थी पौरोहित्य करने लगते हैं । समाज मे पुरोहितों की आवश्यकता अधिक होने के कारण वैदिकों को 14 वें वर्ष में ही धन दक्षिणा के रूप मे प्राप्त होने लगता है । इस प्रकार का कौनसा पाठ्यक्रम भारत मे है, जो वय के 14 वें वर्ष से ही धन देने लगे ? और तो और क्या यजमान और क्या उसकी पत्नी, उसके घर के सभी व्यक्ति पुरोहित के चरण स्पर्श करते हैं । ज्योतिषि भी बिना किसी पून्जी के व्यवसाय आरम्भ करता है और पर्याप्त धन कमाता है । अतः संस्कृत या वेद का विद्यार्थी अन्य विषयों की अपेक्षा कम बेरोजगार है।
सामान्यतः भारतीय भाषा के पत्रकार लिखते या बोलते समय अशुद्ध भाषा का प्रयोग करते हैं। अतः यदि संस्कृत भाषा आत्मसात किया हुआ स्तंभ लेखक या संवाददाता बन जाता है ,तो वार्ता लेखन या कथन मे शुद्धता आयेगी । तभी समाज भी शुद्ध भाषा का प्रयोग सीखेगा। अतः निवेदन है की संस्कृत के अध्ययन से अर्थार्जन कैसे होगा, यह चिन्ता त्यागें और अधिक संख्या में लोग संस्कृत सीखें।

गुरुवार, 3 अगस्त 2017

पक्षियों के संस्कृत नाम

उल्‍लू - उलूक:‚ कौशिकः
कोयल - कोकिल:, पिक:
कौआ - काक:‚ ध्वांग्सः‚ वायसः
कबूतर - कपाेत:‚ पारावकः
क्रौंच - क्रौंच:
कठफोडवा - दार्वाघाटः
गिद्ध - गृध्र:
गौरैया - चटक:
गरुण - गरुण:
चील - श्‍येन:
चमगादड - जतुका
चकोर - चका्ेर:
चकवा - चक्रवाक:
जलमुर्गी - जलकुक्‍कुटी
तीतर - तित्तिर:
तोता - शुक:‚ कीरः
नीलकंठ - नीलकण्‍ठ:‚ चाषः
पतंगा – शलभः
पपीहा – चातकः
फाख्‍ता - कपोत:
बतख - कादम्‍ब:
बटेर - वर्तकः
बुलबुल - कलापी
बाज - गरुण:
बगुला - बक:
मैना - सारिका
मुर्गी - कुक्‍कुटी
मुर्गा - कुक्‍कुट:
मोर - मयूर:‚ बर्हिन
शुतुरमुर्ग - उष्‍ट्रपक्षी
सारस - सारस:
हंस - हंस:‚ मरालः

पशुओ के संस्कृत नाम

उंट - उष्‍ट्र‚ क्रमेलकः
कछुआ - कच्‍छप:
केकडा - कर्कट: ‚ कुलीरः
कुत्‍ता - श्‍वान:, कुक्कुर:‚ कौलेयकः‚ सारमेयः
कुतिया – सरमा‚ शुनि
कंगारू -  कंगारुः
कनखजूरा – कर्णजलोका
खरगोश - शशक:
गाय - गो, धेनु:
गैंडा - खड्.गी
गीदड (सियार) - श्रृगाल:‚ गोमायुः
गिलहरी - चिक्रोड:
गिरगिट - कृकलास:
गोह – गोधा
गधा - गर्दभ:, रासभ:‚ खरः
घोडा - अश्‍व:, सैन्‍धवम्‚ सप्तिः‚ रथ्यः‚ वाजिन्‚ हयः
चूहा - मूषक:
चीता - तरक्षु:, चित्रक:
चित्‍तीदार घोडा - चित्ररासभ:
छछूंदर - छुछुन्‍दर:
छिपकली – गृहगोधिका
जिराफ - चित्रोष्‍ट्र:
तेंदुआ – तरक्षुः
दरियाई घोडा - जलाश्‍व:
नेवला - नकुल:
नीलगाय - गवय:
बैल - वृषभ: ‚ उक्षन्‚ अनडुह
बन्‍दर - मर्कट:
बाघ - व्‍याघ्र:‚ द्वीपिन्
बकरी - अजा
बकरा - अज:
बनमानुष - वनमनुष्‍य:
बिल्‍ली - मार्जार:, बिडाल:
भालू - भल्‍लूक:
भैस - महिषी
भैंसा – महिषः
भेंडिया - वृक:
भेंड - मेष:
मकड़ी – उर्णनाभः‚ तन्तुनाभः‚ लूता
मगरमच्‍छ - मकर: ‚ नक्रः
मछली – मत्स्यः‚ मीनः‚ झषः
मेंढक - दर्दुरः‚ भेकः
लोमडी -लोमशः
शेर - सिंह:‚ केसरिन्‚ मृगेन्द्रः‚ हरिः
सुअर - सूकर:‚ वराहः
सेही – शल्यः
हाथी - हस्ति, करि, गज:
हिरन - मृग