गुरुवार, 25 मई 2017

यात्रा विषये संस्कृते सम्भाषणम्।



यात्रा विषये संस्कृते सम्भाषणम्।


कदा आगतवान् ? = कब आये?
अद्य प्रातः आगतवान् वा ? = आज सुबह आये हो क्या?
कथं आसीत् प्रवासः ? = यात्रा कैसी थी?
प्रवासे व्यवस्था समीचीना आसीत् वा ? = यात्रा में व्यवस्थाये सही थी क्या?
कति दिनानाम् ? = कितने दिन?
एकाकी गतवान् वा ? = क्या अकेले गए थे?
एकाकी किमर्थम् ? परिवारसमेतः गतवान् = अकेले किसलिये? परिवार के साथ गया था।
दिनत्रयं तत्र स्थितवान् । = तीन दिन वहाँ रुका।
मार्गमध्ये अपघातः अभवत् । = रास्ते में दुर्घटना हो गयी थी।
विशेषतया कोऽपि न व्रणितः ? = विशेष रूप से कोई भी जख्मी नही हुआ।
वस्तूनि तावन्ति एव वा ? = वस्तुए इतनी ही थी क्या?
बहुधा श्रान्तः अस्मि भोः! = बहुत थक चूका हूँ यार।
त्रिचक्रिका किमर्थम् ? = रिक्क्षा किसलिए?
लोकयानेन गच्छामः । = बस से जाते है।
लोकयानेन = बस से।
त्रिचक्रिकायाम् = रिक्क्षा में।
सुखयानेन = sleeper बस।
पादाभ्याम् = पैरों से।
सामिसुखयानेन = शयन बस से।
संलपन्तः = बाते करते।
कः प्रतीक्षते भोः ? = कौन इंतजार कर रहा है?
त्रिचक्रिकायां एव गच्छामः । = साईकिल से ही चलते है।
किमर्थं वृथा व्ययः इति ? = क्यूँ व्यर्थ में पैसे खर्च करे।
बहुकालतः प्रतीक्षां करोमि । = बहुत देर से प्रतीक्षा कर रहा हु।
कदा प्रस्थितः ? = कब गए?
काशीं रामेश्वरं सर्वं दृष्टवान् वा ? = काशी रामेश्वर सब कुछ देख लिया क्या?
कियत् सुन्दरं अस्तीति जानाति वा ? = कितना सुंदर है जानते हो?
महद् अद्भुतम् । = बहुत सुंदर।

बुधवार, 17 मई 2017

संस्कृत का ह्रास क्योँ हुआ ?


संस्कृत का ह्रास क्योँ हुआ ?

                                पहले संस्कृत लोक भाषा थी ! परंतु धीरे-धीरे यह दैनिक व्यवहार से क्यों लुप्त होती गई ? ऐसा प्रश्न उत्पन्न होना स्वभाविक है ! इस विषय में निश्चित रूप से कुछ भी कहना कठिन है फिर भी ऐतिहासिक सामाजिक और व्यक्तित्व तीन कारण हो सकते हैं !
                             संस्कृत भाषा सृष्टि के आरम्भ से है ! गत दो सहस्र वर्षों में अनेक प्रादेशिक भाषाएं अपभ्रंश के रूप में विकसित हुई हैं ! सहस्र वर्ष पर्यंत परकीय शासन में विदेशी भाषाओं ने राज भाषाओं का स्थान प्राप्त किया और शासन ने वह भाषाएं हम पर थोप दी ! अंग्रेजी शासन काल में संस्कृत पाठशालाएं बंद कर दी गई, नए-नए अंग्रेजी विद्यालय खोले गए ! अंग्रेजी पढ़े लिखे लोग धन एवं प्रतिष्ठा प्राप्त करने लगे, अंग्रेजी भाषा जीविका का साधन बन गई ! बी.ए. स्नातक पदवी को प्राप्त करने वाले प्रथम भारतीय को कोलकाता में हाथी पर बिठाकर शोभायात्रा निकाली गई जिस से अंग्रेजी अध्ययन को गौरव प्राप्त हुआ !
              पहले संस्कृत जनसामान्य की भाषा थी ! समाज जीवन सरल सौहार्द व शांति युक्त था जाति की मान्यता भी गुण और कार्य के अनुसार थी ! बीच के काल में अनेक कारणों से ऊंच-नीच, भेद-भाव उत्पन्न हुए और समाज का बहुत बड़ा भाग संस्कृत से वंचित रहा !
              भाषा व्यक्ति के अधीन है ! हिंदू समाज में जो विकृतियां उत्पन्न हुई उनका प्रभाव समाज के अंग भूत संस्कृतज्ञ व्यक्तियों पर भी हुआ ! अब यद्यपि उनकी संस्कृत व्यवहार विमुखता व अकर्मण्यता भी संस्कृत के ह्रास का कारण बनी फिर भी उन संस्कृतज्ञ लोगों ने ही अभाव, दारिद्र्य, मानापमान को सहन कर उस संस्कृत ज्ञानदीप को प्रज्ज्वलित रखा है अतः मानव जगत उनका ऋणी हैं !
                भारतीयों को स्वाभिमान शून्य करके सरलता से शासन करने के लिए अंग्रेजों ने संस्कृत केंद्रित शिक्षण व्यवस्था को तो समाप्त किया ही, संस्कृत भाषा के अध्यापन हेतु 23 वर्ष प्राचीन यूरोपीय व्याकरण अनुवाद पद्धति प्रारंभ की ! पिछले 150 वर्ष से इसी अंग्रेजी पद्धति से संस्कृत अध्ययन के कारण संस्कृत आचार्यों के संस्कृत ज्ञान का भी स्तर गिरा है ! स्वतंत्र भारत में भी संस्कृत शिक्षा दिशाहीन होने के कारण भी संस्कृत का ह्रास हुआ है !
              मातृभाषा होने के कारण प्रादेशिक भाषाओं ने स्थान प्राप्त किया ! बहुजन की भाषा व्यवहारिक भाषा और राजनीतिक कारणों से हिंदी में स्थान प्राप्त किया ! अंग्रेजी शिक्षित राजनीतिज्ञ प्रशासनिक अधिकारियों और ईसाइयों के कारण अंग्रेजी ने स्थान प्राप्त किया ! राजनीतिज्ञों की तुष्टीकरण की नीति और मुस्लिम जनों के व्यवहार कौशल से उर्दू ने भी स्थान प्राप्त किया परंतु समर्थक शक्ति के अभाव से संस्कृत भाषा को ही अपनी मातृभूमि में अपेक्षित गौरव स्थान नहीं मिला !

क्या संस्कृत कठिन भाषा है ?

क्या संस्कृत कठिन भाषा है ?
                                     संस्कृत के विषय में कुछ लोगों के मन में संस्कृत कठिन है”, “निर्जीव भाषा है”, “एक जाति की भाषा है”, “कभी बोलचाल की भाषा नहीं थी” –इस प्रकार की कई गलत धारणाएं है, वर्षों से संस्कृत में बातचीत करने की परंपरा लुप्त होने के कारण ये भ्रांतियां फैलीं है !

                            कोई भी भाषा सरल या कठिन नहीं होती ! भाषा के दो पहलू है
(1.) बोलचाल की भाषा सरल होती है
(2.) साहित्य में प्रयुक्त होने वाली भाषा प्रोढ़ होती है !
               तब संस्कृत भाषा कठिन है यह धारणा लोगों के मन में कैसे घर कर गयी ? इसके बहुत से कारण है जिनमे से एक कारण है इसके सिखाने की पद्धति ! अंग्रेजों के भारत में आने से पहले शिक्षा संसथान के रूप में केवल संस्कृत पाठशालाएं थी ! वहां सारी पढाई संस्कृत माध्यम से ही होती थी ! आचार्य ओर शिष्य आपस में संस्कृत में ही बात किया करते थे, इस कारण सहजता से भाषा सीखी जाती थी ! लेकिन अंग्रेज यहाँ अपना शासन करने के लिए ओर हमें दुर्बल बनाने के लिए भारत की आत्मा ओर श्रद्धा का नाश करना चाहते थे ! इस उद्धेश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने भारत की अस्मिता के मूल स्त्रोत संस्कृत भाषा को नष्ट करने की चाल चली ! इसलिए उन्होंने दो कदम उठाये संस्कृत पाठशालाओं को बंद करना और मेकाले द्वारा चलाई गयी नयी अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था शुरू करना ! इसके लिए उन्होंने संस्कृत मृत भाषा हैऐसा प्रचार किया ! अंग्रेजी शिक्षा व्यवस्था में जो संस्कृत-शिक्षण जोड़ा गया उसमे भी संस्कृत सिखाने के लिए अंग्रेजी पद्धति अर्थात व्याकरण-अनुवाद-पद्धति लागू की गयी ! संस्कृत शिक्षा में आज भी वही पद्धति प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में चल रही है ! हमें इस विष-वृक्ष की परिधि से बाहर निकलना है !
                   उसी व्याकरण-अनुवाद-पद्धति पर आधारित और सरलता की ओर ध्यान दिए बिना रची गयी पाठ्यपुस्तकों के कारण ही संस्कृत सीखना कठिन हो गया ! संस्कृत भाषा व्यवहार में न होने के कारण पंडितों ने संस्कृत का व्यवहार करते समय प्रोढ़ ग्रंथों की भाषा का ही प्रयोग किया ! शास्त्र चर्चा में भी वही प्रोढ़ भाषा व्यवहत हुई ! इसके कारण ही संस्कृत कठिन है ऐसा अनुभव किया जाने लगा ! आज संस्कृत व्यवहार में न होने के कारण भाषानियमों को याद करना पड़ता है और शब्दरूप व धातुरूप रटने पड़ते है ! यदि आप संस्कृत भाषा का व्यवहार शुरू करेंगे तो धीरे-धीरे सारी परिस्थितियां बादल जायेंगी !
                जैसा कि कुछ लोग बोल रहे है वैसा संस्कृत के सरलीकरण की आवश्यकता नहीं है ! सरलीकरण से अभिप्राय है नियमों का परिवर्तन ! इसमें संस्कृत भाषा का जो वैशिष्ट्य है वही नष्ट हो जाएगा और हम अपने प्राचीन वाड्मय को समझ नहीं पायेंगे ! लेकिन संस्कृत में पाणिनि-नियमों की परिधि के अन्दर ही बहुत से सरल उपाय दिए गए है ! उन्ही का प्रयोग करने से पर्याप्त मात्रा में संस्कृत सरल हो जाती है ! इसके बारे में आप और भी जानेंगे !


संस्कृत भाषा की विशेषताएँ।


संस्कृत भाषा की विशेषताएँ

(1) संस्कृत, विश्व की सबसे पुरानी पुस्तक (वेद) की भाषा है। इसलिये इसे विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं किसी संशय की संभावना नहीं है।

(2) इसकी सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिद्ध है।

(3) सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी होने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है।

(4) इसे देवभाषा माना जाता है।

(5) संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा भी है अतः इसका नाम संस्कृत है।
                                केवल संस्कृत ही एकमात्र ऐसी भाषा है जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।
                                इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है।

(6) शब्द-रूप - विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक या कुछ ही रूप होते हैं, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं।

(7) द्विवचन - सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है।

(8) सन्धि - संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है।

(9) इसे कम्प्यूटर और कृत्रिम बुद्धि के लिये सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है।

(10) शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है।

(11) संस्कृत वाक्यों में शब्दों को किसी भी क्रम में रखा जा सकता है। इससे अर्थ का अनर्थ होने की बहुत कम या कोई भी सम्भावना नहीं होती।
ऐसा इसलिये होता है क्योंकि सभी शब्द विभक्ति और वचन के अनुसार होते हैं और क्रम बदलने पर भी सही अर्थ सुरक्षित रहता है। जैसे - अहं गृहं गच्छामि या गच्छामि गृहं अहम् दोनो ही ठीक हैं।

(12) संस्कृत विश्व की सर्वाधिक 'पूर्ण' (perfect) एवं तर्कसम्मत भाषा है।

(13) संस्कृत ही एक मात्र साधन है जो क्रमश: अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं। इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएँ ग्रहण करने में सहायता मिलती है।

(14) संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरन्तर होती आ रही है। इसके कई लाख ग्रन्थों के पठन-पाठन और चिन्तन में भारतवर्ष के हजारों पुश्त तक के करोड़ों सर्वोत्तम मस्तिष्क दिन-रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं।
                                     पता नहीं कि संसार के किसी देश में इतने काल तक, इतनी दूरी तक व्याप्त, इतने उत्तम मस्तिष्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं। शायद नहीं है। दीर्घ कालखण्ड के बाद भी असंख्य प्राकृतिक तथा मानवीय आपदाओं (वैदेशिक आक्रमणों) को झेलते हुए आज भी 3 करोड़ से अधिक संस्कृत पाण्डुलिपियाँ विद्यमान हैं। यह संख्या ग्रीक और लैटिन की पाण्डुलिपियों की सम्मिलित संख्या से भी 100 गुना अधिक है।
                              निःसंदेह ही यह सम्पदा छापाखाने के आविष्कार के पहले किसी भी संस्कृति द्वारा सृजित सबसे बड़ी सांस्कृतिक विरासत है।

(15) संस्कृत केवल एक मात्र भाषा नहीं है अपितु संस्कृत एक विचार है। संस्कृत एक संस्कृति है एक संस्कार है संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है, वसुधैव कुटुम्बकम् की भावना है।


                                   अब केन्द्र सरकार व राज्य सरकारों को सभी स्कूलों, कॉलेजों में संस्कृत भाषा को अनिवार्य करना चाहिए जिससे बच्चों की बुद्धिशक्ति का विकास के साथ साथ बच्चे सुसंस्कारी बने ।


लंदन व न्यूजीलैंड के शिक्षकों ने स्वीकारा, संस्कृत पढ़ने से बच्चे बनते हैं महान।


लंदन व न्यूजीलैंड के शिक्षकों ने स्वीकारा, संस्कृत पढ़ने से बच्चे बनते हैं महान

'देववाणी संस्कृत' की महानता !

                              आज अपनी मातृभूमि पर उपेक्षा का दंश झेल रही 'संस्कृत' विश्व में एक सम्माननीय भाषा और सीखने के महत्वपूर्ण पड़ाव का दर्जा प्राप्त कर रही है। जहां भारत के सार्वजनिक पाठशालाओं में फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषा सीखने पर जोर दिया जा रहा है वहीं विश्व की बहुत सी पाठशालाएं, 'संस्कृत' को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं !

                                 ऑकलैंड (न्यूजीलैंड) : प्राचीन काल से ही संस्कृत भाषा भारत की सभ्यता और संस्कृति का सबसे मुख्य भाग रही है। फिर भी आज हमारे देश में संस्कृत को पाठशाली शिक्षा में अनिवार्य करने की बात कहने पर इसका विरोध शुरू हो जाता है। हम भारतवासियों ने अपने देश की गौरवमयी संस्कृत भाषा को महत्व नही दिया। आज हमारे देश के विद्यालयों में संस्कृत बहुत कम पढ़ाई और सिखाई जाती है। किंतु आज अपनी मातृभूमि पर उपेक्षा का दंश झेल रही संस्कृत विश्व में एक सम्माननीय भाषा और सीखने के महत्वपूर्ण पड़ाव का दर्जा हासिल कर रही है। जहाँ भारत के तमाम पब्लिक पाठशालों में फ्रेंच, जर्मन और अन्य विदेशी भाषा सीखने पर जोर दिया जा रहा है वहीं विश्व की बहुत सी पाठशालाएं संस्कृत को पाठ्यक्रम का हिस्सा बना रहे हैं।

                                न्यूजीलैंड की एक पाठशाला में संसार की विशेषतः भारत की इस महान भाषा को सम्मान मिल रहा है। न्यूजीलैंड के इस पाठशाला में बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए संस्कृत पढाई जा रही है। फिकिनो नामक इस पाठशाला का कहना है कि, संस्कृत से बच्चों में सीखने की क्षमता बहुत बढ जाती है। न्यूजीलैंड के शहर अॉकलैंड के माउंट इडेन क्षेत्र में स्थित इस पाठशाला में लड़के और लड़कियां दोनों को शिक्षा दी जाती है। 16 वर्ष तक की आयु तक यहाँ बच्चों को शिक्षा दी जाती है ।
                                इस पाठशाला का कहना है कि, इसकी पढ़ाई मानव मूल्यों, मानवता और आदर्शों पर आधारित है। अमेरिका के हिंदू नेता राजन झेद ने पाठ्यक्रम में संस्कृत को सम्मिलित करने पर फिकिनो की प्रशंसा की है। फिकिनो में अत्याधुनिक साउंड सिस्टम लगाया गया है। जिससे बच्चों को कुछ भी सीखने में आसानी रहती है। पाठशाला के प्रिंसिपल पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि, 1997 में स्थापित इस पाठशाला में नए तरह के विषय रखे गए हैं। जैसे दिमाग के लिए भोजन, शरीर के लिए भोजन, अध्यात्म के लिए भोजन।

                                 इस पाठशाला में अंग्रेजी, इतिहास, गणित और प्रकृति के विषयों की भी पढ़ाई कराई जाती है। पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि संस्कृत ही एक मात्र ऐसी भाषा है जो व्याकरण और उच्चारण के लिए सबसे श्रेष्ठ है। उनके अनुसार संस्कृत के जरिए बच्चों में अच्छी अंग्रेजी सीखने का आधार मिल जाता है। संस्कृत से बच्चों में अच्छी अंग्रेजी बोलने, समझने की क्षमता विकसित होती है।

                                  पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि, दुनियाँ की कोई भी भाषा सीखने के लिए संस्कृत भाषा आधार का काम करती है। इस पाठशाला के बच्चे भी संस्कृत पढकर बहुत खुश हैं। इस पाठशाला में दो चरणों में शिक्षा दी जाती है। पहले चरण में दस वर्ष की आयु तक के बच्चे और दूसरे चरण 16 वर्ष की आयु वाले बच्चों को शिक्षा दी जाती है। इस पाठशाला में बच्चों को दाखिला दिलाने वाले हर अभिभावक का यह प्रश्न अवश्य होता है कि, आप संस्कृत क्यों पढ़ाते हैं? हम उन्हें बताते हैं कि यह भाषा श्रेष्ठ है। विश्व की महानतम रचनाएं इसी भाषा में लिखी गई हैं।

                                अमेरिका के हिंदू नेता राजन झेद ने कहा है कि, संस्कृत को सही स्थान दिलाने की आवश्यकता है। एक ओर तो सम्पूर्ण विश्व में संस्कृत भाषा का महत्व बढ रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत में संस्कृत भाषा के विस्तार हेतु ठोस कदम नहीं उठाए जा रहे हैं जिसके कारण भारत में ही संस्कृत का विस्तार नहीं हो पा रहा है और संस्कृत भाषा के महत्व से लोग अज्ञात हैं । हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म के तमाम ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं।


स्त्रोत : हिन्दू जन जागृति