मंगलवार, 29 नवंबर 2016

संस्कृत के बारे में जानकारी।

संस्कृत के बारे में जानकारी
जब विश्व १०,००० जानता था, तब भारत ने अनंत खोजा !!
१.      संस्कृत का एकं हिन्दी में एक हुआ, अरबी व ग्रीक में बदल कर वनहुआ। शून्य अरबी में सिफर हुआ, ग्रीक में जीफर और अंग्रेजी में जीरो हो गया। इस प्रकार भारतीय अंक दुनिया में छाये।
२.      अंक गणित- अंकों का क्रम से विवेचन यजुर्वेद में मिलता है - "सविता प्रथमेऽहन्नग्नि र्द्वितीये वायुस्तृतीयऽआदिचतुर्थे चन्द्रमा: पञ्चमऽऋतु:षष्ठे मरूत: सप्तमे बृहस्पतिरष्टमे।नवमे वरुणो दशमंऽइन्द्र एकादशे विश्वेदेवा द्वादशे। (यजुर्वेद-३९-६)। इसमें विशेषता है अंक एक से बारह तक क्रम से दिए हैं।
३.      गणना की दृष्टि से प्राचीन ग्रीकों को ज्ञात सबसे बड़ी संख्या मीरीयड थी, जिसका माप १०४ यानी १०,००० था। रोमनों को ज्ञात सबसे बड़ी संख्या मिली थी, जिसकी माप १०३ यानी १००० थी।जबकि भारतवर्ष में कई प्रकार की गणनाएं प्रचलित थीं।
४.      गणना की ये पद्धतियां स्वतंत्र थीं तथा वैदिक, जैन, बौद्ध ग्रंथों में वर्णित इन पद्धतियों के कुछ अंकों में नाम की समानता थी परन्तु उनकी संख्या राशि में अन्तर आता था।
५.      प्रथम दशगुणोत्तर संख्या- अर्थात्‌ बाद वालीसंख्या पहले से दस गुना अधिक। इस संदर्भ में यजुर्वेद संहिता के १७वें अध्याय के दूसरे मंत्र में उल्लेख आता है। जिसका क्रम निम्नानुसार है- एक, दस, शत, सहस्र, अयुक्त, नियुक्त, प्रयुक्त, अर्बुद्ध, न्यर्बुद्र, समुद्र, मध्य, अन्त और परार्ध। इस प्रकार परार्ध का मान हुआ १०१२ यानी दस खरब।
६.      द्वितीय शतगुणोत्तर संख्या-अर्थात्‌ बाद वाली संख्या पहले वाली संख्या से सौ गुना अधिक। इस संदर्भ में ईसा पूर्व पहली शताब्दी के ललित विस्तरनामक बौद्ध ग्रंथ में गणितज्ञ अर्जुन और बोधिसत्व का वार्तालाप है,जिसमें वह पूछता है कि एक कोटि के बाद की संख्या कौन-सी है? इसके उत्तर में बोधिसत्व कोटि यानी १०७ के आगे की शतगुणोत्तर संख्या का वर्णन करते हैं।
७.      १०० कोटि, अयुत, नियुत, कंकर, विवर, क्षोम्य, निवाह, उत्संग, बहुल, नागबल, तितिलम्ब, व्यवस्थान प्रज्ञप्ति, हेतुशील, करहू, हेत्विन्द्रिय, समाप्तलम्भ, गणनागति, निखध, मुद्राबाल, सर्वबल, विषज्ञागति, सर्वज्ञ,विभुतंगमा, और तल्लक्षणा। अर्थात्‌ तल्लक्षणा का मान है १०५३ यानी एक के ऊपर ५३ शून्य के बराबर का अंक।
८.      तृतीय कोटि गुणोत्तर संख्या-कात्यायन के पाली व्याकरण के सूत्र ५१,५२ में कोटि गुणोत्तर संख्या का उल्लेख है। अर्थात्‌ बाद वाली संख्या पहले वाली संख्या से करोड़ गुना अधिक।इस संदर्भ में जैन ग्रंथ अनुयोगद्वारमें वर्णन आता है।यह संख्या निम्न प्रकार है-कोटि-कोटि, पकोटी, कोट्यपकोटि, नहुत, निन्नहुत, अक्खोभिनि, बिन्दु, अब्बुद, निरष्बुद, अहह, अबब, अतत, सोगन्धिक, उप्पल कुमुद, पुण्डरीक, पदुम,कथान, महाकथान और असंख्येय। असंख्येय का मान है १०१४० यानी एक के ऊपर १४० शून्य वाली संख्या। उपर्युक्त वर्णन से ज्ञात होता है कि प्राचीन काल में अंक विद्या कितनी विकसित थी, जबकि विश्व १०,००० से अधिक संख्या नहीं जानता था।
                                         उपर्युक्त संदर्भ विभूति भूषण दत्त और अवधेश नारायण सिंह द्वारा लिखित पुस्तक हिन्दू गणित शास्त्र का इतिहासमें विस्तार के साथ दिए गए हैं। आगे चलकर देश में आर्यभट्ट, भास्कराचार्य,श्रीधर आदि अनेक गणितज्ञ हुए। उनमें भास्कराचार्य ने ११५० ई. में सिद्धान्त शिरोमणिनामक ग्रंथ लिखा। इस महान ग्रंथ के चार भाग हैं।  
(१) लीलावती (२) बीज गणित (३) गोलाध्याय (४) ग्रह गणित।
                      श्री गुणाकर मुले अपनी पुस्तक भास्कराचार्यमें लिखते हैं कि भास्कराचार्य ने गणित के मूल आठ कार्य माने हैं-
(१) संकलन (जोड़) (२) व्यवकलन (घटाना) (३) गुणन (गुणा करना) (४) भाग (भाग करना) (५) वर्ग (वर्ग करना) (६) वर्ग मूल (वर्ग मूल निकालना) (७) घन (घन करना) (८) घन मूल (घन मूल निकालना)।
                      ये सभी गणितीय क्रियाएं हजारों वर्षों से देश में प्रचलित रहीं। लेकिन भास्कराचार्य लीलावती को एक अदभुत बात बताते हैं कि इन सभी परिक्रमों के मूल में दो ही मूल परिकर्म हैं- वृद्धि और हृास। जोड़ वृद्धि है, घटाना हृास है। इन्हीं दो मूल क्रियाओं में संपूर्ण गणित शास्त्रव्याप्त है।
                      आजकल कम्प्यूटर द्वारा बड़ी से बड़ी और कठिन गणनाओं का उत्तर थोड़े से समय में मिल जाता है। इसमें सारी गणना वृद्धि और ह्रास के दो चिन्ह (अ,-) द्वारा होती है।इन्हें विद्युत संकेतों में बदल दिया जाता है। फिर सीधा प्रवाह जोड़ने के लिए,उल्टा प्रवाहघटाने के लिए। इसके द्वारा विद्युत गति से गणना होती है।आजकल गणित एक शुष्क विषय माना जाता है। पर भास्कराचार्य का ग्रंथ लीलावतीगणित को भी आनंद के साथ मनोरंजन,जिज्ञासा आदि का सम्मिश्रण करते हुए कैसे पढ़ाया जा सकता है, इसका नमूना है।लीलावती का एक उदाहरण देखें-निर्मल कमलों के एक समूह के तृतीयांश,पंचमांश तथा षष्ठमांश से क्रमश: शिव,विष्णु और सूर्य की पूजा की,चतुर्थांश से पार्वती की और शेष छ: कमलों से गुरु चरणों की पूजा की गई।अय बाले लीलावती,शीघ्र बता कि उस कमल समूह में कुल कितने फूल थे?‘ उत्तर-१२० कमल के फूल।वर्ग और घन को समझाते हुए भास्कराचार्य कहते हैं अये बाले,लीलावती,वर्गाकार क्षेत्र और उसका क्षेत्रफल वर्ग कहलाता है। दो समान संख्याओं का गुणन भी वर्ग कहलाता है।
                           इसी प्रकार तीन समान संख्याओं का गुणनफल घन है और बारह कोष्ठों और समान भुजाओं वाला ठोस भी घन है।‘‘मूलशब्द संस्कृत में पेड़ या पौधे की जड़ केअर्थ में या व्यापक रूप में किसी वस्तु के कारण, उद्गम अर्थ में प्रयुक्त होता है। इसलिए प्राचीन गणित में वर्ग मूल का अर्थ था वर्ग का कारण या उद्गम अर्थात्‌ वर्ग एक भुजा। इसी प्रकार घनमूल का अर्थ भी समझा जा सकता है। वर्ग तथा घनमूल निकालने की अनेक विधियां प्रचलित थीं।इसी प्रकार भास्कराचार्य त्रैराशिक का भी उल्लेख करते हैं। इसमें तीन राशियों का समावेश रहता है। अत: इसे त्रैराशिक कहते हैं। जैसे यदि प्र (प्रमाण) में फ (फल) मिलता है तो इ (इच्छा) में क्या मिलेगा?
                            त्रैराशिक प्रश्नों में फल राशि को इच्छा राशि से गुणा करना चाहिए और प्राप्त गुणनफल को प्रमाण राशि से भाग देना चाहिए।इस प्रकार भाग करने से जो परिणाम मिलेगावही इच्छा फल है।आज से दो हजार वर्ष पूर्व त्रैराशिक नियम का भारत में आविष्कार हुआ। अरब देशों में यह नियम आठवीं शताब्दी में पहुंचा। अरबी गणितज्ञों ने त्रैराशिक को फी राशिकात अल्‌-हिन्दनाम दिया। बाद में यह यूरोप में फैला जहां इसे गोल्डन रूल की उपाधि दी गई। प्राचीन गणितज्ञों को न केवल त्रैराशिक अपितु पंचराशिक,सप्तराशिक व नवराशिक तक का ज्ञान था।बीज गणित-बीज गणित की उत्पत्ति का केन्द्र भी भारत ही रहा है। इसे अव्यक्त गणित या बीज गणित कहा जाता था।अरबी विद्वान मूसा अल खवारिज्मी ने नौंैवी सदी में भारत आकर यह विद्या सीखी और एक पुस्तक अलीजेब ओयल मुकाबिलालिखी।वहां से यह ज्ञान यूरोप पहुंचा।भारत वर्ष में पूर्व काल में आपस्तम्ब, बोधायन, कात्यायन तथा बाद में व्रह्मगुप्त,भास्कराचार्य आदि गणितज्ञों ने इस पर काम किया। भास्कराचार्य कहते हैं, "बीज गणित- का अर्थ है अव्यक्त गणित,इस अव्यक्त बीज का आदिकारण होता है, व्यक्त। इसलिए सबसे पहले लीलावतीमें इस व्यक्त गणित अंकगणित का चर्चा की। बीजगणित में भास्कराचार्य शून्य और अनंतकी चर्चा करते हैं। वधा दौ वियत्‌ खं खेनधाते, खहारो भवेत्‌ खेन भक्तश्च राशि:। अर्थात्‌ यदि शून्य में किसी संख्या का भाग गिया जाए या शून्य को किसी संख्या से गुणा कियाजाए तो फल शून्य ही आता है।यदि किसी संख्या में शून्य का भाग दिया जाए, तो परिणाम हर (अनन्त) आता है। शून्य और अनंत गणित के दो अनमोल रत्न हैं। रत्न के बिना जीवन चल सकता है,परन्तु शून्य और अनंत के बिना गणित कुछ भी नहीं।शून्य और अनंत भौतिक जगत में जिनका कहीं भी नाम निशान नहीं, और जो केवल मनुष्य के मस्तिष्क की उपज है,फिर भी वे गणित और विज्ञान के माध्यम से विश्व के कठिन से कठिन रहस्यों को स्पष्ट करते हैं।व्रह्मगुप्त ने विभिन्न समीकरणखोज निकाले। इन्हें व्रह्मगुप्त ने एक वर्ण,अनेक वर्ण,मध्यमाहरण और मापित नाम दिए। एक वर्ण समीकरण में अज्ञात राशि एक तथाअनेक वर्ण में अज्ञात राशि एक से अधिक होती थी।रेखा गणित-रेखा गणित की जन्मस्थली भी भारत ही रहा है। प्राचीन काल से यज्ञों के लिए वेदियां बनती थीं। इनका आधार ज्यामिति या रेखागणित रहता था। पूर्व में बोधायन एवं आपस्तम्ब ने ईसा से ८०० वर्ष पूर्व अपने शुल्ब सूत्रों में वैदिक यज्ञ हेतु विविध वेदियों के निर्माण हेतु आवश्यक स्थापत्यमान दिए हैं।किसी त्रिकोण के बराबर वर्ग खींचना,ऐसा वर्ग खींचना जो किसी वर्ग का द्विगुण,त्रिगुण अथवा एक तृतीयांश हो। ऐसा वृत्त बनाना,जिसका क्षेत्र उपस्थित वर्ग के क्षेत्र के बराबर हो। उपर्युक्त विधियां शुल्ब सूत्र में बताई गई हैं। किसी त्रिकोण का क्षेत्रफल उसकी भुजाओं से जानने की रीति चौथी शताब्दी के सूर्य सिद्धान्तग्रंथ में बताई गई है। इसका ज्ञान यूरोप को क्लोबियस द्वारा सोलहवीं शताब्दी में हुआ।

समयज्ञानम्

1:00 एकवादनम्

1:05 पञ्चाधिक एकवादनम्

1:10 दशाधिक एकवादनम्

1:15 सपाद एकवादनम्

1:20 विंशत्यधिक एकवादनम्

1:25 पञ्चविंशत्यधिक एकवादनम्

1:30 सार्ध एकवादनम्

1:35 पञ्चत्रिंशतधिक एकवादनम्

1:40 चत्वारिंशतधिक एकवादनम्

1:45 पादोन द्विवादनम्

1:50 दशोन द्विवादनम्

1:55 पञ्चोन द्विवादनम्

2:00 द्विवादनम्

रविवार, 27 नवंबर 2016

हास्यकणिका:

अद्यत्वे तु दूरदर्शने धार्मिककार्यक्रमाणाम् एतावान् अतिरेकः जातः अस्ति यत् शयनसमये पादौ दूरदर्शनसञ्चस्य दिशि प्रसारयितुं धार्ष्ट्यमेव न भवति, शापितः तु न भविष्यामि इति भीत्या
😀😀😀

स्वयम्प्रचोदनप्रणाल्याः (self start) योजनेन तु अधुना चपेटाप्रहारेण अधः पतन्तः कृशयष्टयः जनाः अपि स्थूलकायं बुलैटयानं चालयन्तः उपश्लाघां प्रदर्शयन्ति
😀😀😀

भग्नं प्रेम पुनः लभेत किन्तु चोरितं यानमार्जनवस्त्रं तु न कदापि लभेत। अहो जघन्यं चौर्यम्।
😀😀😀

जङ्गमदूरवाणिसञ्चोपयोगस्य एतावता अतिरेकं भूतमस्ति, ह्यः प्रतिवेशिनि आसन्दे उपविष्टः एकः सहसैव वृत्तपत्रस्थं चित्रं द्वाभ्याम् अङ्गुलीभ्यां नुत्त्वा उपसर्पणं (zoom in)कर्तुम् उद्यतः।
😀😀😀

यः भवते इच्छिते समये तमाखुं यच्छति तं कदापि मा पीडयतु।
😀😀😀

उपवेशने वरिष्ठेनोक्ते विनोदे यस्य हास्यरवः उच्चतमः अस्ति, ज्ञातव्यं यत् तस्य मासिकऋणार्पणराशिः (EMI) सर्वाधिकास्ति
😀😀😀

भक्ति पावनत्व

1. मय्यर्पितात्मनः सभ्य ! निरपेक्षस्य सर्वतः।
मयाऽऽत्मना सुखं यत्तत् कुतः स्याद् विषयात्मनाम्।।
अर्थः
हे साधो उद्धव ! सर्वथा निष्काम बने और मुझे आत्मसमर्पण कर मुझसे आत्मस्वरूप हुए पुरुषों को जो सुख मिलता है, वह विषयों में डूबे मनुष्यों को कहाँ मिल सकेगा?

2. अकिंचनस्य दांतस्य शांतस्य समचेतसः।
मया संतुष्टमनसः सर्वाः सुखमया दिशः।।
अर्थः
पूर्ण अपरिग्रही, इंद्रियजयी, शांत, समदर्शी और मेरी प्राप्ति से संतुष्ट-चित्त मेरे भक्त के लिए दसों दिशाएँ सुखमय होती हैं।

3. न पारमेष्ठयं न महेंद्र-धिष्ण्यं
न सार्वभौमं न रसाधिपत्यम्।
न योग-सिद्धीर् अपुनर्भवं वा
मय्यर्पितात्मेच्छिति मदुविनान्यत्।।
अर्थः
मुझे आत्मसमर्पण करने वाला मेरा अनन्य भक्त मुझे छोड़कर ब्रह्मलोक, महेंद्रपद, सार्वभौमत्व, पाताल का आधिपत्य, अनेक योग सिद्धियाँ या मोक्ष तक- किसी की भी अभिलाषा नहीं रखता।

4. निरपेक्षं मुनि शांतं निर्वैरं समदर्शनम्।
अनुव्रजाम्यहं नित्यं पूयेयेत्यंघ्रि-रेणुभिः।।
अर्थः
निष्काम, शांत, निर्वैर और समदृष्टि मुनि की चरण-धूलि से मैं पवित्र होऊँ, इसलिए (उनके कदम पर कदम रखते हुए) सदैव उनके पीछे-पीछे चलता रहता हूँ।

5. निष्किंचना मय्यनुरक्त चेतसः
शांता महांतोऽखिल-जीव-वत्सलाः।
कामैरनालब्ध-धियो जुषन्ति यत्
तन्नैरपेक्ष्यं न विदुः सुखं मम॥
अर्थः
किसी भी उपाधि अर्थात संग्रह से रहित, मुझमें अनुरक्त-चित्त, शांत, विशाल हृदय, सब प्राणियों पर प्रेम करने वाले, किसी भी प्रकार की वासना से अस्पृष्ट-बुद्धि मेरे भक्त जिस निरपेक्ष सुख का अनुभव करते हैं, वह दूसरों की समझ में नहीं आ सकता।

6. बाध्यमानोऽपि मद्भक्तो विषयैरजितेंद्रियः।
प्रायः प्रगल्भया भक्त्या विषयैर् नाभिभूयते॥
अर्थः
मेरा जो भक्त इंद्रियों पर विजय नहीं पा सका है और इसी कारण विषय जिसे बार-बार परेशान करते हैं, (उसकी) मुझमें दृढ़ भक्ति होने पर साधारणत: विषय उसे नहीं सताते।

7. भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयाऽऽत्मा प्रियः सताम्।
भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि संभवात्॥
अर्थः
सज्जनों का अत्यंत प्रिय और उनकी एकमात्र आत्मा में केवल श्रद्धापूर्ण एकनिष्ठ भक्ति से ही वश होता हूँ। मेरी अनन्यभक्ति चांडालों को भी उनके हीन जन्म-कुल से पावन कर देती है।

8. कथ विना रोमहर्षं द्रवता चेतसा विना।
विनाऽऽनंदाश्रु-कलया शुद्धयेद् भक्त्या विनाऽऽशयः॥
अर्थः
जब तक शरीर पुलकित नहीं हो उठता, हृदय गद्गद नहीं हो जाता, नेत्रों से आनंदत के अश्रु छलकने नहीं लगते, भक्ति नहीं होती, तब तक (मलिन) हृदय शुद्ध कैसे होगा?

9. वाग् गद्गदा द्रवते यस्य चित्तं
रुदत्यभीक्ष्णं हसति क्वचित् च।
विलज्ज उद्गायति नृत्यते च
मद्भक्ति-युक्तो भुवनं पुनाति॥
अर्थः
प्रेम से जिसकी वाणी गद्गद हो गयी है, चित्त प्रेमार्द्र हो गया है, प्रेम के अतिरेक से जो लगातार आँसू बहाता है, कभी हँसता है, तो कभी लाज छोड़कर ज़ोर-ज़ोर से गाता-नाचता है, ऐसा मेरा भक्त सारे जगत को पवित्र करता है।

10. यथाग्निना हेम मलं जहाति
ध्मातं पुनः स्वं भजते च रूपम्।
आत्मा च कर्मानुशयं विधूय
मद्भक्ति-योगेन भजत्यथो माम्॥
अर्थः
जैसे आग में डालकर तपाया हुआ सोना अपना मैल त्यागकर पुनः अपना असली निखरा रूप प्राप्त कर लेता है, वैसे ही मेरे भक्त की आत्मा मेरे भक्तियोग से कर्म वासना (यानि चित्त का मैल) धुल जाने पर तत्काल मेरे स्वरूप को प्राप्त हो जाती है।

11. यथा यथाऽऽत्मा परिमृज्यतेऽसौ
मत्पुण्यगाथा-श्रवणाभिधानैः।
तथा तथा पश्यति वस्तु सूक्ष्मं
चक्षुर् यथैवांजन-संप्रयुक्तम्॥
अर्थः
मेरी पुण्य-गाथाओं के श्रवण और कीर्तन से ज्यों-ज्यों आत्मा निर्मल होती जाती है, त्यों-त्यों अंजन डालने पर आँखों को जिस तरह गुप्त बातें दीखने लगती हैं, उस तरह मेरे भक्त को सूक्ष्म यानि इंद्रियों से अगोचर परमात्म-वस्तुएँ दिखाई पड़ने लगती हैं।

12. विषयान् ध्यायतश् चित्तं विषयेषु विषज्जते।
मामनुस्मरतश् चित्तं मय्येव प्रविलीयते॥
अर्थः
विषयों का ध्यान करने वाला चित्त विषयों मे आसक्त हो जाता है। इस तरह दिन रात मेरा चिन्तन करने वाले का चित्त मुझमें ही लीन हो जाता है।
13. तस्मादसदभिध्यानं यथा स्वप्न-मनोरथम्।
हित्वा मयि समाधत्स्व मनो मद्भाव-भावितम्॥
अर्थः
इसलिए स्वप्न-मनोरथों की तरह रहने वाली मिथ्याभूत असत वस्तुओं का चिन्तन छोड़कर श्रद्धायुक्त भक्ति से भरा अपना चित्त मुझमें सुस्थिर कर दो।

शनिवार, 26 नवंबर 2016

क्रियापदानि

🕉क्रियापदानि🕉
😀 - हसति
😬 - निन्दति
😭 - रोदिति
😇 - भ्रमति
🤔 - चिन्तयति
😡 - कुप्यति
😴 - स्वपिति
😩 - क्षमां याचते / जृम्भते
😳 - विस्मयो भवति / निर्निमेषं पश्यति
😌 - ध्यायति
👁 - पश्यति
🗣 - वदति
✍ - लिखति
🙏� - प्रणमति
👉 - निर्दिशति
🙌 - आशिषति
�👃 - जिघ्रति
🚶🏻- गच्छति
🏃🏻- धावति
💃🏻 - नृत्यति
🏊 - तरति

शनिवार, 19 नवंबर 2016

गुरुवार, 17 नवंबर 2016

संस्कृतसम्भाषण सिखने का सुनहरा अवसर

शीतकालीन सप्तदिवसीय  आवासीयभाषाबोधनवर्ग:
संस्कृतभारती,जयपुरविभाग:

समय: -: 24/12/2016 सायंत: 31/12/2016 मध्याह्न पर्यन्तम्।

स्थानम्-: परिष्कार-महाविद्यालय: (कॉलेज ),मानसरोवरम्, जयपुरम्।

शुल्कम्-: 400/- प्रतिछात्रम्।

ध्यातव्यम् -
1. दशदिवसीय सामाजिक- शिविरकृतशिविरार्थिन: एव प्रवेशार्थमर्हा।
2. संस्कृतभारत्या: कार्यकृतिभि: ससूची प्रेषितानां कृते एव प्रवेश: भविष्यति।
3. आशिविरं बहिर्गमनस्य अनुमति: नास्ति एव।
4. प्रतिदिनं गमनागमनस्य इच्छुकानां कृते अनुमति: नास्ति एव।

सम्पर्कसूत्राणि :-
📞 अभिनव उपाध्याय - 9887115748
(जयपुर विभाग सह संयोजक)
📞 दीपक शास्त्री - 9314594380
(जयपुर महानगर प्रचार प्रमुख)

गुरुवार, 10 नवंबर 2016

हिंदी वर्णमाला।

                                    हिंदी वर्णमाला पढ़ने से पहले हम समझते हैं कि वर्ण क्या होते हैं। वर्ण वह मूल ध्वनि होती है, जिसका विभाजन नहीँ हो सकता। इन्हीँ वर्णों को चिन्हित करने के लिए जिन चिन्हों का प्रयोग किया जाता है, उन्हें अक्षरकहते हैँ और अक्षर का भी यही अर्थ होता है, जिसे क्षर अथवा खंडित न किया जा सके।
                                    सभी भाषाओं की अपनी वर्णमाला होती है जिसमें उस भाषा की मूल ध्वनियां दी गई होती हैं। हिंदी वर्णमाला में कुल 44 वर्ण हैं जिसमें 11 स्वर एवं 33 व्यंजन हैं।
स्वर-
                                    स्वर ऐसे वर्ण हैं जिनका उच्चारण करते समय वायु बिना किसी रूकावट के मुख से बाहर निकलती है।
स्वर कुल 11 हैं-
1. अ,
2. आ,
3. इ,
4. ई,
5. उ,
6. ऊ,
7. ऋ,
8. ए,
9. ऐ,
10. ओ,
11. औ।
व्यंजन-
                                    जिन वर्णों का उच्चारण करते हुए हमारी वायु मुँह के किसी भाग (तालु, ओष्ठ, दाँत, वर्त्स आदि) से टकराकर बाहर आती है, उन्हें व्यंजन कहते हैं।
उदाहरण-
के उच्चारण में होठों के पास वायु का अवरोध होता है। अतः व्यंजन यह व्यंजन हैं।
हिन्दी वर्णमाला में मूल 33 व्यंजन हैं।
1. क
2. ख
3. ग
4. घ
5. ङ
(कवर्ग)
6. च
7. छ
8. ज
9. झ
10. ञ
(चवर्ग)
11. ट
12. ठ
13. ड
14. ढ
15. ण
(टवर्ग)
16. त
17. थ
18. द
19. ध
20. न
(तवर्ग)
21. प
22. फ
23. ब
24. भ
25. म
(पवर्ग)
26. य
27. र
28. ल
29. व
30. श
31. ष
32. स
33. ह
स्वर की परिभाषा-
                                    स्वर ऐसे वर्ण हैं जिनका उच्चारण करते समय वायु बिना किसी रूकावट के मुख से बाहर निकलती है।
स्वर कुल 11 हैं-
1. अ,
2. आ,
3. इ,
4. ई,
5. उ,
6. ऊ,
7. ऋ,
8. ए,
9. ऐ,
10. ओ,
11. औ।
को छोड़कर सभी स्वरों के लिए मात्रा-चिह्न बनाए हैं-
स्वर = मात्रा = उदाहरण
अ = ×,
आ = ा = का,
इ = ि = कि,
ई = ी = की,
उ = ु = कु,
ऊ = ू = कू,
ऋ = ृ = कृ,
ए = े = के,
ऐ = ै = कै,
ओ = ो = को,
औ = ौ = कौ।
स्वरों का वर्गीकरण-
1. उच्चारण समय के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण-
१. हृस्व स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में सबसे कम समय लगता है, उन्हें हृस्व स्वर कहते हैं।
उदाहरण- अ, , उ।
२. दीर्घ स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में हृस्व से अधिक समय लगता है, उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं।
उदाहरण- आ, , , , , औ।
2. उच्चारण के स्थान के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण-
१. अग्र स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का आगे का भाग सक्रिय रहता है, वे अग्र स्वरकहलाते हैं।
उदाहरण , , , , ऐ।
२. पश्च स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में जिह्वा का पिछला भाग सक्रिय रहता है, वे पश्च स्वरकहलाते हैं।
उदाहरण , , , , औ ।
3. ओष्ठ की स्थिति के आधार पर स्वर-
१. वृत्ताकार अथवा वर्तुल स्वर इनके उच्चारण में होठों का आकार गोल हो जाता है।
उदाहरण-
, , , औ।
२. अवृत्ताकार अथवा अवर्तुल स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में होठ गोल नहीं खुलें, उन्हें अवृत्ताकार स्वर कहते हैं।
उदाहरण- अ, , , , , ऐ।
4. मुखाकृति के आधार पर स्वरों का वर्गीकरण-
१. संवृत्त स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में मुख कम खुले, उन्हें संवृत्त स्वरकहते हैं।
उदाहरण- ई, ऊ।
२. अर्द्धसंवृत्त स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में मुख संवृत्त स्वरों से थोड़ा अधिक खुलता है, वे अर्द्धसंवृत्त स्वर कहलाते हैं।
उदाहरण , ओ।
३. विवृत्त स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में मुख अधिक खुलता है, उन्हें विवृत्त स्वर कहते हैं।
उदाहरण आ।
४. अर्द्धविवृत स्वर विवृत्त स्वर से थोड़ा कम और अर्द्धसंवृत्त से थोड़ा अधिक मुख खुलने पर जिन स्वरों का उच्चारण होता है, उन्हें अर्द्धविवृत्त स्वर कहते हैं।
उदाहरण ऐ ।
(क्रमशः)