गुरुवार, 29 सितंबर 2016

संस्कृत अभ्यास।

संस्कृत अभ्यास।
  • "ईदृश - तादृश - कीदृश"
  • ईदृशः सुधाखण्डः अस्ति वा ? 
  • तादृशः स्यूतः नास्ति ।
  • ईदृशः बालकः मार्गे आसीत् । 
  • तादृशः वृद्धः ग्रामे अस्ति ।
  • तादृशी बालिका । 
  • ईदृशी मापिका । 
  • तादृशी द्रोणी ।
  • ईदृशी उत्पीठिका । 
  • तादृशी घटी ।
  • ईदृशम् आसनम् । 
  • तादृशं गृहम् । 
  • ईदृशं वस्त्रम् । 
  • तादृशं कङ्कणम् ।
  • तादृशं पुस्तकम् । 
  • ईदृशं पुष्पम् ।
  • कीदृशः ग्रन्थः अस्ति ? 
  • कीदृशी संस्कृतिः अस्ति ?
  • तत्र कीदृशं फलम् अस्ति ?

बुधवार, 28 सितंबर 2016

संस्कृत वाक्य।

"संस्कृतवाक्य"

संस्कृत और उनके हिन्दी समतुल्य वाक्यों को गौर से देखें और पढें।
१) अहं रुपा। मैं रुपा।
२) अहं चित्रा। मैं चित्रा।
३) अहं गच्छामि। मैं जाता हूँ।
४) अहं खादामि। मैं खाता हूँ।
५) गच्छामि। मैं जाता हूँ।
६) खादामि। मैं खाता हूँ।
७) अहं वदामि। मैं बोलता हूँ।
८) अहं पठामि। मैं पढता हूँ।
९) वदामि। मैं बोलता हूँ।
१०) पठामि। मैं पढता हूँ।

रविवार, 25 सितंबर 2016

क्यों संस्कृत सर्वोत्तम भाषा है ??

क्यों संस्कृत सर्वोत्तम भाषा है ??

                               संस्कृत विश्व की सब से प्राचीन भाषा है तथा समस्त भारतीय भाषाओं की जननी है। संस्कृत का शाब्दिक अर्थ है परिपूर्ण भाषा। संस्कृत पू्र्णतया वैज्ञायानिक तथा सक्षम भाषा है। संस्कृत भाषा के व्याकरण नें विश्व भर के भाषा विशेषज्ञ्यों का ध्यानाकर्षण किया है तथा उन के मतानुसार भी यह भाषा कम्पयूटर के उपयोग के लिये सर्वोत्तम भाषा है।

मूल ग्रंथ
                                संस्कृत भाषा की लिपि देवनागरी लिपि है। इस भाषा को ऋषि मुनियों ने मन्त्रों की रचना कि लिये चुना क्योंकि इस भाषा के शब्दों का उच्चारण मस्तिष्क में उचित स्पन्दन उत्पन्न करने के लिये अति प्रभावशाली था। इसी भाषा में वेद प्रगट हुये, तथा उपनिष्दों, रामायण, महाभारत और पुराणों की रचना की गयी। मानव इतिहास में संस्कृत का साहित्य सब से अधिक समृद्ध और सम्पन्न है। संस्कृत भाषा में दर्शनशास्त्र, धर्मशास्त्र, विज्ञान, ललित कलायें, कामशास्त्र, संगीतशास्त्र, ज्योतिषशास्त्र, हस्त रेखा ज्ञान, खगोलशास्त्र, रसायनशास्त्र, गणित, युद्ध कला, कूटनिति तथा महाकाव्य, नाट्य शास्त्र आदि सभी विषयों पर मौलिक तथा विस्तरित गृन्थ रचे गये हैं। कोई भी विषय अनछुआ नहीं बचा।

पाणनि रचित अष्याध्यायी
                                  किसी भी भाषा के शब्दों का शुद्ध ज्ञान व्याकरण शास्त्र कराता है। पाणनि कृत अष्याध्यायी संस्कृत की व्याकरण ईसा से 300 वर्ष पूर्व रची गयी थी। स्वयं पाणनि के कथनानुसार अष्टाध्यायी से पूर्व लग भग साठ व्याकरण और भी उपलब्द्ध थे।अष्याध्यायी विश्व की सब से संक्षिप्त किन्तु पूर्ण व्याकरण है। इस में भाषा का विशलेषण कर के शब्द निर्माण के मूल सिद्धान्त दर्शाये गये हैं। अंक गणित की पद्धति का प्रयोग कर के सभी शब्दों की रचना के सिद्धान्त संक्षिप्त में ही सीखे जा सकते हैं। संस्कृत में शब्द निर्माण पूर्णत्या वैज्ञानिक और तर्क संगत है। उदाहरण के लिये सिंहः शब्द हिंसा का प्रतीक है इस लिये हिंसक पशु को सिहं की संज्ञा दी गयी है। इसी प्रकार सम्पूर्ण विवरण स्पष्ट, संक्षिप्त तथा सरल हैं।

                                    भाषा विज्ञान के क्षेत्र में पाणनि रचित अष्याध्यायी निस्संदेह ऐक अमूल्य देन है। अष्टाध्यायी के आठ अध्याय और चार हजार सूत्र हैं जिन में विस्तरित ज्ञान किसी कम्प्रेस्सड  कमप्यूटर फाईल की तरह भरा गया है। उन में स्वरों (एलफाबेट्स) का विस्तृत विशलेषण किया गया है। इस का ऐक अन्य आश्चर्यजनक पक्ष यह भी है कि अष्टाध्यायी का मूल रूप लिखित नही था अपितु मौखिक था। उसे समर्ण रखना होता था तथा श्रुति के तौर पर पीढी दर पीढी हस्तांत्रित करना होता था। अभी अष्टाध्यायी के लिखित संस्करण उपलब्द्ध हैं, और व्याख्यायें भी उपलब्द्ध हैं। किन्तु फिर भी शब्दों की मूल उत्पत्ति को स्मर्ण रखना आवश्यक है। संस्कृत व्याकरण के ज्ञान के लिये अष्टाध्याय़ी मुख्य है।
                               पाणनि के पश्चात कात्यायन तथा पतंजलि जैसे व्याकरण शास्त्रियों ने भी इस ज्ञान को आगे विकसित किया था। उन के अतिरिक्त योगदान से संस्कृत और सुदृढ तथा विकसित हुयी और प्राकाष्ठा तक पहुँच कर बुद्धिजीवियों की सशक्त भाषा रही है

संस्कृत भाषा की वैज्ञनिकता
                    प्राचीन काल से ही भारत का भाषा ज्ञान ग्रीक तथा इटली से कहीं अधिक श्रेष्ठ तथा वैज्ञिानिक था। भारत के व्याकरण शास्त्रियों ने योरूपियन भाषा विशेषज्ञ्यों को शब्द ज्ञान का विशलेषण करने की कला सिखायी। यह तब की बात है जब अपने आप को आज के युग में सभी से सभ्य कहने वाले अंग्रेज़ों को तो बोलना भी नहीं आता था। आज से ऐक हजार वर्ष पूर्व वह उधार में पायी स्थानीय अपभ्रंश भाषाओं में योडलिंगकर के ऐक दूसरे से सम्पर्क स्थापित किया करते थे। अंग्रेजी साहित्य का इतिहास 1350 से चासर रचित केन्टरबरी टेल्सके साथ आरम्भ होता है जिसे फादर आफ इंग्लिश पोयट्रीकहा जाता है। विश्व की अन्तर्राष्ट्रीय भाषा अंग्रेज़ी के साथ संस्कृत की सीमित तुलना ही कुछ इस प्रकार करें तो संस्कृत की वैज्ञ्यानिक प्रमाणिक्ता के लिये हमें विदेशियों के आगे गिडगिडाने की कोई आवश्क्ता नहीं हैः-

          वर्ण-माला व्याकरण में किसी भी छोटी से छोटी ध्वनि को वर्ण या अक्षर कहते हैं और वर्णों के समूह  वर्णमाला। अंग्रेजी में कुल 26 वर्ण (एलफाबेट्स) हैं जिस का अर्थ है कि 26 शुद्ध ध्वनियों को ही लिपिबद्ध किया जा सकता है। यह 26 ध्वनियां भी प्राकृतिक नहीं है जैसे कि ऐफ़, क्यू, डब्लयू, ऐक्सआदि एलफाबेट्स को छोटे बच्चे आसानी से नहीं बोल सकते हैं। इस की तुलना में संस्कृत वर्णमाला में 46 अक्षर हैं जो संख्या में अंग्रेज़ी से लगभग दुगने हैं और प्राकृतिक ध्वनियों पर आधारित हैं।
            स्वर और व्यञ्जनों की संख्या अंग्रेजी और संस्कृत दोनों भाषाओं में अक्षरों को स्वर (कान्सोनेन्ट्स) और व्यञ्जन (वोवल्स) की श्रेणी में बाँटा गया है। स्वर प्राकृतिक ध्वनियाँ होती हैं। व्यञ्जनों का प्रयोग प्राकृतिक ध्वनियों को लम्बा या किसी वाँछित दिशा में घुमाने के लिये किया जाता है जैसे का, की कू चा ची चू आदि। अंग्रेजी भाषा में केवल पाँच वोवल्स हैं जबकि संस्कृत में उन की संख्या 13 है। विश्व की अन्य भाषाओं की तुलना में संस्कृत के स्वर और व्यंजनो की संख्या इतनी है कि सभी प्रकार की आवाजों को वैज्ञानिक तरीके से बोला तथा लिपिबद्ध किया जा सकता है।
                सरलता अंग्रेज़ी भाषा में बहुत सी ध्वनियों को जैसे कि ख, ठ. ढ, क्ष, त्र, ण आदि को वैज्ञ्यानिक तरीके से लिखा ही नहीं जा सकता।
         अंग्रेज़ी में के ऐ टी कैटलिखना कुछ हद तक तो माना जा सकता है क्यों कि वोवल का उच्चारण भी स्थाई नहीं है और रिवाज के आधार पर ही बदलता रहता है। लेकिन सी ऐ टी – ‘केटलिखने का तो कोई वैज्ञ्यानिक औचित्य ही नहीं है। इस के विपरीत देवनागरी लिपि का प्रत्येक अक्षर जिस प्रकार बोला जाता है उसी प्रकार ही लिखा जाता है। अंग्रेज़ी का डब्लयूकिसी प्राकृतिक आवाज को नहीं दर्शाता, ना ही अन्य अक्षर व्हीसे कोई प्रयोगात्मिक अन्तर को दर्शाता है। दोनो अक्षरों के प्रयोग और उच्चारण का आधार केवल परम्परायें हैं, वैज्ञ्यानिक नहीं। अतः सीखने में संस्कृत अंग्रेज़ी से कहीं अधिक सरल भाषा है।
          उच्चारण कहा जाता है अरबी भाषा को कंठ से और अंग्रेजी को केवल होंठों से ही बोला जाता है किन्तु संस्कृत में वर्णमाला को स्वरों की आवाज के आधार पर कवर्ग, चवर्ग, टवर्ग, तवर्ग, पवर्ग, अन्तःस्थ और ऊष्म वर्गों में बाँटा गया है। फिर शरीर के उच्चारण अंगों के हिसाब से भी दन्तर (ऊपर नीचे के दाँतों से बोला जाने वाला), तलबर (जिव्हा से), मुखोपोत्दर (ओष्ट गोल कर के), कंठर ( गले से) बोले जाने वाले वर्गों में वर्गीकृत किया गया है। अंग्रेजी में इस प्रकार का कोई विशलेशण नहीं है सब कुछ रिवाजानुसार है।

यह संस्कृत भाषा की अंग्रेज़ी भाषा की तुलना में सक्ष्मता का केवल संक्षिप्त उदाहरण है। 1100 ईसवी तक संस्कृत समस्त भारत की राजभाषा के रूप सें जोडने की प्रमुख कडी थी।

भारत की सांस्कृतिक पहचान
                            प्रत्येक व्यक्ति, जाति तथा राष्ट्र की पहचान उस की वाणी से होती है। आज संसार में इंग्लैण्ड जैसे छोटे से देश की पहचान ऐक साम्राज्य वादी शक्ति की तरह है तो वह अंग्रेज़ी भाषा की बदौलत है जिसे उधार ली भाषा होने के बावजूद अंग्रेज़ जाति ने राजनैतिक शक्ति का प्रयोग कर के विश्व में अन्तर्राष्ट्रीय भाषा के तौर पर स्थापित कर रखा है। इस की तुलना में इच्छा शक्ति और आत्म सम्मान की कमी के कारण संसार की ऐक तिहाई जनसंख्या होने के बावजूद भी भारतवासी अपनी तथाकथित राष्ट्रभाषाहिन्दी को विश्व में तो दूर अपने ही देश में ही स्थापित नहीं कर सके हैं। हमारे पूर्वजों ने तो हमें बहुत कुछ सम्मानजनक विरासत में दिया था परन्तु यह ऐक शर्मनाक सच्चाई है कि हमारी वर्तमान पीढियाँ पूर्वजों दूारा अर्जित  गौरव के बोझ को सम्भाल पाने में असमर्थ रही हैं। उसी गौरव की ऐक उपलब्द्धी संस्कृत भाषा है जिस की आज भारत में ही उपेक्षा की जा रही है।
                                   हम अपनी पीठ थपथपा सकते हैं कि संस्कृत की गूंज कुछ साल बाद अंतरिक्ष में सुनाई दे सकती है। अमेरिका संस्कृत को नासाकी भाषा बनाने की कसरत में जुटा है क्योंकि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है।
                               रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के सामने अपने नाम से रख रहे हैं। दुनिया के 17 देशों में एक या अधिक संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी प्राप्तकरने के लिए जुटे हैं, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय भारत में नहीं है। हमारे देश में तो इंग्लिश बोलना शान की बात मानी जाती है। इंग्लिश नहीं आने पर लोग आत्मग्लानि अनुभव करते है जिस कारण जगह जगह इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स चल रहें है।

                             भारत की सरकार और लोगों को भी अब जागना चाहिए और अँग्रेजी की गुलामी से बाहर निकाल कर अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करना चाहिए। भारत सरकार को भी संस्कृतको नर्सरी से ही पाठ्यक्रम में शामिल करके देववाणी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाना चाहिए। केवल संस्कृत ही भारत के प्राचीन इतिहास तथा विज्ञान को वर्तमान से जोडने में सक्षम है। यदि हम भारत में संस्कृत की अवहेलना करते रहे तो हम अपने समूल को स्वयं ही नष्ट कर दें गे जो सृष्टि के निर्माण काल से वर्तमान तक की अटूट कडी है। नहीं तो फिर हमें संस्कृत सीखने के लिये विदेशों में जाना पडेगा।


मंगलवार, 20 सितंबर 2016

नागौर शहर में अब केवल 20 घण्टों में संस्कृत बोलना सीखिये।


नागौर शहर में अब केवल 20 घण्टों में संस्कृत बोलना सीखिये।

                     नागौर शहर में अब केवल 20 घण्टों में संस्कृत बोलना सीखिये। संस्कृत भारती द्वारा आयोजित दस दिवसीय संस्कृत सम्भाषण शिविर।
स्थान- हनुमानजी का मन्दिर किसान छात्रावास के पास नागौर
अवधि- 25 से सितम्बर 2016 से 4 अक्टुबर 2016
समय: शाम 4: 30 से 6:30 बजे तक।
कोई भी संस्कृत प्रेमी भाग ले सकता है।
बिना किसी पूर्व ज्ञान संस्कृत सीखने का अभूतपूर्व अवसर।
सम्पर्क सूत्रं संयोजक: श्रीमांगीलालदेवड़ा 09214833253
शिविरशिक्षक -लीलाधर शर्मा 9251284895

मम देशो भारतं मम भाषा संस्कृतं।

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

संस्कृत कथा - कुम्भ-विद्या।

कुम्भ-विद्या :-
                                   एकस्मिन् ग्रामे एकः कृषकः आसीत्। तस्य नाम भोलारामः आसीत्। एकस्मिन् वर्षे वर्षायाः अभावेन तस्य क्षेत्रे अन्नम् उत्पन्नम् न अभवत्। अन्नाभावेन सः क्षेत्रस्य शुल्कम् दातुम् अपि असमर्थः अभवत्। अन्यस्मिन् दिने सः गृहं त्यक्त्वा बहिः अगच्छत्। सः खिन्नः सर्वम् दिनम् व्यर्थम् अभ्रमत्। बुभुक्षितः श्रान्तः च सः एकस्य वृक्षस्य छायायाम् सुप्तवान्। अर्धरात्रौ जागृतः सः अग्रे मन्दिरात् अवतरन्तम् कञ्चित् जनम् अपश्यत्। तस्य जनस्य हस्ते एकः विचित्रः कुम्भः आसीत्।
                            कृषकः अपश्यत् यत् सः जनः प्रसन्नः भूत्वा कुम्भम् धरायाम् स्थापितवान्। रेखाम् उत्कीर्य कुम्भम् परितः सः आज्ञापयत्---"हे कुम्भ, मह्यम् सुन्दरम् विष्टरम् आनय। तदनन्तरम् स्वादिष्टम् भोजनम् शीतलम् जलम् चानय। सेविकाः अपि आगच्छन्तु।।"
                               तत्क्षणमेव तत्र सुन्दरम् विष्टरम् सुसज्जितम् अभवत्। चतस्रः सेविकाः आगच्छन्। ताः सेविकाः स्वर्ण-पात्रे भोजनम्, रजत-कलशे जलम् आनीय तत्र उपस्थिताः अभवन्। बुभुक्षितः सः जनः सर्वम् अभक्षयत्। ततः सः कुम्भम् अवदत्---"हे कुम्भ, सर्वम् तुप्तम् कुरु।"
                                  तदा सर्वम् लुप्तम् अभवत्। सः कुम्भम् वस्त्रेण आच्छाद्य चलितुम् अयतत। चकितः भोलारामः धावित्वा तम् जनम् उपागच्छत्। तस्य पादयोः पतित्वा तम् अकथयत्---"हे दयालो , अहम् अति निर्धनः अस्मि। मयि कुपां कुरु। अनेन कुम्भेन मम सहायताम् कुरु।"
                                    सः दयालुः जनः प्रत्यवदत्---"हे कृषक, धैर्यधारणम् कुरु। कदाचित् अहम् अपि त्वादृशः इव निर्धनः आसम्। मुमुर्षुः अहम् एकस्मात् साधोः इमाम् कुम्भ-विद्याम् प्राप्तवान्। सप्तभिः दिनैः मन्त्रजपेन विद्या प्राप्ता भवति। इयम् विद्या अद्यैव सिद्धिम् गता अस्ति। अहम् कुम्भम् अद्य प्राप्तवान्। कुम्भम् गृृहीत्वा बहिः आगच्छम्। कुम्भविद्यायाः परीक्षणाय भोजनादिकम् सर्वम् आदिष्टवान्। त्वम् सर्वम् दृष्टवान् एव यत् कुम्भे असीमा शक्तिः अस्ति।य़ त्वमपि कुम्भ-विद्यायाः ज्ञानम् लभस्व। अथवा इमम् कुम्भम् एव गृहाण द्वयोः एकम् प्राप्स्यसि।"
                                  तस्य कथनं श्रुत्वा प्रसन्नः भोलारामः सप्तदिवसीयम् जपम् उपेक्ष्य कुम्भम् एव तम् अयाचत। सः जनः कुम्भात् धनम् गृहीत्वा भोलारामाय कुम्भम् अयच्छत्। भोलारामः कुम्भम् एकम् रथम् अयाचत। तम् रथम् आरुह्य सः गृहम् अगच्छत्। गृहम् आगत्य सः कुम्भम् प्रभूतम् धनम् अयाचत। धनेन सः सुन्दरम् गृहम् निर्मितवान्।
                                   एकस्मिन् दिवसे भोलारामः सर्वान् सम्बन्धिनः परिचितान् च भोजनाय निमन्त्रितवान्। उत्सव-समये भोलारामः कुम्भम् शिरसि निधाय अनृत्यत्। अकस्मात् पतितः कुम्भः पादाघातेन शकलीभूतः अभवत्। स्फुटिते कुम्भे सर्वम् लुप्तम् अभवत्। सर्वे तम् उपाहसन्। दुःखितः भोलारामः अचिन्तयत्--"अहम् किम् कृतवान्। कुम्भम् प्राप्तवान् कुम्भविद्याम् न ज्ञातवान् अहो मम दुर्भाग्यम्।"