शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

व्याकरण के आद्य गुरु हैं भगवान् शंकर।

व्याकरण के आद्य गुरु हैं भगवान् शंकर
                         भगवान् शंकर के विद्याभ्यासनी स्वभाव के विषय में कहा गया है कि वे महान् और सबके लिये मंगलकारी समस्त कलाकदम्ब रूपी मंजरियों के रस का अस्वादन करने वाले मधुव्रत अर्थात् भौंरे हैं-
अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमन्जरी ।
रसप्रवाहमाधुरीविज्रिम्भनामधुव्रतम् ।। (श्रीशिवताण्डवस्तोत्रम् १०)

                           ऐसी ही विद्याओं में एक विद्या है व्याकरण शास्त्र रूपी विद्या, जिसके भगवान् शंकर न केवल उद्भावक (सुलभ: सुव्रत: शुरो ब्रह्मवेदनिधिर्निधि: श्री शिवसहस्रनाम २८) हैं अपितु उनका आस्वादन करने वाले भ्रमर, उनमें अवगाहन करने वाले राजहंस स्वरूप भी हैं।
                              ब्रह्मवेद निधि का अभिप्राय ही है कि श्री ब्रह्मा जी के उत्पत्ति स्थान हैं अपितु वेद का भी प्रादुर्भाव स्वयं भगवान् शंकर से ही हुआ है। वेद के प्रादुर्भावक होने से श्री भगवान् शंकर व्याकरण के स्वतः प्रादुर्भावक सिद्ध हो जाते हैं, अंगी के ग्रहण होने से अंग का ग्रहण होना स्पष्ट है।
                            उदाहरणार्थ पाणिनीय व्याकरण के विषय में ही देख लीजिये, यह सर्वविदित है कि महान् वैयाकरण पाणिनि ने संस्कृत-व्याकरण के १४ सूत्रों की रचना की, वह श्री भगवान् शिव के प्रेरणा-प्रसाद से की है। शालातुर ग्राम में जन्मे तथा महर्षि पाणि व उनकी भार्या दाक्षी के पुत्र पाणिनि उपवर्षाचार्य के शिष्य थे।
                                 पाणिनि के विषय में यह इतिवृत्त प्रसिद्ध है कि उन्होंने प्रयाग में अक्षयवट के नीचे जहाँ सनकादि ऋषिगण तपस्या कर रहे थे, वहीँ जाकर घोर तपस्या की, कुछ दिनों बाद उनकी विकट तपश्चर्या से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शंकर ने ताण्डव करते हुए उनको दर्शन दिएतथा चौदह बार अपना डमरू बजा कर उन तपस्वियों का अभीष्ट सिद्ध किया।
नृत्ताऽवसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपंचवारम् ।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धाः नेतद्विमर्षम् शिवसूत्रजालम् ।।
नंदिकेश्वर कृत्त काशिका” (टीका)
                             पाणिनि को उसी डमरू के शब्दों से चतुर्दश (चौदह) माहेश्वर सूत्र उपलब्ध हुए, जिसके आधार पर उन्होंने सुबद्ध अष्टाध्यायी की रचना की। से तक जो वर्णमाला शिवजी के डमरू बजाने से पाणिनि को प्राप्त हई, उसे अक्षरसमाम्नाय भी कहते है। ये माहेश्वर सूत्र इस प्रकार हैं
1.    अ इ उ ण् ।
2.    ॠ ॡ क् ।
3.    ए ओ ङ् ।
4.    ऐ औ च् ।
5.    ह य व र ट् ।
6.    ल ण् ।
7.    ञ म ङ ण न म् ।
8.    झ भ ञ् ।
9.    घ ढ ध ष् ।
10.ज ब ग ड द श् ।
11.ख फ छ ठ थ च ट त व् ।
12.क प य् ।
13.श ष स र् ।
14.ह ल् ।
                               इसके आगे के इतिवृत्त में यह भी आता है कि पाणिनि के व्याघ्र द्वारा ग्रसित होकर शिवलोकवासी होने पर तथा उनके शब्दानुशासन को नष्ट होता हुआ देख कर महादेव ने शेषशायी भगवान विष्णु से कहा की कि शेषनाग पाणिनीय व्याकरण पर महाभाष्य करने के लिए भूतल पर अवतार ग्रहण करें।

                         फलतः पतंजलि के रूप में शेषावतार हुआ और पतंजलि महेश्वर के अनुग्रह से व्याकरण शास्त्र में पारंगत होकर विश्व-विभूति बने। महान् अद्वैत सिद्धान्ताचार्य श्रीहर्ष ने भी उनके महाभाष्य को फणिभाषितभाष्य कहा है।

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