बुधवार, 24 अगस्त 2016

संस्कृत भाषा‬ की उपयोगिता।

संस्कृत भाषा की उपयोगिता

                संस्कृत का अध्ययन मनुष्य को सूक्ष्म विचारशक्ति प्रदान करता है। मन स्वाभाविक ही अंतर्मुख होने लगता है। इसका अध्ययन मौलिक चिंतन को जन्म देता है। संस्कृत भाषा के पहले की कोई अन्य भाषा, संस्कृत वर्णमाला के पहले की कोई अन्य वर्णमाला देखने-सुनने में नहीं आती। इसका व्याकरण भी अद्भुत है। ऐसा सर्वांगपूर्ण व्याकरण जगत की किसी भी अन्य भाषा में देखने में नहीं आता। यह संसार भर की भाषाओं में ‪‎प्राचीनतम और समृद्धतम है।
स्वामी ‪‎विवेकानंदजी के शब्द हैं : संस्कृत शब्दों की ध्वनिमात्र से इस जाति को शक्ति, बल और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है।'
                                       संस्कृत का अखंड प्रवाह पाली, प्राकृत व अपभ्रंश भाषाओं से होता हुआ आज तक समस्त भारतीय भाषाओं में बह रहा है। चाहे तमिल, कन्नड़ या बँगला हो, मलयालम, उड़िया, तेलगू, मराठी या पंजाबी हो - सभी ‪‎भारतीय भाषाओं के लिए संस्कृत ही अन्तःप्रेरणा-स्रोत है। आज भी इन भाषाओं का पोषण और ‪‎संवर्धन संस्कृत द्वारा ही होता है। संस्कृत की सहायता से कोई भी उत्तर भारतीय व्यक्ति तेलगू, कन्नड़, उड़िया, मलयालम आदि दक्षिण एवं पूर्व भारतीय भाषाओं को ‪‎सरलतापूर्वक सीख सकता है।

                                 यदि इसके महत्त्व को समझकर इसका प्रयोग किया जाये तो इसके अगणित लाभ हो सकते हैं।
                                  संस्कृत की भाषा विशिष्टता को समझकर लन्दन के बीच बनी एक पाठशाला ने अपने जूनियर डिविजन में इसकी शिक्षा को अनिवार्य बना दिया है। श्री आदित्य घोष ने सन्डे हिंदुस्तान टाइम्स ( १० फरवरी, २००८ ) में इससे सम्बंधित एक लेख प्रकाशित किया था। उनके अनुसार लन्दन की उपर्युक्त पाठशाला के अधिकारीयों की यह मान्यता है कि संस्कृत का ज्ञान होने से अन्य ‪‎भाषाओँ को सिखने व समझने की शक्ति में अभिवृद्धि होती है। इसको सिखने से ‪‎गणित‪‎विज्ञान को समझने में आसानी होती है। Saint James Independent school नामक यह ‪‎विद्यालय ‪‎लन्दन के कैनिंगस्टन ओलंपिया क्षेत्र की डेसर्स स्ट्रीट में अवस्थित है। पाँच से दस वर्ष तक की आयु के इसके अधिकांश छात्र काकेशियन है। इस विद्यालय की आरंभिक कक्षाओं में संस्कृत अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित है।
                                 इस विद्यालय के बच्चे अपनी पाठ्य पुस्तक के रुप में रामायण को पढ़ते हैं। बोर्ड पर सुन्दर देवनागरी लिपि के अक्षर शोभायमान होते हैं। बच्चे अपने शिक्षकों से संस्कृत में प्रश्नोत्तरी करते हैं और अधिकतर समय संस्कृत में ही वार्तालाप करते हैं। कक्षा के उपरांत समवेत स्वर में श्लोकों का पाठ भी करते हैं। दृश्य ऐसा होता है मानो यह पाठशाला वाराणसी एवं हरिद्वार के कसीस स्थान पर अवस्थित हो और वहां पर किसी कर्मकांड का पाठ चल रहा हो। इस पाठशाला के शिक्षकों ने अनेक शोध-परीक्षण करने के पश्चात् अपने निष्कर्ष में पाया कि संस्कृत का ज्ञान बच्चों के सर्वांगीण विकास में सहायक होता है। संस्कृत जानने वाला छात्र अन्य भाषाओँ के साथ अन्य विषय भी शीघ्रता से सीख जाता है। यह निष्कर्ष उस विद्यालय के विगत बारह वर्ष के अनुभव से प्राप्त हुआ है।
                              Oxford_University से संस्कृत में Ph.D करने वाले डॉक्टर वारविक जोसफ उपर्युक्त विद्यालय के संस्कृत विभाग के अध्यक्ष हैं। उनके अथक लगन ने संस्कृत भाषा को इस विद्यालय के ८०० विद्यार्थियों के जीवन का अंग बना दिया है। डॉक्टर जोसफ के अनुसार संस्कृत विश्व की सर्वाधिक पूर्ण, परिमार्जित एवं तर्कसंगत भाषा है। यह एकमात्र ऐसी भासा है जिसका नाम उसे बोलने वालों के नाम पर आधारित नहीं है। वरन संस्कृत शब्द का अर्थ ही है "पूर्ण भाषा"। इस विद्यालय के प्रधानाध्यापक पॉल मौस का कहना है कि संस्कृत अधिकांश यूरोपीय और भारतीय भाषाओँ की जननी है। वे संस्कृत से अत्यधिक प्रभावित है। प्रधानाचार्य ने बताया कि प्रारंभ में संस्कृत को अपने पाठ्यक्रम का अंग बनाने के लिए बड़ी चुनौती झेलनी पड़ी थी।
                                  प्रधानाचार्य मौस ने अपने दीर्घकाल के अनुभव के आधार पर बताया कि संस्कृत सिखने से अन्य लाभ भी हैं। देवनागरी लिपि लिखने से तथा संस्कृत बोलने से बच्चों की जिह्वा तथा उँगलियों का कडापन समाप्त हो जाता है और उनमें लचीलापन आ जाता है। यूरोपीय भाषाएँ बोलने से और लिखने से जिह्वा एवं उँगलियों के कुछ भाग सक्रिय नहीं होते है। जबकि संस्कृत के प्रयोग से इन अंगों के अधिक भाग सक्रिय होते हैं। संस्कृत अपनी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता के कारण प्रमस्तिष्कीय (Cerebral) क्षमता में वृद्धि करती है। इससे सिखने की क्षमता, स्मरंशक्ति, निर्णयक्षमता में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि होती है। संभवतः यही कारण है कि पहले बच्चों का विद्यारम्भ संस्कार कराया जाता था और उसमें मंत्र लेखन के साथ बच्चे को जप करने के लिए भी प्रोत्साहित किया जाता था। संस्कृत से छात्रों की गतिदायक कुशलता (Motor Skills) भी विकसित होती है।
                                आज आवश्यकता है संस्कृत के विभिन्न आयामों पर फिर से नवीन ढंग से अनुसन्धान करने की, इसके प्रति जनमानस में जागृति लाने की; क्योंकि संस्कृत हमारी संस्कृति का प्रतीक है। संस्कृति की रक्षा एवं विकास के लिए संस्कृत को महत्त्व प्रदान करना आवश्यक है। इस विरासत को हमें पुनः शिरोधार्य करना होगा तभी इसका विकास एवं उत्थान संभव है।

                    भारतीय संस्कृति की सुरक्षा, चरित्रवान नागरिकों के निर्माण, प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति एवं विश्वशांति हेतु संस्कृत का अध्ययन अवश्य होना चाहिए।

शुक्रवार, 12 अगस्त 2016

नासा में हर वैज्ञानिक को अनिवार्य है संस्कृत क्लास, 15 दिनों की होती है क्लास।


नासा में हर वैज्ञानिक को अनिवार्य है संस्कृत क्लास, 15 दिनों की होती है क्लास।

                          अमरीकी अंतरीक्ष एजेंसी नासा (नेशनल एकेडमी फॉर स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन) में भर्ती होने वाले वैज्ञानिक के प्रशिक्षण काल में 15 दिन की संस्कृत की कक्षा लगती है। इसमें आर्यभट्ट, वराहमिहिर जैसे भारत के विद्वानों की ओर से दिए गए वैज्ञानिक सिद्धांत के अलावा मय दानव का दिया सूर्य सिद्धांत पढ़ाया जाता है। सूर्य सिद्धांत में ढाई हजार वर्ष पहले सौरमण्डल के सम्बंध में दिए गए तथ्य और आज के वैज्ञानिक तथ्यों का तुलनात्मक अध्ययन होता है।
                           नासा के अतिथि वैज्ञानिक, दिल्ली के डॉ. ओमप्रकाश पाण्डेय ने जोधपुर प्रवास के दौरान पत्रिका से विशेष बातचीत में बताया कि भारत का खगोल विज्ञान इतना अधिक समृद्ध था कि उसे अब वेद और वेदांग के जरिए वैज्ञानिक सीख रहे हैं। मय दानव ने 500 बीसी में सूर्य सिद्धांत के जरिए बताया कि पृथ्वी अपनी धुरी के साथ सूर्य के चारों और भी चक्कर लगाती है।
                      मय दानव ने एक साल की अवधि 365.24 दिन बताई। वर्तमान वैज्ञानिक सिद्धांत के अनुसार इसमें केवल 1.4 सैकेण्ड की ही त्रुटि है। मय दानव ने बुध से लेकर सभी ग्रहों और पृथ्वी के अपने अक्ष पर झुके होने की जानकारी दी थी। मय दानव का सिद्धांत आर्यभट्ट और वराहमिहिर की लिखी पुस्तकों में भी है।

मन को वाईफाई से जोडऩे में जुटे वैज्ञानिक
                         इसरो से जुड़े व नब्बे के दशक में प्रधानमंत्री के वैज्ञानिक सलाहकार रहे डॉ. पाण्डेय ने बताया कि वे और ब्रिटेन की वैज्ञानिक दाना जौहार चेतना पर काम कर रहे हैं। ऊर्जा वास्तव में जड़ है। वह केवल चेतना द्वारा नियंत्रित होती है। निर्जीव नजर आने वाले कुर्सी व पत्थर में भी चेतना है। किसी भी पदार्थ के एक सेंटीमीटर के एक अरबवें हिस्से में परमाणु होता है।

               इस परमाणु का दस लाख वां हिस्सा नाभिक है जिसमें प्रोटोन व न्यूटॉन होते हैं। नाभिक के चारों और इलेक्ट्रोन कण 85000 मील प्रति सैकेण्ड की रफ्तार से चक्कर लगाते हैं। इस नाभिक व इलेक्ट्रोन को मुक्त करने पर ऊर्जा निकलती है।
                         उन्होंने बताया कि अगर आप एकाग्र होकर किसी की मानसिक तरंगों को पकड़ते हो तो दूर बैठे दो व्यक्ति भी मन ही मन आपस में बात कर सकते हैं। यह आज के वाईफाई सिस्टम जैसा है। वर्तमान में मोड्यूलेटर माइक्रोवेव तरंगों सहित अन्य तरंगों को सिग्नल के रूप में ग्रहण करता है जबकि मन की मन से बात मानसिक तरंगों से होती है।

8 हजार साल पहले 360 दिन का होता था एक साल
                        डॉ. पाण्डेय ने बताया कि वेदों के अनुसार आठ हजार साल पहले पृथ्वी अपने अक्ष पर 22.1 डिग्री झुकी हुई थी (वर्तमान में 23.5 डिग्री पर झुकी है) तब एक साल 360 दिन का होता था। वर्तमान में 2016 एडी है। सन् 11800 एडी आने पर पृथ्वी 24.5 डिग्री झुक जाएगी तब एक साल 368 दिन का होगा।

अब यूनिवर्स नहीं मल्टीवर्स
                         वैज्ञानिक खोजों के साथ अब ब्रह्मण्ड यानी यूनिवर्स नाम का अस्तित्व खत्म हो चुका है। कई सारे ब्रह्मण्ड मिलने से अब इसे यूनिवर्स की जगह मल्टीवर्स कहा जाने लगा है। डॉ. पाण्डेय ने बताया कि हमारे चारों और 9 खरब आकाशगंगा हैं। पृथ्वी की आकाशगंगा के एक छोर से तीन लाख किलोमीटर प्रति सैकेण्ड की रफ्तार से यात्रा करें तो एक लाख वर्ष में हम एक आकाशगंगा के दूसरे छोर पर पहुंच पाएंगे।

अंतरिक्ष व पृथ्वी के बारे में तथ्य
एक आकाशगंगा यानी ब्रह्माण्ड की 14 भुजाएं हैं। एक भुजा में हमारे जैसे 200 से 300 सौरमण्डल हैं।
सूर्य के चारों और 3570 करोड़ किलोमीटर की परिधि है जिसमें आने वाले वस्तु को वह अपनी ओर खींचता है।
हमारी पृथ्वी 4.54 अरब वर्ष पहले अस्तित्व में आई।
करीब 3.8 अरब वर्ष पर पृथ्वी पर प्रकाश संश्लेषण के जरिए जीवन की शुरुआत हुई।

अमरीकी वैज्ञानिकों को हाल ही में भारत में शिवालिक की पहाडि़यों में 2.54 वर्ष पुराने मानव कंकाल मिले हैं जो ब्रिटेन के डार्विन के सिद्धांत को नकारते हैं।

शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

व्याकरण के आद्य गुरु हैं भगवान् शंकर।

व्याकरण के आद्य गुरु हैं भगवान् शंकर
                         भगवान् शंकर के विद्याभ्यासनी स्वभाव के विषय में कहा गया है कि वे महान् और सबके लिये मंगलकारी समस्त कलाकदम्ब रूपी मंजरियों के रस का अस्वादन करने वाले मधुव्रत अर्थात् भौंरे हैं-
अखर्वसर्वमंगलाकलाकदम्बमन्जरी ।
रसप्रवाहमाधुरीविज्रिम्भनामधुव्रतम् ।। (श्रीशिवताण्डवस्तोत्रम् १०)

                           ऐसी ही विद्याओं में एक विद्या है व्याकरण शास्त्र रूपी विद्या, जिसके भगवान् शंकर न केवल उद्भावक (सुलभ: सुव्रत: शुरो ब्रह्मवेदनिधिर्निधि: श्री शिवसहस्रनाम २८) हैं अपितु उनका आस्वादन करने वाले भ्रमर, उनमें अवगाहन करने वाले राजहंस स्वरूप भी हैं।
                              ब्रह्मवेद निधि का अभिप्राय ही है कि श्री ब्रह्मा जी के उत्पत्ति स्थान हैं अपितु वेद का भी प्रादुर्भाव स्वयं भगवान् शंकर से ही हुआ है। वेद के प्रादुर्भावक होने से श्री भगवान् शंकर व्याकरण के स्वतः प्रादुर्भावक सिद्ध हो जाते हैं, अंगी के ग्रहण होने से अंग का ग्रहण होना स्पष्ट है।
                            उदाहरणार्थ पाणिनीय व्याकरण के विषय में ही देख लीजिये, यह सर्वविदित है कि महान् वैयाकरण पाणिनि ने संस्कृत-व्याकरण के १४ सूत्रों की रचना की, वह श्री भगवान् शिव के प्रेरणा-प्रसाद से की है। शालातुर ग्राम में जन्मे तथा महर्षि पाणि व उनकी भार्या दाक्षी के पुत्र पाणिनि उपवर्षाचार्य के शिष्य थे।
                                 पाणिनि के विषय में यह इतिवृत्त प्रसिद्ध है कि उन्होंने प्रयाग में अक्षयवट के नीचे जहाँ सनकादि ऋषिगण तपस्या कर रहे थे, वहीँ जाकर घोर तपस्या की, कुछ दिनों बाद उनकी विकट तपश्चर्या से प्रसन्न होकर आशुतोष भगवान शंकर ने ताण्डव करते हुए उनको दर्शन दिएतथा चौदह बार अपना डमरू बजा कर उन तपस्वियों का अभीष्ट सिद्ध किया।
नृत्ताऽवसाने नटराजराजो ननाद ढक्कां नवपंचवारम् ।
उद्धर्तुकामः सनकादिसिद्धाः नेतद्विमर्षम् शिवसूत्रजालम् ।।
नंदिकेश्वर कृत्त काशिका” (टीका)
                             पाणिनि को उसी डमरू के शब्दों से चतुर्दश (चौदह) माहेश्वर सूत्र उपलब्ध हुए, जिसके आधार पर उन्होंने सुबद्ध अष्टाध्यायी की रचना की। से तक जो वर्णमाला शिवजी के डमरू बजाने से पाणिनि को प्राप्त हई, उसे अक्षरसमाम्नाय भी कहते है। ये माहेश्वर सूत्र इस प्रकार हैं
1.    अ इ उ ण् ।
2.    ॠ ॡ क् ।
3.    ए ओ ङ् ।
4.    ऐ औ च् ।
5.    ह य व र ट् ।
6.    ल ण् ।
7.    ञ म ङ ण न म् ।
8.    झ भ ञ् ।
9.    घ ढ ध ष् ।
10.ज ब ग ड द श् ।
11.ख फ छ ठ थ च ट त व् ।
12.क प य् ।
13.श ष स र् ।
14.ह ल् ।
                               इसके आगे के इतिवृत्त में यह भी आता है कि पाणिनि के व्याघ्र द्वारा ग्रसित होकर शिवलोकवासी होने पर तथा उनके शब्दानुशासन को नष्ट होता हुआ देख कर महादेव ने शेषशायी भगवान विष्णु से कहा की कि शेषनाग पाणिनीय व्याकरण पर महाभाष्य करने के लिए भूतल पर अवतार ग्रहण करें।

                         फलतः पतंजलि के रूप में शेषावतार हुआ और पतंजलि महेश्वर के अनुग्रह से व्याकरण शास्त्र में पारंगत होकर विश्व-विभूति बने। महान् अद्वैत सिद्धान्ताचार्य श्रीहर्ष ने भी उनके महाभाष्य को फणिभाषितभाष्य कहा है।