गुरुवार, 28 जुलाई 2016

संस्कृत भाषा के रहस्य – संस्कृति।

संस्कृत भाषा के रहस्य संस्कृति।
संस्कृत भाषा विश्व की प्राचीन भाषा है। इस भाषा को देव भाषा भी कहा जाता है, पुराने समय में नालंदा विश्वविद्यालय में संस्कृत भाषा का ही प्रयोग होता था। आज हम आपको कुछ रहस्य बताने जा रहे हैं या यू कहें कि संस्कृत की मुल व्याख्या बताने जा रहे हैं। इसको शास्त्री नित्यगोपाल कटारे जी ने लिखा है। आइये जानते हैं संस्कृत के रहस्य।।
संसार की पहली पुस्तक की भाषा होने के कारण संस्कृत भाषा को विश्व की प्रथम भाषा मानने में कहीं कोई संशय की गुंजाइश नहीं हैं।इसके सुस्पष्ट व्याकरण और वर्णमाला की वैज्ञानिकता के कारण सर्वश्रेष्ठता भी स्वयं सिध्द है।
सर्वाधिक महत्वपूर्ण साहित्य की धनी हाने से इसकी महत्ता भी निर्विवाद है। इतना सब होने के बाद भी बहुत कम लोग ही जानते है कि संस्कृत भाषा अन्य भाषाओ की तरह केवल अभिव्यक्ति का साधन मात्र ही नहीं है; अपितु वह मनुष्य के सर्वाधिक संपूर्ण विकास की कुंजी भी है।
इस रहस्य को जानने वाले मनीषियों ने प्राचीन काल से ही संस्कृत को देव भाषा और अम्रतवाणी के नाम से परिभाषित किया है। संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं वल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं वल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।
इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं।
घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है।
ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है।
जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ? यह जानने के लिए विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है।
संस्कृत में निम्नलिखित चार विशेषताएँ हैं जो उसे अन्य सभी भाषाओं से उत्कृष्ट और विशिष्ट बनाती हैं।
१- अनुस्वार (अं ) और विसर्ग(अ:)
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभ दायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं
यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि।
और नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं
यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।
अब जरा ध्यान से देखें तो पता चलेगा कि विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।
उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भौंरे की तरह गुंजन करना होता है, और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जावेगा।कपालभाति और भ्रामरी प्राणायामों से क्या लाभ है? यह बताने की आवश्यकता नहीं है; क्योंकि स्वामी रामदेव जी जैसे संतों ने सिद्ध करके सभी को बता दिया है। मैं तो केवल यह बताना चाहता हूँ कि संस्कृत बोलने मात्र से उक्त प्राणायाम अपने आप होते रहते हैं।
जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- राम फल खाता हैइसको संस्कृत में बोला जायेगा- राम: फलं खादति
राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है।
संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना।
२- शब्द-रूप
संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं।
यथा:- रम् (मूल धातु)
राम: रामौ रामा:
रामं रामौ रामान्
रामेण रामाभ्यां रामै:
रामाय रामाभ्यां रामेभ्य:
रामत् रामाभ्यां रामेभ्य:
रामस्य रामयो: रामाणां
रामे रामयो: रामेषु
हे राम! हेरामौ! हे रामा:!
ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं। जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है। और इन 25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है।
सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं।-
आत्मा (पुरुष)
(अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार
(ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण
(कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्
(तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द
( महाभूत 5) पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश
३- द्विवचन
संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहु वचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है।
जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।
४- सन्धि
संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐंसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।
इति अहं जानामिइस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।
यथा:- १ इत्यहं जानामि।
२ अहमिति जानामि।
३ जानाम्यहमिति ।
४ जानामीत्यहम्।
इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं नीरोग हो जाता है।
इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं।


भाषा-विज्ञान में साम्राज्यवादी षड्यंत्रों से सावधान !

भाषा-विज्ञान में साम्राज्यवादी षड्यंत्रों से सावधान !
                           यूरोप के रंग-भेदकारी औपनिवेशिक साम्राज्यवादियों ने सम्पूर्ण विश्व, विशेष कर भारत पर अपना दबदबा कायम रखने और जबरिया उसका औचित्य सिद्ध करने तथा स्वयं को सर्वोपरी स्थापित करने के लिए एक ओर उपनिवेशित देशों की ऐतिहासिक सच्चाइयों व सांस्कृतिक विरासतों एवं सामाजिक संरचनाओं को तदनुरुप तोड-मरोड कर विकृत कर दिया , वहीं दूसरी ओर उनकी भाषाओं और साहित्य को भी अपनी जद में ले लिया । इसके लिए उननें शोध-अनुसंधान के नाम पर ज्ञान-विज्ञान की भिन्न-भिन्न शाखाओं को अपने हिसाब से प्रतिपादित किया-कराया । अपने उपनिवेशों का औचित्य सिद्ध करने के दौरान भारत के प्राचीन संस्कृत-ग्रन्थों से उन्हें जब यह ज्ञात हुआ कि उनकी ईसाइयत से सदियों पूर्व भी सभ्यता-संस्कृति और धर्म एवं ज्ञान-विज्ञान का अस्तित्व ही नहीं, बल्कि व्यापक विस्तार भी रहा है , जिसके संवाहक आर्य थे और संस्कृत ही आर्यों की भाषा रही है ; तब उननें एक ओर जहां स्वयं को आर्य प्रमाणित करने के लिए इतिहास में यह तथ्य गढ दिया कि आर्य यूरोप मूल के थे , वहीं यह प्रमाणित करने का भी षड्यंत्र रचा कि संस्कृत भाषा भी यूरोप से निकली हुई है । ये दोनों ही षडयंत्र आज भी हमारे बौद्धिक प्रतिष्ठानों में फल-फुल रहे हैं ।
जिस तरह से ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने गोरी चमडी वाली अंग्रेजी नस्ल को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ आर्य-नस्ल घोषित-प्रमाणित करने के लिए ईसाई-धर्मग्रन्थ-बाइबिल में से मानव जाति विज्ञानका कपोल-कल्पित संदर्भ लेकर उसके आधार पर नस्ल-विज्ञानका अविष्कार कर उसमें तत्सम्बन्धी विधान रच डाला ; उसी तरह से संस्कृत भाषा की प्राचीनता , व्यापकता , मौलिकता , वैज्ञानिकता तथा उसके विपुल साहित्य में व्याप्त ज्ञान-विज्ञान की प्रचूरता को न्यूनतम आंकने और उसे उपरोक्त औपनिवेशिक प्रपंचों के अनुकूल सहायक बनाने के लिए भाषा-विज्ञानका सहारा लेकर भाषाई ऐतिहासिकता को भी भ्रामक बना दिया ।
भाषा विज्ञानवैसे तो भारतीय चिन्तन-दर्शन का ही विषय रहा है , पश्चिमी जगत सोलहवीं शताब्दी तक इस विज्ञान से अनभिज्ञ ही था । जबकि , ईसा पूर्व से ही भारत में पाणिनी और मम्मट जैसे विद्वान क्रमशः अष्टाध्यायीऔर काव्य-प्रकाशजैसे ग्रन्थ लिख कर भाषा के विविध पहलुओं पर वैज्ञानिक विमर्श करते रहे थे । किन्तु पश्चिम का विद्वत-चिन्तक समुदाय जब साम्राज्यवादी उपनिवेशवाद की पीठ पर सवार होकर भारत आया और संस्कृत भाषा से जब उसका परिचय हुआ , तब उसने उपनिवेशकों का हित साधने हेतु न केवल संस्कृत-साहित्य का शिक्षण-प्रशिक्षण व अनुवादन शुरू किया, बल्कि युरोपीय भाषाओं से उसका तुलनात्मक अध्ययन भी । उसी अध्ययन-विश्लेषण के दौर में भाषा-विज्ञान से भी उनका सामना हुआ । वे संस्कृत से अपनी भाषाओं की तुलना करते-करते १७वीं-१८वीं शताब्दी में तुलनात्मक भाषा-विज्ञानका टंट-घंट खडा कर प्रचार-माध्यमों के सहारे भाषा-विज्ञान पर भी हावी हो गए । पश्चिम का भाषा-विज्ञान वास्तव में तुलनात्मक भाषा-विज्ञान है, जो साम्राज्यवादी औपनिवेशिक षड्यंत्रों की एक ऐसी स्थापना है जो दृश्य प्रयोजनों से इतर रंगभेदी राज-सत्ता और विस्तारवादी चर्च मिशनरियों के अदृश्य उद्देश्यों के तहत काम करता रहा और आज भी कर रहा है ।
सन् 1767 में फ्रांसीसी पादरी कोर्डो ने संस्कृत के कुछ शब्दों की लैटिन-शब्दों से तुलना करते हुए भारत और यूरोप की (भारोपीय) भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययन किया, जिससे इस वर्तमान यूरोपीय भाषा-विज्ञान का जन्म हुआ माना जाता है । इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के कथित भाषाविद प्रोफेसर मोनियर विलियम जोंस ने 1784 में द एशियाटिक सोसायटीनामक संस्था की नींव डालते हुए ईसाइयत के विस्तार में संस्कृत के महत्व को रेखांकित किया, क्योंकि संस्कृत साहित्य से ईसाइयत की पुष्टि करा कर ही उसे गैर-ईसाई देशों में ग्राह्य बनाया जा सकता था । जोन्स ने प्रतिपादित किया कि भाषिक संरचना की दृष्टि से संस्कृत भाषा ग्रीक एवं लैटिन की सजातीय है । सन् 1786 में इसने यह भी प्रतिपादित किया कि यूरोप की अधिकतर भाषाएँ तथा भारत के बड़े हिस्से और शेष एशिया के एक भूभाग में बोली जाने वाली भाषाओं के उद्भव का मूल स्रोत एक समान है , अर्थात ग्रीक और लैटिन है । जबकि, दक्षिण भारतीय लोगों की भाषा- तमिल व तेलगू का संस्कृत से कोई सम्बन्ध नहीं है और इस कारण वे लोग आर्य नहीं, द्रविड हैं । ऐसे तथाकथित भाषा-विज्ञान से ऐसे मनमाना निष्कर्ष निकाल कर आगे की औपनिवेशिक साम्राज्यवादी और ईसाई विस्तारवादी योजना की भाषिक पृष्ठभूमि तैयार कर लेने के बाद उन भाषाविदों और इतिहासकारों ने भारतीय भाषा- संस्कृत और संस्कृति को अपना शिकार बनाना शुरू कर दिया ।
अपने तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के हवाले से उननें यह कहने-कहलवाने और प्रचारित करने का अभियान चला दिया कि संस्कृत तो ग्रीक से निकली हुई भाषा है और भारतीय संस्कृति व सनातन ( हिन्दू ) धर्म ईसाइयत से निकला हुआ है । संस्कृत को ग्रीक से निकली हुई ब्राह्मणों की भाषाबताने के पीछे उनकी मंशा यह रही है कि इससे आर्यों के युरोपीयन मूल के होने का दावा पुष्ट किया जा सकता है । इसी तरह तमिल को संस्कृत से अलग द्रविडों की भाषा बताने के पीछे उनका उद्देश्य भारत की सांस्कृतिक-सामाजिक एकता को खण्डित कर ईसाइयत का विस्तार करना ही था । अपने इस दावा की पुष्टि के लिए उनने एशियाटिक सोसाइटी, फोर्ट विलियम कालेज, ईस्ट इण्डिया कालेज, कालेज आफ फोर्ट सेन्ट जार्ज, रायल एशियाटिक सोसाइटी, बोडेन चेयर आक्सफोर्ड, तथा हेलिवेरी एण्ड इम्पिरियलिस्ट सर्विस कालेज और इण्डियन इंस्टिच्युट आफ आक्सफोर्ड नामक संस्थाओं को संस्कृत-साहित्य का सुनियोजित अनुवाद और तुलनात्मक विश्लेषण करने के काम में लगा दिया ।
. इन संस्थाओं ने तुलनात्मक भाषा-विज्ञान में शोध-अनुसंधान के नाम पर संस्कृत-साहित्य के अध्ययन-विश्लेषण-अनुवाद-लेखन-प्रकाशन का काम किस योजना के तहत किया, यह इनमें से एक- बोडेन चेयर आक्सफोर्डके संस्थापक कर्नल जोजेफ बोडेन की वसीयत से स्पष्ट हो जाता है ; जिसमें उसने लिखा है कि इस चेयर की स्थापना हेतु मेरे उदार अनुदान का लक्ष्य है- संस्कृत-ग्रन्थों के अनुवाद को प्रोत्साहन देना, ताकि मेरे देशवासी भारतीयों को ईसाइयत में परिवर्तित करने की दिशा में आगे बढने के योग्य बन जाएं ।इसी तरह इण्डियन इंस्टिच्युट, आक्सफोर्डके संस्थापक मोनियर विलियम्स ने लिखा है- जब ब्राह्मण्वाद के सशक्त किले की दीवारों (अर्थात, संस्कृत साहित्य) को घेर लिया जाएगा, दुर्बल कर दिया जाएगा और सलीब के सिपाहियों द्वारा अन्ततः धावा बोल दिया जाएगा ; तब ईसाइयत की विजय-पताका अवश्य ही लहरायेगी और यह अभियान तेज हो जाएगा ।उधर एशियाटिक सोसायटि के संस्थापक जोन्स ने यह सत्य प्रतिपादित करते हुए भी कि यूरोप में पुनर्जागरण आन्दोलन आंशिक रूप से प्राचीन भारतीय ग्रन्थों के अध्ययन के कारण हुआ, संस्कृत को बाइबिल में वर्णित कपोल-कल्पित मानव-इतिहास के आदि पुरुष- नूह के तीन पुत्रों में से दो के अधीन दासत्व में रहने को अभिशापित तिसरे पुत्र- हैम के वंशजों की भाषा घोषित कर दिया । ऐसा इस कारण ताकि भारत की औपनिवेशिक गुलामी और ब्रिटेन के औपनिवेशिक साम्राज्यवाद को उचित ठहराया जा सके ।
पश्चिमी भाषा-विज्ञानियों और औपनिवेशिक शासकों-प्रशासकों ने ईसाइयत के प्रसार और साम्राज्यवाद के विस्तार हेतु भारतीय समाज को विखण्डित करने के लिए किस तरह से भाषाई षड्यंत्र को अंजाम दिया यह मद्रास-स्थित कालेज आफ फोर्ट सेन्ट जार्ज के एक भाषाविद डी० कैम्पबेल और मद्रास के तत्कालीन कलेक्टर फ्रांसिस वाइट एलिस की सन-१८१६ में प्रकाशित पुस्तक- ग्रामर आफ द तेलगू लैंग्वेजकी सामग्री से स्पष्ट हो जाता है , जिसमें लेखक-द्वय ने दावा किया है कि दक्षिण भारतीय भाषा-परिवार का उद्भव संस्कृत से नहीं हुआ है ।उननें यह दलील दी है कि तमिल और तेलगू के एक ही गैर-संस्कृत पूर्वज हैं ।आप समझ सकते हैं कि उन दोनों महाशयों को तेलगू भाषा का व्याकरण लिखने और उसके उद्भव का स्रोत खोजने की जरूरत क्यों पड गई । जाहिर है, दक्षिण भारतीय लोगों को उतर भारतीयों से अलग करने के लिए । भारतीय भाषा, साहित्य व इतिहास में पश्चिम की घुसपैठ का भण्डाफोड करने वाली पुस्तक- भारत विखण्डनके लेखक राजीव मलहोत्रा के अनुसार कैम्पबेल-एलिस के उस तेलगू-व्याकरण ने भारत के आन्तरिक सामाजिक राजनैतिक ढांचों में बाद के पश्चिमी हस्तक्षेप के लिए दरवाजा खोल दिया । मालूम हो कि उसके बाद से ही ईसावादियों द्वारा भाषा-विज्ञान के हवाले से ऐसे-ऐसे तथ्य गढ-गढ कर स्कूली पाठ्य-पुस्तकों में कीलों की तरह ठोके जा रहे हैं , जिनसे संस्कृत सहित अन्य भारतीय भाषायें ही नहीं , बल्कि भारत की सहस्त्राब्दियों पुरानी विविधतामूलक सांस्कृतिक-सामाजिक समरसता व राष्ट्रीय एकता भी सलीब पर लटकती जा रही है । स्काटलैण्ड के एक तथाकथित भाषाविद डुगाल्ड स्टुवार्ट ने न जाने कैसे और किस आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि संस्कृत ईसा के बाद सिकन्दर के आक्रमण द्वारा ग्रीक से आई हुई भाषा है । संस्कृत के ग्रीक से मिलते-जुलते होने का कारण यह नहीं है कि दोनों के स्रोत पूर्वज एक ही हैं , बल्कि इसका कारण यह है कि संस्कृत भारतीय परिधान में ग्रीक ही है । स्पष्ट है कि पश्चिम के इस तुलनात्मक भाषा-विज्ञान के ऐसे-ऐसे प्रतिपादनों से भारतीय राष्ट्रीय एकता-अस्मिता और सांस्कृतिक-सामाजिक समरसता को गम्भीर खतरा है , जिनसे सावधान रहने की सख्त जरूरत है ।

संस्कृत का प्रचार।

शनिवार, 9 जुलाई 2016

संस्कृत भाषा के प्रचार के लिये.......

आंग्लभाषा त्यजन्तु संस्कृत भाषा वदन्तु ।
हैलो हैलो मास्तु हरिओ३म् वदन्तु |
हैलो हैलो मास्तु हरिओ३म् वदन्तु ||

Good morning मास्तु सुप्रभातम् वदन्तु ||
Good night मास्तु शुभ रात्रि वदन्तु ||
Mammy dady मास्तु माता पिता वदन्तु ||
Welcome Welcome मास्तु स्वागतम् वदन्तु ||

Good Evening मास्तु शुभ संध्या वदन्तु ||
Bye Bye मास्तु पुनः मिलामः वदन्तु ||
Sister Brother मास्तु भ्राता भगिनि वदन्तु ||
Sir mam मास्तु महोदय महोदया वदन्तु ।।


               कृपया मम निवेदनम् स्वजीवने आंड्लाभाषायाः शब्दानां प्रयोगम् मा कुर्वन्तु केवलं संस्कृत-भाषायाः प्रयोगम् कुर्वन्तु...........

शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

संस्कृत भाषा प्रचार उपाय

ॐ ॥  आपके क्षेत्र में भी अगर

०१ ) संस्कृत के कोई भी शिविर हो रहे हो।
०२ ) संस्कृत नाटक के प्रोग्राम हो रहे हो।
०३ ) संस्कृत गरबा के कार्यक्रम हो रहे हो।
०४ ) संस्कृत में संगीत स्पर्धा का आयोजन हो रहा हो।
०५ ) संस्कृत में साहित्य वितरण , चित्र प्रदर्शनी जैसे कार्यक्रम हो तो।

कृपया करके इसके सभी फोटो , विडियो सोशल मिडिया के माध्यम से लोगों को बताए।
आशा करता हूँ आप इस पोस्ट को आपके फेसबूक पर भी रखेंगे और अपने मित्रों को भी इस पोस्ट को आगे बढ़ाने के लिए कहेंगे

...धन्यवाद ।

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॥ॐ॥ जय श्री कृष्ण ॥ॐ॥

सोमवार, 4 जुलाई 2016

संस्कृत पाठशाला

पाठ   १
         
मङ्गलाचरण --- श्लोक

रामो राजमणिः सदा विजयते, रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमूः, रामाय तस्मै नमः ।
रामात् नास्ति परायणं -- परतरं, रामस्य दासोsस्म्यहम् ।
रामे चित्तलयः सदा भवतु मे, भो राम! मामुद्धर ।।
अर्थः -- राजाओं मे श्रेष्ठ राम की सदा विजय होती हैं । मैं रमा ( सीता)  के ईश = स्वामी को
भजता हूँ । राम ने राक्षसों की सेना का विनाश किया । उस ( ही)  राम को मैं नमस्कार करता हूँ । राम की अपेक्षा दूसरा कोई भी शरण जाने योग्य नहीं हैं । मैं राम का सेवक हूँ , ( इसलिए)  मेरा चित्त सदैव राम में ही लगा रहे । हे राम !  मेरा उद्धार करें ।
      इस श्लोक में राम ( अकारान्त पुल्लिङ्ग) 
शब्द के सातों विभक्तियों के एकवचन का निरूपण अत्यन्त सुन्दरता से किया गया हैं  ,
साथ ही मङ्गलाचरण भी हुआ हैं । ग्रन्थ के आरम्भ और अन्त में मङ्गलाचरण  करना शास्त्रीय परंपरा हैं ।
                        वाक्यानि
रामः गच्छति = राम जाता हैं ।
सः गच्छति = वह जाता हैं ।
जलं पिबसि = जल पीता हैं ।
त्वं पिबसि = तू पीता हैं  ।
पुस्तकं पठामि = पुस्तक पढ़ता हूँ ।
अहं पठामि = मैं पढ़ता हूँ ।
  (१) सः रामः गच्छति = वह राम जाता हैं ।
        गच्छति सः रामः =  " " " " " " "।

( २) त्वं जलं पिबसि = तू जल पीता हैं ।
       पिबसि त्वं जलं = " " " " " " " ।
( ३) अहं पुस्तकं पठामि = मैं पुस्तक पढ़ता हूँ
     पठामि अहं पुस्तकम् = " " " " " " " "
संस्कृत भाषा में शब्दों को किसी भी क्रम से रखकर वाक्य की रचना की जा सकती है । यही बात उपर्युक्त वाक्यों में दर्शाई गई हैं ।
अहं = मैं          अहं पठामि = मैं पढ़ता हूँ ।
त्वं = तू            त्वं पठसि = तू पढ़ता हैं ।
सः = वह           सः पठति = वह पढ़ता हैं ।
निम्न लिखित वाक्य पढ़िए तथा उनका हिन्दीं
में अर्थ किजिए :--
(१) रामः ग्रामं गच्छति । गच्छति रामः ग्रामम् ।
( २) कृष्णः शुद्धं दुग्धं पिबति ।पिबति शुद्धं दुग्धं कृष्णः ।
( ३) माधवः पुस्तकं शीघ्रं पठति । पुस्तकं शीघ्रं पठति माधवः ।
                   क्रियापदानि
       ( १) गम् ( गच्छ्)  = जाना
गच्छति = ( वह)  जाता है । गच्छसि = ( तू)  जाता है ।गच्छामि = ( मैं)  जाता हूँ ।
              ( २) पा ( पिब्)  = पीना
पिबति = ( वह)  पीता हैं । पिबसि = ( तू)  पीता हैं । पिबामि = ( मैं)  पीता हूँ ।
              ( ३) ( पठ्)  = पढ़ना
पठति = ( वह)  पढ़ता हैं । पठसि = ( तू)  पढ़ता हैं । पठामि = ( मैं ) पढ़ता हूँ ।
               ( ४) दृश् ( पश्य् ) = देखना
पश्यति = ( वह) देखता हैं । पश्यसि = ( तू)  देखता हैं । पश्यामि = ( मैं ) देखता हूँ ।
                  ( ५) क्रीड् = खेलना
क्रीडति = ( वह)  खेलता हैं । क्रीडसि = ( तू)  खेलता हैं ।क्रीडामि = ( मैं)  खेलता हूँ ।
               ( ६) वद् = बोलना
वदति = ( वह)  बोलता हैं । वदसि = ( तू)  बोलता हैं । वदामि = ( मैं)  बोलता हूँ ।
पुल्लिङ्ग                नपुंसकलिङ्ग
१ बालकः = बालक  १ पुस्तकम् = पुस्तक
२ शिक्षकः शिक्षक   २ जलम् = पानी
३ अध्यापकः = अध्यापक ३ दुग्धम् = दूध
४ नृपः = राजा     ४ घृतम् = घी
५ देवः = देव     ५ उद्यानम् = बगीचा
६ मनुष्यः, पुरुषः = मनुष्य ६ पुष्पम् = फूल
७ हस्तः = हाथ   ७ फलम् = फल
८ अलसः = आलसी ८ मधुरम् = मीठा
९ चपलः = चपल    ९ कन्दुकम् = गेंद
१० सूर्यः = सूर्य     १० भोजनम् = भोजन
                      अव्यय
तत्र -- वहाँ । कुत्र -- कहाँ । यत्र -- जहाँ । अत्र --- यहाँ । न -- नही । तदा -- तब । कदा -- कब । यदा -- जब । शीघ्रम्, द्रुतम्, सत्वरम् -- जल्दी । पश्चात् -- बाद में । अपि -
भी । सार्ध,  सह, साकम् -- साथ । एव -- ही
तु, तावत् -- तो । किम् -- क्या ।
                       *
             अभ्यासार्थ प्रश्न
१,  संस्कृत में वाक्य बनाइए : ---
गोविन्द जाता हैं । ---------------------- ।
अशोक जाता हैं । ----------------------- ।
माधव जाता हैं ।------------------------- ।
कमल जाता है ।-------------------------- ।
विनायक जाता हैं ।------------------------ ।
२,  ऊपर के वाक्यों के निम्नानुसार अव्ययों की सहायता से प्रश्नार्थक वाक्य बनाइए :---
कुत्र, कदा ।
३,  रिक्त स्थानों मे सार्थक शब्द भरिए :-----
-------- गच्छामि ।रामः ------- । पत्रं -------
-------- पठति । माधवः -------- पिबति ।
४,  उत्तर दिजिए :----
किं पठसि ?  किं पिबसि ?  किं पश्यसि ?  किं
क्रीडसि ?  किं वदसि ?
५,  जितने बन सकें उतने वाक्य बनाइए :----
अहम्                                   गच्छति
त्वम्              किं, सत्वरम्            करोमि
सः                                          पठसि