बुधवार, 22 जून 2016

क्त्वा प्रत्यय सीखे

क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग =========================

"क्त्वा प्रत्यय" -- (1.) क्त्वा का "त्वा" शेष रहता है, क् हट जाता है । (2.) यह प्रत्यय भूतकाल में होता है । (3.) इसका अर्थ "करके" होता है । (4.) इससे बने शब्द अव्यय होते हैं । (5.) जब इसका वाक्य में प्रयोग किया जाता है।
तब यह प्रथम क्रिया में जुडता है, दूसरी क्रिया जो कि मुख्य क्रिया होती है, उसमें इसका प्रयोग नहीं होता । अर्थात् इसका प्रयोग गौण क्रिया के साथ किया जाता है । (6.) यह दो वाक्यों को जोडने का भी काम करता है । (7.) उदाहरणः---पठ्+क्त्वा = पठित्वावाक्यः---बालकः भोजनं कृत्वा विद्यालयं गच्छति ।इस वाक्य में भोजन करना प्रथम और गौण क्रिया है, इसी में क्त्वा का प्रयोग हुआ है। जबकि प्रधान और द्वितीया क्रिया जाना है जिसमें इसका प्रयोग नहीं हुआ । यहाँ करना रूप क्रिया समाप्त हो गई है। यह भूतकाल में है, जिसका अर्थ "करके" है। अर्थात् बालक भोजन करके विद्यालय जाता है ।इसकी प्रथम क्रिया तो भूतकाल में निश्चित है, किन्तु द्वितीय और प्रधान क्रिया किसी भी काल में हो सकती है। जैसेः---इसी वाक्य को देखें-
बालकः भोजनं कृत्वा विद्यालयम् अगच्छत् ।
बालकः भोजनं कृत्वा विद्यालयं गमिष्यति ।
बालकः भोजनं कृत्वा विद्यालयं गच्छेत् ।
बालकः भोजनं कृत्वा विद्यालयं गच्छतु ।

अब नियम संख्या (6.) देखें। यह दो वाक्यों को जोडने का काम भी करता है ।
जैसेः---बालकः भोजनं करोति । सः विद्यालयं गच्छति ।
ये दो वाक्य हैं। प्रथम वाक्य का कर्त्ता और द्वितीय वाक्य का कर्ता एक होना चाहिए, चाहे संज्ञाया सर्वनाम का प्रयोग हुआ हो । प्रथम वाक्य का कर्त्ता और कर्म को ले लें, उसकी क्रिया में क्त्वा का प्रयोग करेंः---बालकः भोजनं कृत्वा.....अब द्वितीय वाक्य के कर्त्ता को हटा दें, और शेष रहे कर्म और क्रिया को जोड दें---विद्यालयंगच्छति । अब इन दोनों वाक्यों को जोड देंः---बालकः भोजनं कृत्वा विद्यालयं गच्छति ।
इस प्रकार क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग होता है । क्त्वा प्रत्यय से बने कुछ शब्द एकदम भिन्न होते हैं, इन्हें समझ लें और याद कर लेंः---
(1.) गम् क्त्वा गत्वा,
(2.) नृत् क्त्वा नर्तित्वा,
(3.) श्रु क्त्वा श्रुत्वा,
(4.) नी क्त्वा नीत्वा
(5.) दृश् क्त्वा दृष्ट्वा,
(6.) पठ् क्त्वा पठित्वा
(7.) स्था क्त्वा स्थित्वा
(8.) पच् क्त्वा पक्त्वा
(9.) भज् क्त्वा भक्त्वा
(10.) मन् क्त्वा मत्वा
(11.) यज् क्त्वा इष्ट्वा
(12.) रुह् क्त्वा रूढ्वा,
(13.) लभ् क्त्वा लब्ध्वा,
(14.) लिह् क्त्वा लीढ्वा,
(15.) वद् क्त्वा उदित्वा,
(16.) वप् क्त्वा उप्त्वा,
(17.) वस् क्त्वा उषित्वा
(18.) वह क्त्वा ऊढ्वा,
(19.) शास् क्त्वा शिष्ट्वा,
(20.) हन् क्त्वा हत्वा

कारक का ज्ञान।

!!!---: कारकविभक्ति और उपपदविभक्ति में अन्तर :---
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सामान्य रूप से दो प्रकार की विभक्तियाँ होती है ---
(1.) कारक विभक्ति,
(2.) उपपद विभक्ति,

(1.) कारक विभक्तिः---कारकों के लक्षण के आधार पर अर्थात् कारक की परिभाषा के आधार पर जहाँ पर विभक्तियाँ आती है, उसे कारक विभक्ति कहते हैं । जैसेः----कर्म कारक की परिभाषा है---कर्त्ता कर्म के द्वारा जिसे सबसे अधिक चाहता है, उसे कर्म कारक कहते हैं । इस परिभाषा के आधार पर जब कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति का प्रयोग होता है, तब वह विभक्ति कारक विभक्ति कहलाती है, क्योंकि यहाँ जो विभक्ति आ रही है, वह कारक के कारण से आ रही है , जैसेः---यज्ञदत्तः वेदं पठति ।यहाँ इस वाक्य में यज्ञदत्तः में कर्त्ता कारक के कारण से प्रथमा विभक्ति और "वेदम्" में कर्म कारक के कारण से द्वितीया विभक्ति हुई है ।अब ये दोनों विभक्ति कारक विभक्ति कहलाएगी ।
(2.) उपपद विभक्तिः----जिन वाक्यों में किसी विशेष पद के कारण से जो विभक्ति आती है, वह उपपद विभक्ति होती है । उसमें कारक की परिभाषा नहीं घटती या उपलक्षित होती है । वहाँ पर कारक की अवहेलना की जाती है । वहाँ कारक से कोई अभिप्राय नहीं होता । कहना चाहिए कि यह कारक का अपवाद होता है । जैसेः---नगरम् उभयतः वनमस्ति । इस वाक्य में "नगरम्" में जो द्वितीया हुई है, वह कारक के कारण से नहीं है अर्थात् यहाँ पर"कर्म कारक" की परिभाषा लागू नहीं होती और ना ही "कर्मणि द्वितीया" से यहाँ द्वितीया हुई है, अपितु "उभयतः" इस विशेष पद के कारण से "नगरम्" में द्वितीया हुई है । अतः इसे उपपद विभक्ति कहते हैं ।

"उपपद" शब्द का अर्थ हैः---जो पद के समीप हो । उभयतः पद के समीप नगर शब्द है, अतः उसमें द्वितीया हो गई है ।इस प्रकार के अन्य शब्द हैंः---
(1.) अभितः, उभयतः (दोनों ओर), परितः, सर्वतः (चारों ओर), प्रति (ओर), हा (दुःख), समया, निकषा (पास), धिक् (धिक्कार), अनु (अनुसरण करना) आदि इन शब्दों के योग में द्वितीया विभक्ति ही होगी । उदाः---(क) अभितः, उभयतः---यज्ञशालाम् अभितः (उभयतः) वृक्षाः सन्ति ।(ख) परितः, सर्वतः-----विद्यालयं परितः (सर्वतः) वनमस्ति ।(ग) प्रति----बालकः गुरुकुलं प्रति गच्छति ।(घ) समय, निकषा----ग्रामंनिकषा (समया) नदी वहति ।(ङ) धिक्---रावणं धिक् ।(च) हा---हा दुर्जनम् ।(छ) अनु---विद्वान् धर्मम् अनुगच्छति ।
(2.) सह, साकम्, साधर्म्, समम् (साथ), अलम् (निषेध), प्रयोजनम् , किम् (क्या), कार्यम् , अर्थः, आदि शब्दों के योग में तृतीया विभक्ति होती है । जैसेः---(क) सह---पुत्रः जनकेन (पित्रा) सह (साकम्, साधर्म्, समम्) तीर्थं (मन्दिरम्) गच्छति ।(ख) अलम्---अलम् विवादेन ।(ग) प्रयोजनम्--- मूर्खेण पुत्रेण किं प्रयोजनम् , किं कार्यम्, कोSर्थः ?
(3.) नमः , स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ) , वषट् (स्वाहा) , रुच्(अच्छा लगना) , क्रुध्, द्रुह्, , ईर्ष्या, असूया (निन्दा) आदि के योग में चतुर्थी होती हैः---(क) नमः---नमः गुरवे ।नमः शिवाय ।(ख) स्वस्ति---शिष्याय स्वस्ति ।(ग) स्वाहा---अग्नयेस्वाहा ।(घ) स्वधा---पितृभ्यः स्वधा ।(ङ) अलम्---रामः रावणाय अलम् ।(च) वषट्---सूर्याय वषट् ।(छ) रुच्---बालकाय (गणेशाय) मोदकं रोचते ।(ज) क्रुध्---सज्जनःदुर्जनाय क्रुध्यति, द्रुह्यति, कुप्यति ।(झ) ईर्ष्य्, असूय्---मूर्खः सज्जनाय ईर्ष्यति, असूयति ।
(4.) ऋते (विना), पूर्व आदि दिशा वाची, प्रभृति (से लेकर), बहिः (बाहर), अन्य, इतर (दूसरा),आरात् (पास), भी-धातु, रक्षा, जिससे विद्या पढी जाए,जुगुप्सा--(घृणा), विरम (रुकना), प्रमाद--(पृथक् होना या आलस्य), उत्पन्न होना, निलीयते (छिपना), प्रति यच्छति (बदले में देना), पृथक् (अलग), विना, दूर और निकट वाची शब्दों के योग में पञ्चमी होती है ।जैसेः---(क) ऋते---ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः ।(ख) पूर्व----ग्रामात् पूर्वः पर्वतः अस्ति ।(ग) प्रभृति----रामःशैशवाद् प्रभृति मृत्यु-पर्यन्तंधर्मस्य सेवाम् अकरोत् ।(घ) बहिः---यज्ञशालायाः बहिः प्रवचनं भवति ।(ङ) इतर, अन्य---सत्यहरिश्चन्द्रात् अन्यः कोSस्ति, यः सर्वथा सत्यं वदति ।(च) आरात्---ग्रामात् आरात् गोशाला वर्तते ।(छ) भय---सर्वदमनः सिंहात् न बिभेति ।(ज) रक्ष्----कृष्णःपापात् पाण्डवान् रक्षति ।(झ) आख्यात---देवदत्तः गुरोः वेदम् अधीते ।(ञ) जुगुप्सा---सज्जनः पापात् जुगुप्सते , विरमति, प्रमाद्यति ।(ट) प्रभवति---गङ्गाहिमालयात् प्रभवति, उद्भवति । (ठ) निलीयते---सैनिकात् (आरक्षकात्) चौरः निलीयते । (ड) प्रति यच्छति---जनः तिलेभ्यः माषान् प्रति यच्छति । (ढ) पृथक्---सीता रामात् (रामम्, रामेण) पृथक् न उपवसति । (ञ) विना---सीता रामात् (रामम्, रामेण) विना वनं न गच्छति । (त) दूर---ग्रामस्य दूरात् (दूरेण, दूरम्) चिकित्सालयः वर्तते । (थ) पटुः ---सैनिकात् पटुतरः चौरः अस्ति ।

सोमवार, 20 जून 2016

प्रत्यय ज्ञान।

!!!---: तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग :---!!!

आज हम आपको तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग दिखाते हैं । आप इन्हें समझ लें और दैनिक जीवनमें व्यवहार में प्रयोग अवश्य करें ।
(1.) तुमुन् प्रत्यय का "तुम्" शेष रहता है, अर्थात् उ और न् हट जाते हैं । जैसेः---पठ् तुमुन्--पठितुम्।
(2.) तुमुन् का अर्थ "के लिए" होता है, अर्थात् सम्प्रदान-कारक के स्थान पर इसका प्रयोग होता है ।बालक पढने के लिए विद्यालय जाता हैः---बालकः पठितुं विद्यालयं गच्छति ।
(3.) तुमुन् प्रत्ययान्त शब्द अव्यय होता है, अर्थात् तुमुन् प्रत्यय से बने शब्दों का रूप नहीं चलता है। यह सदैव एक जैसा बना रहता है, आप चाहें इसे किसी भी लिंग, वचन, विभक्ति या काल मेंप्रयोग कर लें, यह सदैव एक जैसा बना रहेगा ।जैसेः--तुम और मैं पढने के लिए विद्यालय जाते हैंः--त्वं अहं च (आवाम्) पठितुं विद्यालयं गच्छावः ।
(4.) तुमुन् प्रत्ययान्त शब्द दो वाक्यों को मिलाने का काम करते हैंः--
जैसेः---(1.) बालक पढता हैः--बालकः पठति ।
(2.) बालक विद्यालय जाता हैः---बालकः विद्यालयं गच्छति ।
अब इन दोनों वाक्यों को तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग करके मिला देते हैः---बालकः पठितुम् विद्यालयंगच्छति ।
(5.) तुमुन् प्रत्यय वाक्य में प्रथम क्रिया के साथ जुडता हैः---अर्थात् वाक्य में दो क्रियाओं का प्रयोग होगा, उनमें प्रथम क्रिया दूसरी क्रिया के लिए होती है, अर्थात् की जाती है ।इसे "क्रियार्था क्रिया" कहा जाता है । इसका कर्त्ता एक ही होता हैः--जैसेः---बालक खाने के लिए घर जाता हैः--बालकः खादितुम् (भोक्तुम्) गृहं गच्छति (व्रजति) ।इस वाक्य में खादितुम् प्रथम क्रिया है, जिसमें तुमुन् का प्रयोग हुआ है। दूसरी क्रिया गच्छति है, यह क्रिया साधन है, जबकि खादितुम् साध्य है, अर्थात् खाने के उद्देश्य से बालक घर जा रहा है अर्थात् जाना क्रिया इसलिए हो रही है कि वह खाना खाए। अतः गच्छति क्रिया क्रियार्था क्रिया है ।इसे उपपद क्रिया कह सकते हैं। इसके उपपद में रहते ही प्रथम क्रिया के साथ तुमुन् होगा । (इसी अर्थ में ण्वुल् प्रत्यय भी होता है, जैसेः--भोजको व्रजति ।)(तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम्--3.3.10)
(6.) यह भविष्यत् काल में होता है, अर्थात् क्रिया अभी हुई नहीं है, बल्कि की जाएगी, जैसेः---किसान जोतने के लिए खेत पर जाता हैः---कृषकः कर्षितुं क्षेत्रं गच्छति ।यहाँ खेत जोतने की क्रिया भविष्यत् में होगी ।
(7.) जब इच्छा के अर्थ वाली धातुओं का प्रयोग करेंगे, तब भी तुमुन् का प्रयोग होगा । इसमें शर्त यह है कि कर्त्ता एक ही हो, अर्थात् दो क्रियाएँ होंगी, किन्तु कर्त्ता एक ही होगा । इच्छा के अर्थ वाली धातुएँ उपपद में होंगी, अन्तिम क्रिया होगी, तब प्रथम क्रिया में तुमुन् जुडेगा, जैसेः---देवदत्त खाना चाहता हैः---देवदत्तः खादितुम् इच्छति ।(इच्छा की अर्थ वाली ये धातुएँ भी हैंः--कामयते, वाञ्छति, वष्टि) इस उदाहरण में खाना और इच्छा का कर्त्ता देवदत्त एक ही है। इच्छति उपपद में है, तो प्रथम क्रिया खाना के साथ तुमुन् जुड गया ।

रविवार, 19 जून 2016

विश्वयोगदिवस:।

विश्वयोगदिवसमभिलक्ष्य गीतमेकं प्रस्तौमि!
19/06/2016
               " विश्वयोगदिवस: "
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विश्वयोगदिवसेऽस्मिन्विश्वे, योग: सम्पन्नो जात:।
ग्रामे नगरे देशे विश्वे योगाभ्यास: सञ्जात:।1।
केन्द्रराज्यसदनेसंस्थायां विद्याऽध्ययने व्यापारे।
योगदानमभियानं कृत्वा सर्वे नेतारोऽऽयात:।2।
विश्वमण्डले निखिले राष्ट्रे योगाभ्यासं वर्धित्वा।
संस्कृते: ह्युपकारं दृट्वा. मोदीं सम्मोद: प्राप्त:।3।
राष्ट्रधर्मशुभकार्यं कृत्वा विश्वबन्धुतां जागृत्वा।
लोकजीवने मोदी मोदी मोदो मोद: सञ्जात:।4।
भारतीयपरिवेशे नित्यं हिन्दूसंस्कृतिरक्षार्थम्।
धर्मजातिमतभेदं भित्त्वा सभ्यसमाज: संयात:।5।
स्वास्थ्यरक्षणं संस्कारं वा संसारे संवर्द्धयितुम्।
लोकजागृति:विश्वे कृत्वा संदेश:सुखदो जात:।6।
प्रेमभावरसराजो धृृत्वा गीतं संसारे गीत्वा ।
गाय गाय रमणीयं गीतं संसर्ग:सुलभ: प्राप्त:।7।