बुधवार, 16 मार्च 2016

पंचतंत्र।

                          पंचतंत्र - मूर्ख को भी व्यवहारकुशल बनानेवाली संस्कृत भाषा की देन! पंचतंत्र, इस शब्दकी उत्पत्ति संस्कृत भाषासे हुई है । पंचअर्थात् पांच और तंत्रअर्थात् तत्त्व । पंचतंत्र याने पांच तत्त्व । ये पांच तत्त्व राजा एवं सामान्य व्यक्तिके दैनिक जीवनके लिए मार्गदर्शक तत्त्व हैं । इस ग्रंथमें राजाको राज्य कैसे करना चाहिए, मित्र कैसे एवं कौनसे करें, कौनसे न करें, योग्य मंत्रीका कैसे चयन करें और दैनिक जीवनमें हमारा आचरण कैसे हो इसका मार्गदर्शन कथाओं द्वारा किया गया है । पंचतंत्र की निर्मिति प्राचीन कालमें, भारत के दक्षिण महिलारोप्य प्रदेश में अमरशक्ति नाम का एक प्रजाहितदक्ष तथा कर्तव्यदक्ष राजा था । इस राजाकी तीन संतानें थी, बहुशक्ति, उग्रशक्ति और अनंतशक्ति । तीनों भी संतानें मूर्ख, आलसी तथा बुध्दिशून्य थीं । इस कारण राजा को निरंतर उनकी चिंता लगी रहती। राजा अब वृद्ध हो गया था । मेरे उपरांत इस राज्यका भार कौन संभालेगा’, इस विचार से राजा चिंतातुर हो गया था। अपनी मूर्ख संतानों को देखकर उसे बारबार एक ही वचन का स्मरण होता था। अजातमृतमूर्खेभ्यो मृतजातौ सुतौ वरम्। यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्। अर्थात्, अजात (न जन्मे हुए), मृत और मूर्ख पुत्रोंकी अपेक्षा मरे और न जन्मे पुत्र अधिक अच्छे; क्योंकि उनके कारण होनेवाला दुःख अल्प होता है। मूर्ख पुत्र आजीवन (मनको) जलाता रहता है। उस राजा के आश्रय में ५०० पंडित थे। एक दिन उन पंडितों को राजा ने बताया, कि मेरे पुत्र चतुर हों ऐसा कुछ कीजिए। उस पर वे पंडित राजा को बोले विष्णुशर्मा नाम का एक पंडित ब्राम्हण है । आप अपनी संतानों को उनके अधीन कर दें। वे उनको चतुर बनाएंगे। राजा ने विष्णुशर्मा को बुलवा लिया और अपनी इच्छा बताई। परंतु विष्णुशर्मा ने अपना ज्ञान बेचने से मना कर दिया; परंतु उसके संतानों को ६ माह में व्यवहारकुशल और साथ ही उनमें देवताओं के राजा इंद्रको भी जीतने की क्षमता आएगी इतना सामथ्र्यशाली बनाने का वचन दिया। यह सुनकर राजा ने राजपुत्रों को पंडित विष्णुशर्मा के साथ भेज दिया। विष्णुशर्मा ने उन संतानों को विविध कथाओं के माध्यम से व्यवहारज्ञान सिखाया । छ: महीनेबाद जब राजाने अपनी संतानों को देखा तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था । राजा की तीनों संतानें छ: माह में व्यवहारकुशल बन गई थी । राजा को यह देखकर अत्यानंद हुआ। विष्णुशर्मा ने राजपुत्रो को केवल ज्ञान देने की अपेक्षा पशु पक्षियों के माध्यम से यह भी सिखाया कि उस ज्ञान का कब, कहां और कैसे उपयोग करना चाहिए। पंडित विष्णुशर्मा की सिखाई हुई कथाओं को पांच भागों में विभाजित किया गया है। इन्हीं कथाओं को पंचतंत्र कहते है। वे पांच तंत्र आगे दिए अनुसार है –
१. मित्रभेद - कौनसे मित्र न करें ।
२. मित्रप्राप्ति - कौनसे मित्र करें ।
३. काकोलुकीयम् - कौए और उल्लूके अनबनकी कथा ।
४. लब्धप्रणाशनम् -प्राप्त धनका नाश कैसे होता है ।
५. अपरीक्षितकारकम् - यदि संपूर्ण विचार न कर कृत्य किए जाए तो उनका परिणाम क्या होता है ।

                          मानव जीवनके उच्च मूल्योंका परिचय कराने हेतु उत्तम साधन पंचतंत्र लगभग २००० वर्षों पूर्व लिखा गया; परंतु उसके मौलिक ज्ञानके कारण वह आज भी लोकप्रिय एवं मार्गदर्शक है। मूलत: संस्कृत में लिखा गया यह पंचतंत्र अब विश्व की अनेक भाषाआ में उपलब्ध है । पंचतंत्र में कुल ८७ कथाएं है । प्रत्येक कथा में एक बहुमूल्य नीतियां छिपी है । मानव जीवनके उच्च मूल्यों का परिचय कराने हेतु पंचतंत्र एक उत्तम साधन है । मनोविज्ञान, व्यावहारिकता और राजनीति के सिद्धांतो का परिचय इन कथाओं द्वारा होता है । संस्कृत साहित्य में पंचतंत्र को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ है । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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