रविवार, 27 मार्च 2016

संस्कृत प्रेमी राजा भोज।

                           प्राचीनकाल में उज्जैन से थोड़ा दूर, धारा नगरी (वर्तमान धार, म.प्र.) राजा भोज की राजधानी थी। राजा का संस्कृत भाषा के प्रति प्रेम इतिहास-प्रसिद्ध है। वे चाहते थे कि उनके राज्य में रहने वाले साधारण जन भी संस्कृत पढ़ें और दैनिक जीवन में उसका प्रयोग करें। एक समय भोज ने यह घोषणा करा दी कि यदि कोई संस्कृत नहीं जानता हो, मूर्ख हो तो वह उनके राज्य में नहीं रह सकता फिर चाहे वह ब्राह्मण ही क्यों हो और यदि कोई संस्कृत जानता है, विद्वान है तो वह उनके राज्य में सम्मानपूर्वक रहने का अधिकारी है फिर चाहे वह कुम्हार ही क्यों न होः विप्रोऽपि यो भवेत् मूर्खः स पुराद बहिरस्तु में। कुम्भकारोऽपि यो विद्वान स तिष्ठतु पुरे मम।। अब राजकर्मचारी घर घर जाकर छानबीन करने लगे कि कौन संस्कृत जानता है और कौन नहीं। उन्होंने एक जुलाहे को यह मानकर पकड़ लिया कि यह तो ससंकृत नहीं जानता होगा और उसे राजा के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। राजा भोज ने उससे पूछाः "क्या तुम संस्कृत जानते हो ?" जुलाहे ने संस्कृत में उत्तर दिया और कहाः "कवयामि वयामि यामि राजन् !" अर्थात् मैं कविता रचता हूँ, कपड़े बुनने का काम भी करता हूँ और आपकी अनुमति से घर जाना चाहता हूँ। जुलाहे के संस्कृत वचन और काव्य कौशल से राजा भोज बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे पुरस्कार देकर सम्मानित किया। इससे राजकर्मचारी अपने किये पर लज्जित हो राजा से क्षमा माँगने लगे। राजा भोज संस्कृत और संस्कृति के कितने हिमायती और प्रजावत्सल रहे होंगे कि मेरे राज्य में कोई अविद्वान न रहे, असंस्कृत न रहे ! और यही कारण था कि उनकी प्रजा स्वाभिमानी, आत्मविश्वासी और साक्षर होने के साथ-साथ ऊँची समझ से सम्पन्न थी। एक बार राजा भोज सर्दी के दिनों में सायंकाल नदी के किनारे टहल रहे थे। सामने से नदी को पार करता हुआ एक व्यक्ति सिर पर लकड़ियों का गट्ठर रखकर आ रहा था। उसे देख राजा के मन में यह जानने की उत्कंठा हुई कि 'क्या इस युवक को भी संस्कृत आती है ?' उन्होंने पूछाः"शीतं किं बाधति विप्र ?" युवक ने गम्भीरतापूर्ण उत्तर दियाः"शीतं न तथा बाधते राजन् ! यथा 'बाधति' बाधते।" अर्थात् हे राजन् ! मुझे ठंड तो उतना नहीं सता रही है जितना आप द्वारा 'बाधते' की अपेक्षा प्रयुक्त किया गया गलत शब्द 'बाधति' सता रहा है। दरअसल संस्कृत में 'बाध्' धातु आत्मनेपद की है। उसका शुद्ध रूप 'बाधते' है, 'बाधति' प्रयोग अशुद्ध है। राजा ने अपनी गलती स्वीकार की। लकड़हारे की स्पष्टवादिता और संस्कृत-ज्ञान से प्रसन्न होकर राजदरबार में बुला के सम्मानित किया और यथेष्ट धनराशि देकर विदा किया अपनी गलती बताने वाले उस लकड़हारे को ! संस्कृत भाषा भारतवर्ष के वैदिक ज्ञान, अध्यात्म ज्ञान का मेरूदण्ड है। हमारी भारतीय संस्कृति की आधारशिला है। आज विदेश के विदयालयों-विश्वविद्यालयों में भी संस्कृत पढ़ाई जा रही है। अपने ही देश में लम्बे समय से तिरस्कृत रही संस्कृत के लिए अब पुनः सम्मानित होने का समय आ गया है। अब देशवासियों को, समझदार सज्जनों को इसे विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में अऩिवार्य करने की माँग करनी चाहिए।
स्रोतः ऋषि प्रसाद

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बुधवार, 16 मार्च 2016

पंचतंत्र।

                          पंचतंत्र - मूर्ख को भी व्यवहारकुशल बनानेवाली संस्कृत भाषा की देन! पंचतंत्र, इस शब्दकी उत्पत्ति संस्कृत भाषासे हुई है । पंचअर्थात् पांच और तंत्रअर्थात् तत्त्व । पंचतंत्र याने पांच तत्त्व । ये पांच तत्त्व राजा एवं सामान्य व्यक्तिके दैनिक जीवनके लिए मार्गदर्शक तत्त्व हैं । इस ग्रंथमें राजाको राज्य कैसे करना चाहिए, मित्र कैसे एवं कौनसे करें, कौनसे न करें, योग्य मंत्रीका कैसे चयन करें और दैनिक जीवनमें हमारा आचरण कैसे हो इसका मार्गदर्शन कथाओं द्वारा किया गया है । पंचतंत्र की निर्मिति प्राचीन कालमें, भारत के दक्षिण महिलारोप्य प्रदेश में अमरशक्ति नाम का एक प्रजाहितदक्ष तथा कर्तव्यदक्ष राजा था । इस राजाकी तीन संतानें थी, बहुशक्ति, उग्रशक्ति और अनंतशक्ति । तीनों भी संतानें मूर्ख, आलसी तथा बुध्दिशून्य थीं । इस कारण राजा को निरंतर उनकी चिंता लगी रहती। राजा अब वृद्ध हो गया था । मेरे उपरांत इस राज्यका भार कौन संभालेगा’, इस विचार से राजा चिंतातुर हो गया था। अपनी मूर्ख संतानों को देखकर उसे बारबार एक ही वचन का स्मरण होता था। अजातमृतमूर्खेभ्यो मृतजातौ सुतौ वरम्। यतस्तौ स्वल्पदुःखाय यावज्जीवं जडो दहेत्। अर्थात्, अजात (न जन्मे हुए), मृत और मूर्ख पुत्रोंकी अपेक्षा मरे और न जन्मे पुत्र अधिक अच्छे; क्योंकि उनके कारण होनेवाला दुःख अल्प होता है। मूर्ख पुत्र आजीवन (मनको) जलाता रहता है। उस राजा के आश्रय में ५०० पंडित थे। एक दिन उन पंडितों को राजा ने बताया, कि मेरे पुत्र चतुर हों ऐसा कुछ कीजिए। उस पर वे पंडित राजा को बोले विष्णुशर्मा नाम का एक पंडित ब्राम्हण है । आप अपनी संतानों को उनके अधीन कर दें। वे उनको चतुर बनाएंगे। राजा ने विष्णुशर्मा को बुलवा लिया और अपनी इच्छा बताई। परंतु विष्णुशर्मा ने अपना ज्ञान बेचने से मना कर दिया; परंतु उसके संतानों को ६ माह में व्यवहारकुशल और साथ ही उनमें देवताओं के राजा इंद्रको भी जीतने की क्षमता आएगी इतना सामथ्र्यशाली बनाने का वचन दिया। यह सुनकर राजा ने राजपुत्रों को पंडित विष्णुशर्मा के साथ भेज दिया। विष्णुशर्मा ने उन संतानों को विविध कथाओं के माध्यम से व्यवहारज्ञान सिखाया । छ: महीनेबाद जब राजाने अपनी संतानों को देखा तो उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था । राजा की तीनों संतानें छ: माह में व्यवहारकुशल बन गई थी । राजा को यह देखकर अत्यानंद हुआ। विष्णुशर्मा ने राजपुत्रो को केवल ज्ञान देने की अपेक्षा पशु पक्षियों के माध्यम से यह भी सिखाया कि उस ज्ञान का कब, कहां और कैसे उपयोग करना चाहिए। पंडित विष्णुशर्मा की सिखाई हुई कथाओं को पांच भागों में विभाजित किया गया है। इन्हीं कथाओं को पंचतंत्र कहते है। वे पांच तंत्र आगे दिए अनुसार है –
१. मित्रभेद - कौनसे मित्र न करें ।
२. मित्रप्राप्ति - कौनसे मित्र करें ।
३. काकोलुकीयम् - कौए और उल्लूके अनबनकी कथा ।
४. लब्धप्रणाशनम् -प्राप्त धनका नाश कैसे होता है ।
५. अपरीक्षितकारकम् - यदि संपूर्ण विचार न कर कृत्य किए जाए तो उनका परिणाम क्या होता है ।

                          मानव जीवनके उच्च मूल्योंका परिचय कराने हेतु उत्तम साधन पंचतंत्र लगभग २००० वर्षों पूर्व लिखा गया; परंतु उसके मौलिक ज्ञानके कारण वह आज भी लोकप्रिय एवं मार्गदर्शक है। मूलत: संस्कृत में लिखा गया यह पंचतंत्र अब विश्व की अनेक भाषाआ में उपलब्ध है । पंचतंत्र में कुल ८७ कथाएं है । प्रत्येक कथा में एक बहुमूल्य नीतियां छिपी है । मानव जीवनके उच्च मूल्यों का परिचय कराने हेतु पंचतंत्र एक उत्तम साधन है । मनोविज्ञान, व्यावहारिकता और राजनीति के सिद्धांतो का परिचय इन कथाओं द्वारा होता है । संस्कृत साहित्य में पंचतंत्र को प्रमुख स्थान प्राप्त हुआ है । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

शुक्रवार, 11 मार्च 2016

न्यूजीलैंड में बना विशेष नियम- अंग्रेजी सीखनी हो तो संस्कृत सीखें।

                            न्यूजीलैंड के एक स्कूल में संसार के विशेषतः भारत की इस महान भाषा को सम्मान मिल रहा है। न्यूजीलैंड के इस स्कूल में बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए संस्कृत पढ़ाई जा रही है। फिकिनो नामक इस स्कूल का कहना है कि संस्कृत से बच्चों में सीखने की छमता बहुत बढ़ जाती है। न्यूजीलैंड के शहर आकलैंड के माउंट इडेन इलाके में स्थित इस स्कूल में लड़के और लड़कियाँ दोनों को शिक्षा दी जाती है। १६ वर्ष तक की उम्र तक यहाँ बच्चों को शिक्षा दी जाती है। इस स्कूल का कहना है कि इसकी पढ़ाई मानव मूल्यों, मानवता और आदर्शों पर आधारित है। अमेरिका के हिंदू नेता राजन जेड ने पाठ्यक्रम में संस्कृत को शामिल करने पर फिकिनो की तारीफ की है। फिकिनो में अत्याधुनिक साउंड सिस्टम लगाया गया है। जिससे बच्चों को कुछ भी सीखने में आसानी रहती है। स्कूल के प्रिंसिपल पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि १९९७ में स्थापित इस स्कूल में नए तरह के विषय रखे गए हैं। जैसे दिमाग के लिए भोजन, शरीर के लिए भोजन, अध्यात्म के लिए भोजन। इस स्कूल में अंग्रेजी, इतिहास, गणित और प्रकृति के विषयों की भी पढ़ाई कराई जाती है। पीटर क्राम्पटन कहते हैं संस्कृत ही एक मात्र ऐसी भाषा है जो व्याकरण और उच्चारण के लिए सबसे शेष्ट है। उनके अनुसार संस्कृत के जरिए बच्चों में अच्छी अंग्रेजी सीखने का आधार मिल जाता है। संस्कृत से बच्चों में अच्छी अंग्रेजी बोलने, समझने की क्षमता विकसित होती है। पीटर क्राम्पटन कहते हैं कि दुनिया की कोई भी भाषा सीखने के लिए संस्कृत भाषा आधार का काम करती है। इस स्कूल के बच्चे संस्कृत पढ़ कर बहुत खुश हैं। इस स्कूल में दो चरणों में शिक्षा दी जाती है। पहले चरण में दस वर्ष की उम्र तक के बच्चे और दूसरे चरण १६ वर्ष तक उम्र के बच्चों को शिक्षा दी जाती है। पीटर क्राम्पटन कहते हैं इस स्कूल में बच्चों को दाखिला दिलानेवाला हर अभिभावक का यह प्रश्न अवश्य होता है कि आप संस्कृत क्यों पढ़ाते हैं? हम उन्हें बताते हैं कि यह भाषा श्रेष्ठ है। दुनिया की महानतम रचनाएँ इसी भाषा में लिखी गई हैं। अमेरिका के हिंदू नेता राजन जेड ने कहा है कि संस्कृत को सही स्थान दिलाने की आवश्यकता है। उन्होंने भारत सरकार की आलोचना की और कहा कि भारत सरकार इस भाषा को बढ़ावा देने के लिए कुछ नहीं कर रही है। कहा हिंदू धर्म के अलावा बौद्ध और जैन धर्म के तमाम ग्रंथ संस्कृत में लिखे गए हैं। उन्होंने गांधीजी का जिक्र किया। गांधीजी ने कहा था कि बिना संस्कृत सीखे कोई विद्वान नहीं हो सकता। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ