गुरुवार, 29 दिसंबर 2016

कैसे संस्कृत को जनभाषा बनाये?


संस्कृतम् जनभाषा भवेत्
                                   आज तक जितने भी पुरातात्विक संशोधन हुए हैं , खोजें हुई हैं उनमें प्राप्त शिलालेख , ताड़पत्र , भूर्जपत्र , सिक्के आदि में सारा लेखन संस्कृत में ही मिलता है। संस्कृत के बाद कुछ प्राकृतआदि में मिलता है । इस शोध से यह सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा एक समय में जनभाषा थी । यदि पुरातनकाल में संस्कृत जन जन की भाषा थी तो आज आधुनिक युग में संस्कृत जन जन की भाषा क्यों नहीं बन सकतीहै। बस आवश्यक है कि हम इस दिशा में प्रयास करें ।

Ø नित्य संस्कृत का अभ्यास करें ।
Ø संस्कृतप्रेमियों को इस पुनीतकार्य में शामिल करें ।
Ø सभी कम से कम 50 संस्कृत श्लोक अवश्य कंठस्थ करें ।
Ø संस्कृत पत्रिकाओं के ग्राहक बनें।
Ø संस्कृत समारोह में अवश्य जाएं ।
Ø संस्कृत पढ़ रहे छात्रों को आर्थिक सहयोग दें।
Ø संस्कृत समाचार आकाशवाणी में सुनें , दूरदर्शन में देखें ।
Ø गुरुकुलों को सहयोग दें ।
Ø नेट पर सर्फिंग करतेसमय अधिक से अधिक संस्कृत के विषयों को खोजें , पढ़ें ।
Ø यू ट्यूब में संस्कृत से सम्बंधित वीडियो देखा करें ।
Ø जो मित्र संस्कृत जानते हैं उनसे संस्कृत में बातचीत करें।
Ø संस्कृत में सन्देश भेजा करें ।
Ø परिवार में कोई भी शुभ प्रसंग हो तब संस्कृत में निमंत्रण पत्र छपवाएँ।
Ø त्यौहार आदि शुभ अवसर पर संस्कृत कार्यक्रम रखवाएँ।
Ø अपने नगर में या विद्यालय में आयोजित होने वाले सांस्कृतिक कार्यक्रम में संस्कृत गीत-गान की कम से कम एक प्रस्तुति को शामिल कराएँ ।

                            हम इस प्रकार संस्कृत को अवश्य ही जन जन की भाषा बनाने में सफल हो पाएँगे ।

सोमवार, 19 दिसंबर 2016

नववर्ष गीत संस्कृत में।

"नववर्ष-गीतिका"
गीति-रचना तथा स्वर-रचना : डा. हरेकृष्ण-मेहेर
नववर्षम्,
शुभं भवतु नववर्षम्,
सौख्यमयंनिरामयंवितरतु परमं हर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम्,
नववर्षम्, नववर्षम् ॥(ध्रुवम्)
हृदय-मन्दिरे प्रेम-ज्योति-र्विराजताम्,
मनोऽरविन्दं विन्दतु विमलं सुन्दरताम् ।
सुचिन्तनं चिरन्तनंहरतु विषाद-विमर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम् ॥ (१)
प्रसरतु सत्कवि-भावुक-विकसित-सुप्रतिभा,
अम्बर-तलेऽपि सम्बल-विलसित-दिव्य-विभा ।
साभ्युदयं वराभयंतनोतु सकलोत्कर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम् ॥ (२)
प्रदिशतु दिशि दिशि मधु-सन्देशं सुमञ्जुलम्,
शकुन्त-गीतं सकुसुम-फल-तरु-लता-कुलम् ।
अनाविलं शुचि सलिलंशमयतु जगतां तर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम् ॥ (३)
परिमल-मरुतो रमयतु मर्त्त्यं चराचरम्,
दूषण-रहितो वातु सर्वतो नितन्तरम् ।
समुज्ज्वले विश्व-तलेतिरयतु कलुषामर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम् ॥ (४)
धृत-पर्जन्या रमतां धन्या वसुन्धरा,
प्रशस्य-शस्या वन्य-वैभवै रत्नभरा ।
फलत्वलं समङ्गलंदृढ़मैक्यं दुर्धर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम् ॥ (५)
शान्ति-पेशलं ज्ञान-कौशलं शोकहरम्,
प्रभवतु भुवने जन-हित-साधन-कर्मकरम् ।
व्रतं परं परस्परंनिवारयतु सङ्घर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम् ॥ (६)
सन्नय-मार्गे प्रसन्न-भाग्ये स्व-निर्भरम्,
राष्ट्रिय-संहति-मन्त्रोद्गाने पुण्यभरम् ।
रुचि-रुचिरं जयतु चिरंसुरभित-भारतवर्षम् ।
शुभं भवतु नववर्षम् ।
नववर्षम्, नववर्षम् ॥ (७)
(इयं गीतिका कहरवा-ताल-मध्य-लयेन परिवेषणीया ।)

गुरुवार, 15 दिसंबर 2016

पंडित श्यामजी उपाध्याय : देश के एकमात्र वकील, जो पिछले ४० वर्षों से ‘संस्कृत’ में कर रहे हैं वकालत !


‘संस्कृतमित्रम्’ आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय

‘जब मैं छोटा था, तब मेरे पिताजी ने कहा था कि कचहरी में काम हिंदी, अंग़्रेजी और उर्दू में होता है परंतु संस्कृत भाषा में नहीं। ये बात मेरे मन में घर कर गई और मैंने संस्कृत भाषा में वकालत करने की ठानी और ये सिलसिला आज भी चार दशकों से जारी है !’ ये कहना है वाराणसी की कचहरी में संस्कृत को जीवंत करनेवाले अधिवक्ता आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय का, जो पिछले ४० वर्षों से संस्कृत में वकालत कर रहे हैं।
देववाणी संस्कृत के प्रति भले ही लोगों का रुझान कम हो परंतु वाराणसी के अधिवक्ता आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय का संस्कृत के लिए समर्पण शोभनीय है। १९७६ से वकालत करनेवाले आचार्य पण्डित श्यामजी उपाध्याय १९७८ में अधिवक्ता बने। इसके बाद इन्होंने देववाणी संस्कृत को ही पसंद दी।
सभी न्यायालयीन काम जैसे- शपथपत्र, प्रार्थनापत्र, दावा, वकालतनामा और यहां तक की बहस भी संस्कृत में करते चले आ रहे हैं। पिछले ४ दशकों में संस्कृत में वकालत के दौरान श्यामजी के पक्ष में जो भी निर्णय और आदेश हुआ, उसे न्यायाधीश साहब ने संस्कृत में या तो हिंदी में सुनाया।

‘संस्कृतमित्रम्’ आचार्य पंडित श्यामजी उपाध्याय

संस्कृत भाषा में कोर्टरूम में बहस सहित सभी लेखनी प्रस्तुत करने पर सामनेवाले पक्ष को असहजता होने के सवाल पर श्यामजी ने बताया कि वो संस्कृत के सरल शब्दों को तोड़-तोड़कर प्रयोग करते है, जिससे न्यायाधीश से लेकर विपक्षियों तक को कोई दिक्कत नहीं होती है और अगर कभी सामनेवाला राजी नहीं हुआ तो वो हिंदी में अपनी कार्यवाही करते हैं।
केवल कर्म से ही नहीं अपितु संस्कृत भाषा में आस्था रखनेवाले श्यामजी हर वर्ष कचहरी में संस्कृत दिवस समारोह भी मनाते चले आ रहे हैं। लगभग ५ दर्जन से भी अधिक अप्रकाशित रचनाओं के अलावा श्यामजी की २ रचनाएं “भारत-रश्मि” और “उद्गित” प्रकाशित हो चुकि है।
कचहरी समाप्त होने के बाद श्याम जी का शाम का समय अपनी चौकी पर संस्कृत के छात्रों और संस्कृत के प्रति जिज्ञासु अधिवक्ताों को पढ़ा कर बीताते है। संस्कृत भाषा की यह शिक्षा श्यामजी निःशुल्क देते हैं।
संस्कृत भाषा में रूचि लेनेवाले बुज़ुर्ग अधिवक्ता शोभनाथ लाल श्रीवास्तव ने बताया कि, संस्कृत भाषा को लेकर पूरे न्यायालय परिसर में श्यामजी के लोग चरण स्पर्श ही करते रहते हैं।
जब ये कोर्टरूम में रहते हैं तो इनके सहज-सरल संस्कृत भाषा के चलते श्रोता शांति से पूरी कार्यवाही में रुचि लेते हैं। श्यामजी के संपर्क में आने से उनके संस्कृत भाषा का ज्ञान भी बढ़ गया।
आचार्य श्यामजी उपाध्याय संस्कृत अधिवक्ता के नाम से प्रसिध्द हैं। वर्ष २००३ में मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने संस्कृत भाषा में अभूतपूर्व योगदान के लिए इनको ‘संस्कृतमित्रम्’ नामक राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया था।

मंगलवार, 13 दिसंबर 2016

देवनागरी लिपि, संस्कृत एवं हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है और कोई भी अक्षर वैसा क्यों है? उसके पीछे बड़ा कारण है , अंग्रेजी भाषा में ये बात देखने में नहीं आती ।





देवनागरी लिपि, संस्कृत एवं हिंदी एक वैज्ञानिक भाषा है और कोई भी अक्षर वैसा क्यों है? उसके पीछे बड़ा कारण है , अंग्रेजी भाषा में ये बात देखने में नहीं आती
______________________
                                     , , , , ङ- कंठव्य कहे गए, क्योंकि इनके उच्चारण के समय ध्वनि कंठ से निकलती है।  एक बार बोल कर देखिये , , , ,ञ- तालव्य कहे गए,  क्योंकि इनके उच्चारण के  समय जीभ  तालू से लगती है। एक बार बोल कर देखिये , , , , ण- मूर्धन्य कहे गए,  क्योंकि इनका उच्चारण जीभ के  मूर्धा से लगने पर ही सम्भव है।  एक बार बोल कर देखिये , , , , न- दंतीय कहे गए,  क्योंकि इनके उच्चारण के  समय  जीभ दांतों से लगती है।  एक बार बोल कर देखिये , , , , ,- ओष्ठ्य कहे गए,  क्योंकि इनका उच्चारण ओठों के  मिलने  पर ही होता है। एक बार बोल  कर देखिये ।
________________________
                            हम अपनी भाषा पर गर्व  करते हैं ये सही है परन्तु लोगो को इसका कारण भी बताईये इतनी वैज्ञानिकता दुनिया की किसी भाषा मे नही है जय हिन्द  
,,ग क्या कहता है तनिक विचार करें....
••••••••••••••••••••••••••••••••••••
क - क्लेश मत करो
ख- खराब मत करो
ग- गर्व ना करो
घ- घमण्ड मत करो
च- चिँता मत करो
छ- छल-कपट मत करो
ज- जवाबदारी निभाओ
झ- झूठ मत बोलो
ट- टिप्पणी मत करो
ठ- ठगो मत
ड- डरपोक मत बनो
ढ- ढोंग ना करो
त- तैश मे मत रहो
थ- थको मत
द- दिलदार बनो
ध- धोखा मत करो
न- नम्र बनो
प- पाप मत करो
फ- फालतू काम मत करो
ब- बिगाङ मत करो
भ- भावुक बनो
म- मधुर बनो
य- यशश्वी बनो
र- रोओ मत
ल- लोभ मत करो
व- वैर मत करो
श- शत्रुता मत करो
ष- षटकोण की तरह स्थिर रहो
स- सच बोलो
ह- हँसमुख रहो
क्ष- क्षमा करो
त्र- त्रास मत करो
ज्ञ- ज्ञानी बनो !!
कृपया इस ज्ञान की जानकारी सभी को अग्रेषित करें ।

रविवार, 11 दिसंबर 2016

माघ महोत्सवस्य सूचना।

                                           राजस्थानसंस्कृतअकादम्या समायोजयिष्यमानोदशदिवसीयो राष्ट्रियः माघमहोत्सवः 2017 अयि मान्याः संस्कृतसंस्कृतात्मानश्शास्त्रसंरक्षणबद्धादरा  विद्वांसो विदुष्यश्च। सहर्षं संसूचयन्नमन्दमानन्दमनुभवामि  यद्राजस्थानसर्वकारसदिच्छया राजस्थानसंस्कृतअकादम्या संस्कृतविकासाय प्रसाराय च यथासमयन्नैके कार्यक्रमा आयोज्यन्ते । अस्मिन्नेवोपक्रमे संस्कृतमहाकविष्वन्यतमं महाकविमाघम्, आलक्ष्य माघमहोत्सवः 2017 इति दशदिवसीयो राष्ट्रियः कार्यक्रमः समायोज्यते । संस्कृत साहित्य संस्कृति सांस्कृतिकादिविषयसम्बद्धोपक्रमान्वितेस्मिन्कार्यक्रमे महाकविमाघस्य व्यक्तित्वं कृतित्वं तद्वैशिष्ट्यं संस्कृत संस्कृतिसंवर्धने तद्योगदानञ्चेत्यादिविषयोपेतं पुस्तकप्रकाशनमप्यन्यतमः प्रकल्पः। तत्र भवादृशानां संस्कृतसेवापरायणानां विदुषामालेखो ग्रन्थगौरवावहस्स्यात्तदर्थं 10/1/2017 दिनाङ्कं यावद्भवच्छोधालेखं संप्रेष्यानुग्रहीष्यन्तीति।
विनिवेदयन्
भावत्कः
शोधालेखप्रेषणसंकेतः
राजधर मिश्रः
राजस्थान संस्कृत अकादमी झलाना डूंगरी, जयपुरम्
व्याकरणविभागाध्यक्षः
ज.रा.राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालयस्य

बुधवार, 7 दिसंबर 2016

हिंदी गीत का संस्कृतानुवाद

इतनी  शक्ति  हमें  देना  दाता
                मन का विश्वास कमज़ोर हो ना।
संस्कृतानुवाद: -
शक्तिमेतावतीं मे प्रयच्छ,
न्यास मनसो भवेत् नैव न्यूनम्।
अस्तु भद्रे पथि तु  चलाम:
न प्रमादात् प्रमादं चरेम ।।
दूरमज्ञानताया: तमो हर
ज्ञानकिरणान् प्रयच्छ तु मह्यम्।
गर्हितेभ्यो तु मां त्रायमाण:
यद् प्रयच्छ तदस्तु मे भद्रम्।
शत्रुता न भवेत् कस्य केन
न भवेत् चित्त-प्रतिशोधपूर्णम्।।
आगतं किं तु न चिन्तनीयम्
अर्पितं यद् कृतं चिन्तनीयम्।
सौख्य -पुष्पं सदा वितरेम
जीवनं तु भवेत् मध्वारण्यम्।
स्वस्य करुणाजलेनाभिषिञ्च
पूतयस्व एकैकांगनान्तम्।।

रविवार, 4 दिसंबर 2016

स्नानस्य महत्त्वम्

ॐ श्रीगणपतये नमः ||
---जयश्रीराम---!!
प्रातः कालस्य स्नानस्य चतुर्विधाः सन्ति|
१- मुनिस्नानम्
२- देवस्नानम्
३- मानवस्नानम्
४- असुरस्नानम्

१- मुनिस्नानम् - यत् ब्रह्ममुहूर्ते चतुष्पञ्चवादनयोर्मध्ये(४-५ बजे के बीच) क्रियते |
• मुनिस्नानम् एव सर्वोत्तमम् ||

२- देवस्नानम् - यत् प्रातः पञ्चषड्वादनयोर्मध्ये (५-६ बजे के बीच) क्रियते |
• देवस्नानम् उत्तमम् ||

३- मानवस्नानम् - यत् षडाष्टवादनयोर्मध्ये (६-८ बजे के बीच) क्रियते |
• मानवस्नानं सामान्यम् ||

** एतानि त्रीणि स्नानानि स्नायीजनेभ्यो सुख-शान्तिः समृद्धिः विद्या बलम् आरोग्यं च सर्वं शुभकारकानि हि भवन्ति |**

४- असुरस्नानम्- यत् अष्टवादनस्य अनन्तरं क्रियते |
• असुरस्नानं सर्वथा निषेधम् ||

कञ्चित् अपि मानवं प्रातः अष्टवादनस्य अनन्तरं स्नानं न करणीयम् ||

|| वन्देमातरम् ||