बुधवार, 2 दिसंबर 2015

तुर्क लुटेरा बख्तियार खिलजी ने विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय को जला के नष्ट कर दिया था।


एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव के तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर नष्ट कर दिया था।
                                  गया (बिहार) : अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन दुनिया का संभवत: पहला विश्वविद्यालय था,जहां न सिर्फ देश के, बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने ४५०-४७० ई. केबीच की थी। पटना से ८८.५ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से ११.५किलोमीटर उत्तर में स्थापित इस विश्वविद्यालय में तब १२ हजार छात्र और२००० शिक्षक हुआ करते थे। गुप्तवंश के पतन के बाद भी सभी शासक वंशों नेइसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। लेकिन एक सनकी और चिड़चिड़ेस्वभाव के तुर्क लुटेरे ने नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर इसके अस्तित्व को पूर्णत: नष्ट कर दिया। यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। इस विश्वविद्यालय में विभिन्न धर्मोंके तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। इस महान विश्वविद्यालय केभग्नावशेष इसके वैभव का अहसास करा देते हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्रीह्वेनसांग ने ७ वीं शताब्दी में अपने जीवन का एक वर्ष एक विद्यार्थी औरएक शिक्षक के रूप में यहां व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र'का जन्म यहीं पर हुआ था।यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति मेंइसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २०००थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था, १०,००० विद्यार्थी और १५१०आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत केविभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत,इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचारकरते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं सदी से बारहवीं सदी तक अंतरराष्ट्रीयख्याति रही थी। नालंदा विश्वविद्यालय को एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाववाले तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने ११९९ ई. में जला कर पूर्णत: नष्ट करदिया। उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ाकर लिया था।ऐसा कहा जाता है कि बख्तियार खिलजी एक बार बहुत बीमार पड़ गया। उसकेहकीमों ने उसे ठीक करने की पूरी कोशिश की, मगर वह स्वस्थ नहीं हो सका।किसी ने उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्यराहुल श्रीभद्र से इलाज कराने की सलाह दी। उसे यह सलाह पसंद नहीं आई।उसने सोचा कि कोई भारतीय वैद्य उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान कैसे रख सकताहै और वह किसी काफ़िर से अपना इलाज क्यों करवाए। फिर भी उसे अपनी जानबचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा। जब वैद्यराज इलाज करने पहुंचे तो उसने उनके सामने शर्त रखी कि वह उनकेद्वारा दी कोई दवा नहीं खाएगा, लेकिन किसी भी तरह वह ठीक करे, वर्ना मरनेके लिए तैयार रहे। बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई, बहुत उपाय सोचा और अगले दिन उस सनकी बख्तियार खिलजी के पास कुरान लेकर चले गए। उन्होंने कहाकि इस कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढ़ लीजिये, आप ठीक होजाएंगे!वैद्यराज के कहे अनुसार, उसने कुरान पढ़ा और ठीक हो गया। लेकिन ठीक होनेपर खुश होने की जगह उसे बड़ी झुंझलाहट हुई और गुस्सा आया कि उसके हकीमोंसे इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है?बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने व वैद्य को पुरस्कार देने के बदलेबख्र्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया। उसनेपुस्तकालयों को भी जला कर राख कर दिया। वहां इतनी पुस्तकें थी कि आग लगीभी तो तीन माह तक पुस्तकें धू-धू करके जलती रहीं। यही नहीं, उसने अनेकधर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला।बता दें कि नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा कासर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिनहोती थी। अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हेंतीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथमऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंतआवश्यक था।

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