सोमवार, 21 दिसंबर 2015

संस्कृत को केवल धर्म-कर्म की भाषा नहीं समझना चाहिए-यह लौकिक प्रयोजनों की भी भाषा है।

संस्कृत को केवल धर्म-कर्म की भाषा नहीं समझना चाहिए-यह लौकिक प्रयोजनों की भी भाषा है। संस्कृत में अद्भुत कविताएं लिखी गई हैं, चिकित्सा, गणित, ज्योतिर्विज्ञान, व्याकरण, दर्शन आदि की महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं। केवल आध्यात्मिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि दाशर्निक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। किन्तु रामायण और श्रीमदभगवद्गीता की भाषा को आज भारत में केवल हँसी मजाक की भाषा बनाकर रख दिया गया है। भारतीय फिल्मे हों या टी.वी. प्रोग्राम उनमेँ जोकरों को संस्कृत के ऐसे ऐसे शब्द बनाकर लोगों को हँसाने की कोशिश की जाती है जो संस्कृत के होते ही नहीं हैं। और हमारी नई पीढी जिसे संस्कृत से लगातार दूर किया जा रहा है। वो संस्कृत की महिमा को जाने बिना ही उन कॉमेडी सीनों पर दाँत दिखाती है। अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में नर्सरी से ही बच्चों को संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है, कहीं एसा न हो की हमारी संस्कृत कल वैश्विक भाषा बन जाये और हमारे नवयुवक संस्कृत को केवल भोंडे और भद्दे मसखरों के भाषा समझते रहें। अपने इस लेख से मैँ भारत के यूवाओं को आह्वान करता हूँ की आने वाले समय में संस्कृत कम्पुटर की भाषा बन्ने जा रही है ,सन २०२५ तक नासा ने संस्कृत में कार्य करने का लक्ष्य रखा है। अतः अंग्रेजी भाषा के साथ साथ वे अपने बच्चों को संस्कृत का ज्ञान जरूर दिलाऐँ और संस्कृत भाषा को भारत में उपहास का कारन न बनाये क्यों की संस्कृत हमारी देव भाषा है। संस्कृत का उपहास करके हम अपनी जननी का उपहास कर रहे है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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