बुधवार, 2 दिसंबर 2015

अद्य संस्कृतम् संधान कुरु।

अद्य संस्कृतम् संधान कुरु।

संधान संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है समझना और सुधारना। संधान में
दोनों ही बातें शामिल हैं – समझना भी और सुधारना भी, अर्थात् गहरी खोज
करके जो सत्य ज्ञात हो उसके अनुसार अपने लिए और समाज के लिए कुछ
सकारात्मक कार्य करना।
हम बिना समझे किसी चीज़ को सुधार नहीं सकते। एक घड़ी को सुधारने के लिए
आवश्यक है कि हम पहले जानें कि वह कैसे बनी है और कैसे काम करती है। भारत
को सुधारने का प्रयास करने के पहले हमें भारत की प्रकृति को समझना होगा।
और देशों की अंधी नकल करके हम न तो भारत को समझ सकते हैं और न ही उसे
सुधार सकते हैं।
आज भारत के सभी प्रबुद्ध व्यक्तियों को देश को सुधारने की आवश्यकता लग
रही है। पिछले सौ-दो सौ वर्षों में अनेक सामाजिक आंदोलन समाज को सुधारने
के लिए चले। स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष केवल राजनैतिक आज़ादी के
उद्देश्य को लेकर ही नहीं था। उस संघर्ष में लगे हुए नेता मृत भारत को
पुनर्जीवित करना चाहते थे। हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन में भारत की आत्मा
की खोज एक बड़ी प्रेरणा शक्ति थी। वीर दामोदर सावरकर, बालगंगाधर तिलक,
श्री अरविन्द, बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपतराय, सुभाषचन्द्र बोस,
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, नाथूराम गोडसे, डा. राजेन्द्र प्रसाद आदि नेता
केवल भारत को परतंत्रता से मुक्त कराने के लिए ही संघर्ष नहीं कर रहे थे।
वे भारत की प्राचीन संस्कृति को आधार बनाकर एक पुनर्जागरण का अभियान
चलाना चाहते थे। और ये वे लोग थे जो पश्चिम के आधुनिक विचारों से पूरी
तरह परिचित थे और मानते थे कि न केवल भारत का अपितु संसार का भावी विकास
प्राचीन भारतीय विचारों के आधार पर ही हो सकता है।
भारत आन्तरिक जीवन के बारे में खोज करने में अग्रणी रहा है। पर आज के समय
में भारत को भी प्राचीन भारतीय ऋषियों द्वारा शताब्दियों की गहरी साधना
से खोजे गए सत्य को एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है। उन खोजों के
परिणामों का संबंध मनुष्य की प्रकृति और उसके भविष्य से है और इसलिए वे
हम सभी के लिए प्रासंगिक हैं। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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