शनिवार, 5 दिसंबर 2015

वर्णमाला, स्वर, व्यञ्जन को जानेँ।

वर्णमाला, स्वर, व्यञ्जन को जानेँ।


संस्कृत में हर अक्षर, स्वर और व्यञ्जन के संयोग से बनता है, जैसे कि " क
" याने क् (हलन्त) अधिक अ ।
" स्वर " - सूर/लय सूचक है, और
" व्यञ्जन " - शृंगार सूचक ।
संस्कृत वर्णमाला में १४ स्वर, ३३ व्यञ्जन और २ स्वराश्रित ऐसे कुल
मिलाकर के ४९ वर्ण हैं ।
" स्वर " को " अच् " और
" व्यञ्जन " को " हल् " कहते हैं ।
अच् – १४ ( ५ + ९ ) ; हल् – ३३ ; स्वराश्रित – २
१४ स्वरों में से ५ शुद्ध स्वर हैं:- अ, इ, उ, ऋ, लृ और
९ अन्य स्वर:- आ, ई, ऊ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ
स्वर कि परिभाषा : -
मुख के अंदर स्थान-स्थान पर हवा को दबाने से भिन्न-भिन्न वर्णो का
उच्चारण होता है । मुख के अंदर पाँच विभाग हैं, जिनको " स्थान " कहते हैं
। इन पाँच विभागों में से प्रत्येक विभाग में एक-एक स्वर उत्पन्न होता
है, ये ही पाँच " शुद्ध स्वर "कहलाते हैं । स्वर उसको कहते हैं, जो एक ही
आवाज में बहुत देर तक बोला जा सके ।
व्यञ्जन कि परिभाषा : -
३३ व्यञ्जनों में २५ वर्ण, वर्गीय वर्ण हैं याने कि वे पाँच–पाँच वर्णो
के वर्ग में विभाजित किये हुए हैं । बाकी के ८ व्यञ्जन " विशिष्ट
व्यञ्जन" हैं, क्यों कि वे वर्ग़ीय व्यञ्जन की तरह किसी एक वर्ग में नहीं
बैठ सकतें । वर्गीय व्यञ्जनों का विभाजन उनके उच्चारण की समानता के
अनुसार किया गया है ।
* " कंठ " से आनेवाले वर्ण " कंठव्य " कहलाते हैं । उ.दा. क, ख, ग, घ
* " तालु " की मदद से होनेवाले उच्चार " तालव्य " कहलाते हैं । उ.दा. च, छ, ज, झ
* " मूर्धा " से (कंठ के थोडे उपर का स्थान) होनेवाले उच्चार "
मूर्धन्य " हैं । उ.दा. ट, ठ, ड, ढ, ण
* " दांत " की मदद से बोले जानेवाले वर्ण " दंतव्य " हैं । उ.दा. त, थ,
द, ध, न; औ
* " होठों " से बोले जानेवाले वर्ण " ओष्ठव्य " कहे जाते हैं । उ.दा.
प, फ, ब, भ, म
( ०१ ) कंठव्य / ' क ' वर्ग – क् ख् ग् घ् ङ् ;
( ०२ ) तालव्य / ' च ' वर्ग – च् छ् ज् झ् ञ् ;
( ०३ ) मूर्धन्य / ' ट ' वर्ग – ट् ठ् ड् ढ् ण् ;
( ०४ ) दंतव्य / ' त ' वर्ग – त् थ् द् ध् न् ;
( ०५ ) ओष्ठव्य / ' प ' वर्ग – प् फ् ब् भ् म् ;
विशिष्ट व्यञ्जन :- य् व् र् ल् श् ष् स् ह्
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स्वर और व्यञ्जन के अलावा "ं" (अनुस्वार), और 'ः' (विसर्ग) ये दो "
स्वराश्रित " कहे जाते हैं, और इनके उच्चार कुछ खास नियमों से चलते हैं ।
इन ४९ वर्णों को छोडकर, और भी कुछ वर्ण सामान्य तौर पे प्रयुक्त होते हैं ,
जैसे कि " त्र " , " क्ष " , " ज्ञ " , " श्र " , " ॐ " इत्यादि । पर ये
सब किसी न किसी व्यञ्जनों के संयोग से बने गये होने से उनका अलग अस्तित्व
नहि है; और इन्हें " संयुक्त वर्ण " भी कहा जा सकता है ।
" य " , " व " , " र " , और " ल " ये " विशिष्ट वर्ण " हैं क्यों कि
स्वर-जन्य (स्वरों से बने हुए) हैं, ये " अन्तःस्थ व्यञ्जन " भी कहे जाते
हैं ।
देखिए:
>> इ / ई + अ = य (तालव्य)
>> उ / ऊ + अ = व (दंतव्य तथा ओष्ठव्य)
>> ऋ / ऋ + अ = र (मूर्धन्य)
>> लृ / लृ + अ = ल (दंतव्य)
इनके अलावा
" श ", " ष ", और " स " के उच्चारों में बहुधा अशुद्धि पायी जाती है ।
इनके उच्चार स्थान अगर ध्यान में रहे, तो उनका उच्चारण काफी हद तक सुधारा
जा सकता है ।
श = तालव्य
ष = मूर्धन्य
स = दंतव्य
ह = कण्ठ्य
ये चारों " ऊष्म व्यञ्जन " होने से विशिष्ट माने गये हैं ।
ॐ शांति ।। जयतु हिन्दी ।। जयतु संस्कृतम् ।। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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