शनिवार, 26 दिसंबर 2015

संस्कृत भाषा व व्याकरण - सीखें और सिखायें।

संस्कृत भाषा व व्याकरण - सीखें और सिखायें।
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संस्कृत भाषा जितनी ही पुरातन है, उतनी ही वह अपने को चिर नवीन भी बनाती
आई है। विशाल वैदिक वांग्मय संस्कृत काव्य की अमूल्य निधि् है। कालिदास,
भवभूति, माघ, भास, बाणभट्ट , भर्तृहरि जैसे महान् रचनाकारों की कृतियाँ
संस्कृत की उदात्तता का परिचय देती हैं। इनके अलावा बहुत ऐसे अज्ञात कवि
हुए हैं जिन्होंने सामान्य जन की छोटी-छोटी इच्छाओं, सपनों एवं कठिनाइयों
को भी स्वर दिया है। संस्कृत के आधुनिक लेखन में यह लोकधारा और मुखर हुई
है। यही नहीं संस्कृत वर्तमान जीवन और हमारे संसार को समझने पहचानने के
लिये भी एक अच्छा माध्यम बनने की क्षमता रखती है।
आधुनिक भाषा-विज्ञान की दृष्टि से संस्कृत हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवारकी
हिन्द- ईरानी शाखाकी हिन्द-आर्य उपशाखामें शामिल है, । अनेक लिपियों में
लिखी जाती है, जिनकी प्राचीन लिपियों में 'सरस्वती ( सिन्धु ) ' और '
ब्राह्मी लिपि' एवं आधुनिक लिपियों में 'देवनागरी' प्रमुख है।
किसी भी भाषा के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण तथा विवेचनव्याकरण(ग्रामर)
कहलाता है। व्याकरण वह विद्या है जिसके द्वारा किसी भाषा का शुद्ध बोलना,
शुद्ध पढ़ना और शुद्ध लिखना आता है। किसी भी भाषा के लिखने, पढ़ने और
बोलने के निश्चित नियम होते हैं। भाषा की शुद्धता व सुंदरता को बनाए रखने
के लिए इन नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। ये नियम भी व्याकरण के
अंतर्गत आते हैं। व्याकरण भाषा के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
व्याकरण का दूसरा नाम "शब्दानुशासन" भी है। वह शब्दसंबंधी अनुशासन करता
है - बतलाता है कि किसी शब्द का किस तरह प्रयोग करना चाहिए। भाषा में
शब्दों की प्रवृत्ति अपनी ही रहती है; व्याकरण के कहने से भाषा में शब्द
नहीं चलते। परंतु भाषा की प्रवृत्ति के अनुसार व्याकरण शब्दप्रयोग का
निर्देश करता है। यह भाषा पर शासन नहीं करता, उसकी स्थितिप्रवृत्ति के
अनुसार लोकशिक्षण करता है। व्याकरण का महत्व यह श्लोक भली-भाँति
प्रतिपादित करता है :
यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥
अर्थ : " पुत्र! यदि तुम बहुत विद्वान नहीं बन पाते हो तो भी व्याकरण
(अवश्य) पढ़ो ताकि 'स्वजन' 'श्वजन' (कुत्ता) न बने और 'सकल' (सम्पूर्ण)
'शकल' (टूटा हुआ) न बने तथा 'सकृत्' (किसी समय) 'शकृत्' (गोबर का घूरा) न
बन जाय। "
महाभाष्यकार " पतंजलि " ने ऋग्वेद की इस ऋचा से व्याकरण ( संस्कृत ) का
स्वरूप बतलाया है :
चत्वारि श्रृंगात्रयो अस्य पादा द्वेशीर्षे सप्तहस्तासोऽस्य।
त्रिधावद्धो वृषभोरोरवीति महोदेवोमित्र्यां आविवेश॥ ( ऋग.४.५८.३ )
यद्यपि वैदिकी टीकाओं में इसकी व्याख्या भिन्न है किन्तु देखिये कितनी
सुन्दरता से उन्होंने इसका व्याकरण के सन्दर्भ में भावार्थ किया है , वो
इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि : " मनुष्य में एक वृषभ है , जो
दिव्य गुणों से युक्त महान देव है। इसके चार सींग ( नाम, आख्यात, उपसर्ग
और निपात ), तीन पैर ( भूत, भविष्यत और वर्तमान काल ), दो सिर ( नित्य और
अनित्य शब्द ), सात हाथ ( सात विभक्तियाँ ), यह तीन स्थानों ( वक्ष, कंठ
और मष्तिष्क ) पर बंधा हुआ बार-बार शब्द करता है। इस शब्द के देवता के
साथ सायुज्य स्थापित करने के लिये हमें व्याकरण पढ़ना चाहिये ।"
आपके मित्र अमित ने संस्कृत-व्याकरण की एक पुस्तकमाला संकलित की है। इसकी
सहायता से आप सुगमता पूर्वक हिन्दी से संस्कृत-व्याकरण का अध्ययन कर सकते
हैं।

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(१) संस्कृत व्याकरणम:यह पुस्तकपं.रामचन्द्र झा 'व्याकरणाचार्य'कृत है ,
इसके प्रकाशकचौखम्बा प्रकाशन, वाराणसीहैं। इसका आकार १५.९ मे.बा है ।
हिन्दी से संस्कृत सीखने की शुरुआत करने वालों के लिये यह उत्तम ग्रन्थ
है। https://ia801705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/SanskritVyakaranam.pdf
(२) संस्कृत व्याकरण प्रवेशिका:यह पुस्तकश्री बाबूराम सक्सेनाद्वारा
लिखित है। इसका आकार २१.६ मे.बा. है । उन जिज्ञासुओं के लिए एक अच्छी
पुस्तक है जो पहले-पहल संस्कृत व्याकरण सीखना चाहते हैं।
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/sanskrit_vyakaran_praveshika.pdf
(३) प्रौढ़ रचनानुवाद कौमुदी: डॉ.कपिलदेव द्विवेदी आचार्यलिखित इस पुस्तक
के प्रकाशक हैं विश्वविद्यालय प्रकाशन, गोरखपुर, उपरोक्त दोनों ग्रन्थों
का अध्ययन करते समय यह पुस्तक विशेष रूप से प्रभावी है । इसका आकार ४४.३
मे.बा. है। https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/PraudhaRachananuvadKaumudi.pdf
(४) लघु सिद्धांत कौमुदी :यह संस्कृत-व्याकरण का सारभूत ग्रंथ है। इसके
रचनाकार श्री वरदराज जी हैं। कहते हैं कि लघु सिद्धांत कौमुदी संस्कृत
व्याकरण का वह ग्रंथ है जिसका अध्ययन किए बिना संस्कृत का पूर्ण ज्ञान
प्राप्त नहीं होता और पढ़ लेने पर संस्कृत व्याकरण की योग्यता में संदेह
नहीं रहता। यह ग्रन्थ मूलत: संस्कृत में ही है जिसकी संस्कृत व हिन्दी
में अनेक व्याख्याकारों द्वारा विभिन्न व्याख्यायें प्रस्तुत की गईं हैं।
हिन्दी में इस ग्रन्थ की सम्भवत: सबसे विशद व्याख्या श्री भीमसेन
शास्त्री द्वारा प्रस्तुत है जो भैमी व्याख्या के नाम से प्रसिद्ध है। यह
छ: खंडों में उपलब्ध है। भैमी प्रकाशन , दिल्लीद्वारा प्रकाशित है। इसके
सभी खंडों का वर्णन निम्नानुसार है :
४.१ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - १:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/laghu-siddhanta-kaumudi-bhaimi-vyakhya-i-bhim-sena-shastri.pdf
आकार- ३४.३मे.बा.
४.२ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - २:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-Bhaimi-Vyakhya-Avyaya-Prakaran.pdf
आकार- ६.५मे.बा.
४.३ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ३:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-III-Bhaimi-Vyakhya-Kridanta.pdf
आकार- २०.९मे.बा.
४.४ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ४:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-IV-Bhaimi-Vyakhya-Samas.pdf
आकार- २३.८मे.बा.
४.५ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ५:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-V-Taddhita-Bhim-Sena-Shastri.pdf
आकार- १५.०मे.बा.
४.६ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ६:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-Bhaimi-Vyakhya-Stri-Pratyaya-Prakarana-Part-6.pdf
आकार- १६.६मे.बा.
संस्कृत व्याकरण के जिज्ञासुओं को लघु सिद्धांत कौमुदी का अध्ययन अवश्य
ही करना चाहिए। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

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