सोमवार, 30 नवंबर 2015

चीन में संस्कृत भाषा की बढ़ती लोकप्रियता।

हिंदुस्तान की प्राचीन भाषा संस्कृत के प्रति चीन की नई पीढ़ी में बढ़ती दीवानगी पूरे हिंदुस्तान को गौरवान्वित कर रही हैं। हाल ही में 60 चीनी बुद्दिजीवियों ने बुद्धिस्ट इंस्टिट्यूट के एक संस्कृत कैंप में नाम लिखाया है। 6 दिनों तक चलने वाली इस ट्रेनिंग में लोगों को संस्कृत लिखना और पढ़ना सिखाया जाएगा। इस कैंप में हिस्सा लेने वाले लोग देव भाषा संस्कृत को सीखकर प्राचीन भारत के धर्म और योग को समझना चाहते हैं। संस्कृत में बन रही तीसरी फिल्म गौर करने वाली बात ये कि जिन 300 लोगों ने इस संस्कृत कैंप के लिए आवेदन किया उनमें ज्यादा संख्या योगा प्रशिक्षक, यांत्रिक डिजाइनर्स और होटल प्रबंधन से जुड़े लोगों की रही। चीन में विश्व के सबसे प्राचीन भाषा की बढ़ती लोकप्रियता पर पुरजोर मुहर लगाते हुए संस्कृत के विख्ताय विद्वान और दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर रहे डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री कहते हैं। “संस्कृत का बढ़ता आकर्षण हमारे लिए प्रसन्नता की बात है, बहुत पहले संस्कृत के महान विद्वान एच एस विल्सन जो कोलकाता गर्वमेंट संस्कृत कॉलेज में प्रिंसिपल रहे थे उन्होंने कहा था कि अमृत तो मधुर होता है, संस्कृत उससे भी अधिक मधुर है, इसी कारण विदेशी भी संस्कृत में आनंद का अनुभव करते हैं, उन्होंने लिखा था कि जब तक गंगा और गोदावरी है, जब तक विंध्य और हिमालय पर्वत है तब तक संस्कृत बनी रहेगी। चीन भारत की संस्कृति को और अच्छी तरह समझना चाहता है, वैसे दोनों देशों के बीच का संपर्क हजारों साल पुराना है,चीनी यात्री फह्यान भी नालंदा विश्वविद्यालय विद्या प्राप्ति के लिए आए थे, कई ग्रंथ वो अपने साथ ले गए जिनका अनुवाद उन्होंने संस्कृत में किया।“ वैसे इस भाषा का आकर्षण सिर्फ चीन में ही नहीं दुनिया के कई और मुल्कों में भी है ।कई देश संस्कृत में लिखे हमारे पवित्र ग्रंथों पर शोध कर रहे हैं । यही नहीं कई देशों में संस्कृत विश्वविद्यालय वेद के बारे में अध्ययन करके नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने में जुटे हैं । इस बात की तस्दीक संस्कृत के प्रकांड विद्वान डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री भी करते हैं । “विश्व के कई विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है, जर्मनी, हालैंड, इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका,कनाडा, मेक्सिको, जापान हर जगह इसकी पढ़ाई होती है, विदेशी छात्र बड़ी संख्या में प्राचीन पद्धति से संस्कृत सीखने हिंदुस्तान आते हैं” ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि चीन में संस्कृत का पदार्पण छठीं शताब्दी में तब हुआ जब वहां से बौद्ध भिक्षु भारत आए। लेकिन दुनिया की नई पीढ़ी में इस भाषा का रुझान अब इसलिए भी बढ़ गया है क्यूंकि संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को योग दिवस घोषित किया है । दरअसल संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन भाषा ही नहीं समस्त भारतीय भाषाओं की जननी भी माना गया है। संस्कृत का अर्थ है परिपूर्ण भाषा। इतिहास इस बात का गवाह है कि 3000 वर्ष पूर्व तक भारत में सिर्फ संस्कृत बोली जाती थी, तभी तो ईसा से 500 वर्ष पूर्व पाणिनी ने दुनिया को पहला व्याकरण ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ संस्कृत में लिखा था। इतिहासकारों के मुताबिक संस्कृत ऐसी भाषा है जिसकी रचना नहीं खोज की गई है। जानकार बताते हैं कि इस भाषा का आविष्कार करने वाले देवलोक के देवता थे इसलिए इसे देववाणी भी कहा जाता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें