सोमवार, 30 नवंबर 2015

चीन में संस्कृत भाषा की बढ़ती लोकप्रियता।

हिंदुस्तान की प्राचीन भाषा संस्कृत के प्रति चीन की नई पीढ़ी में बढ़ती दीवानगी पूरे हिंदुस्तान को गौरवान्वित कर रही हैं। हाल ही में 60 चीनी बुद्दिजीवियों ने बुद्धिस्ट इंस्टिट्यूट के एक संस्कृत कैंप में नाम लिखाया है। 6 दिनों तक चलने वाली इस ट्रेनिंग में लोगों को संस्कृत लिखना और पढ़ना सिखाया जाएगा। इस कैंप में हिस्सा लेने वाले लोग देव भाषा संस्कृत को सीखकर प्राचीन भारत के धर्म और योग को समझना चाहते हैं। संस्कृत में बन रही तीसरी फिल्म गौर करने वाली बात ये कि जिन 300 लोगों ने इस संस्कृत कैंप के लिए आवेदन किया उनमें ज्यादा संख्या योगा प्रशिक्षक, यांत्रिक डिजाइनर्स और होटल प्रबंधन से जुड़े लोगों की रही। चीन में विश्व के सबसे प्राचीन भाषा की बढ़ती लोकप्रियता पर पुरजोर मुहर लगाते हुए संस्कृत के विख्ताय विद्वान और दिल्ली विश्वविद्यालय में संस्कृत के प्रोफेसर रहे डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री कहते हैं। “संस्कृत का बढ़ता आकर्षण हमारे लिए प्रसन्नता की बात है, बहुत पहले संस्कृत के महान विद्वान एच एस विल्सन जो कोलकाता गर्वमेंट संस्कृत कॉलेज में प्रिंसिपल रहे थे उन्होंने कहा था कि अमृत तो मधुर होता है, संस्कृत उससे भी अधिक मधुर है, इसी कारण विदेशी भी संस्कृत में आनंद का अनुभव करते हैं, उन्होंने लिखा था कि जब तक गंगा और गोदावरी है, जब तक विंध्य और हिमालय पर्वत है तब तक संस्कृत बनी रहेगी। चीन भारत की संस्कृति को और अच्छी तरह समझना चाहता है, वैसे दोनों देशों के बीच का संपर्क हजारों साल पुराना है,चीनी यात्री फह्यान भी नालंदा विश्वविद्यालय विद्या प्राप्ति के लिए आए थे, कई ग्रंथ वो अपने साथ ले गए जिनका अनुवाद उन्होंने संस्कृत में किया।“ वैसे इस भाषा का आकर्षण सिर्फ चीन में ही नहीं दुनिया के कई और मुल्कों में भी है ।कई देश संस्कृत में लिखे हमारे पवित्र ग्रंथों पर शोध कर रहे हैं । यही नहीं कई देशों में संस्कृत विश्वविद्यालय वेद के बारे में अध्ययन करके नई प्रौद्योगिकी प्राप्त करने में जुटे हैं । इस बात की तस्दीक संस्कृत के प्रकांड विद्वान डॉक्टर सत्यव्रत शास्त्री भी करते हैं । “विश्व के कई विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है, जर्मनी, हालैंड, इंग्लैंड, फ्रांस, अमेरिका,कनाडा, मेक्सिको, जापान हर जगह इसकी पढ़ाई होती है, विदेशी छात्र बड़ी संख्या में प्राचीन पद्धति से संस्कृत सीखने हिंदुस्तान आते हैं” ऐतिहासिक तथ्य बताते हैं कि चीन में संस्कृत का पदार्पण छठीं शताब्दी में तब हुआ जब वहां से बौद्ध भिक्षु भारत आए। लेकिन दुनिया की नई पीढ़ी में इस भाषा का रुझान अब इसलिए भी बढ़ गया है क्यूंकि संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को योग दिवस घोषित किया है । दरअसल संस्कृत को विश्व की सबसे प्राचीन भाषा ही नहीं समस्त भारतीय भाषाओं की जननी भी माना गया है। संस्कृत का अर्थ है परिपूर्ण भाषा। इतिहास इस बात का गवाह है कि 3000 वर्ष पूर्व तक भारत में सिर्फ संस्कृत बोली जाती थी, तभी तो ईसा से 500 वर्ष पूर्व पाणिनी ने दुनिया को पहला व्याकरण ग्रंथ ‘अष्टाध्यायी’ संस्कृत में लिखा था। इतिहासकारों के मुताबिक संस्कृत ऐसी भाषा है जिसकी रचना नहीं खोज की गई है। जानकार बताते हैं कि इस भाषा का आविष्कार करने वाले देवलोक के देवता थे इसलिए इसे देववाणी भी कहा जाता है।

संस्कृत सीखने के लिए इन वीडियो को डाउनलोड करेँ। (आसान उदाहरणोँ द्वारा संस्कृत सीखेँ।)

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                      ये दो संस्कृत सीखाने वाले वीडियो के PLAYLIST है एक मेँ ४० वीडियो है एक मेँ १६ आप सारे वीडियो डाउनलोड कर के संस्कृत सीखने का अभ्यास करेँ। शीघ्र सीख जाऐँगे। जिन लोगोँ के पास अभी अलग से संस्कृत सीखने का समय नहीँ मिल पा रहा है तो इन YOUTUBE VEDIOS को डाउनलोड करके आसानी से सीख सकते हैँ।

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अगर आप भारतीय संस्कृति पर विश्वास करने वाले हैँ तो अब मैँ आपको ऐसी जानकारी बताने वाला हूँ जिसको पढ कर आप अपना संतुलन खो देँगे।

अगर आप भारतीय संस्कृति पर विश्वास करने वाले हैँ तो अब मैँ आपको ऐसी जानकारी बताने वाला हूँ जिसको पढ कर आप अपना संतुलन खो देँगे। ============================== पूरे भारत मेँ संस्कृत के महाविद्यालय २०० से भी कम हैँ जिनमेँ से कुछ शासकीय हैँ कुछ अशासकीय बाकी का कुछ पता ही नहीँ है की वो हैँ भी या नहीँ। ============================== अब आते हैँ संस्कृत विद्यालय मेँ पढने/पढाने वालोँ के पास इनमेँ पढने वालेँ छात्रोँ की संख्या केवल नाम मात्र की है। इन छात्रोँ का संस्कृत ज्ञान सून्य है कुछ नहीँ पता इन्हेँ ये नाम मात्र के - व्याकरण विभाग, साहित्य विभाग, ज्योतिष विभाग, आदि विभागोँ के छात्र और शिक्षक हैँ। (शिक्षकोँ को थोडा बहुत संस्कृत विभागोँ के विषयोँ का ज्ञान तो है लेकिन उसका महत्व और धार्मिक महत्व और ज्ञान सून्य है।) इसका बडा कारण है वर्णव्यवस्था का दुष्प्रचार वर्णव्यवस्था को जातिवाद मेँ बदलकर छुआछूत पैदा कर दिया और संस्कृत और धर्मकार्योँ को केवल ब्राह्मणोँ तक ही सीमित कर दिया गया। जिसका दुष्परिणाम ये हुआ की इन संस्कृत महा विद्यालयोँ मेँ प्रवेश लेने तक कोई नहीँ आता। इन विद्यालयोँ मेँ छात्रोँ की संख्या न के बराबर है। क्योँकी भारत के हिँदुओँ को न संस्कृत विद्यालयोँ के बारे मेँ जानकारी है न संस्कृत का महत्व ही पता है। कहने को संस्कृत पूर्ण वैज्ञानिक भाषा है लेकिन भारत मेँ मृतप्राय भाषा होती जा रही है। ============================== अगर संस्कृत साहित्य और भाषा के पुनरुत्थान मेँ भारत के विचारवान व्यक्तियोँ और हिँदू संगठनोँ ने अपना कर्तव्य पूर्ण नहीँ किया तो भारत से संस्कृत का अस्तित्व मिटना निश्चित है। कोई चमत्कार नहीँ होने वाला हमेँ ही संस्कृत का संरक्षण करना होगा अगर चमत्कार के लिए बैठे हैँ तो डूब मरो दो बूँद पानी मेँ। आज भारत मेँ संस्कृत जानने वाले लोगोँ की संख्या ५ लाख से भी कम हो चुकी है। ============================== उठो भारत के वीर जवानोँ धन-संपदा इकट्ठा करने से क्या होगा आप अपना धन सनातन संस्कृति के संरक्षण मेँ लगाँए। उस धन से आप भारतीय संस्कृति का ज्ञान अर्जित करने मेँ सदुपयोग करेँ। डिग्रियाँ सर्टिफिकेट और विश्व मेँ सबसे धनी भी बन गये तो फिर क्या ??? जब आपका धर्म और संस्कृति ही नहीँ बचेगी तो आपका धन किस कार्य मेँ उपयोगी सिद्ध होगा ??? ============================================================

जो हिँदू मित्र संस्कृत सीखना चाहते हैँ वो ध्यान देँ।

जो हिँदू मित्र संस्कृत सीखना चाहते हैँ वो ध्यान देँ।

==>> भारत मेँ "संस्कृत भारती" नाम की संस्था है जो संस्कृत संभाषण सिखाती है।
==>> भारत मेँ मुख्यतः कुछ ही जगहोँ पर पूर्ण मन से संस्कृत का आदर किया
जाता है। पहला बनारस और दूसरा दिल्ली का संस्कृत शैक्षणिक संस्थान।
बैँगलोर आदि जगहोँ पर भी संस्कृत संभाषण केँद हैँ जहाँ संस्कृत सिखायी
जाती है। इसके अलावा मध्यप्रदेश के सतना, उज्जैन आदि जिलोँ मेँ
संस्कृत सीखाने के छोटे संस्थान हैँ।
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संस्कृत का मुख्य केँद्र वराणसी है।
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बनारस (वराणसी) और दिल्ली मेँ जो संस्कृत संस्थान हैँ वहाँ १५-१५ दिनोँ
का शिविर चलता है जहाँ १५ दिनोँ मेँ संस्कृत संभाषण सिखा दिया जाता है।
जिसको संस्कृत सीखना हो वो संस्कृत भारती या संस्कृत शैक्षणिक संस्थान
दिल्ली से संपर्क करे।
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भारत के कुछ अन्य जिलोँ मेँ संस्कृत संस्थान हैँ। अधिक जानकारी के लिए
संस्कृत संस्थानोँ एवं आर्य समाज, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, विश्व हिँदू
परिषद, बजरंग दल और हिँदू महासभा से संपर्क करेँ।
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संस्कृत वाक्योँ की अदभुत रचनात्मक विशेषता।

संस्कृत वाक्योँ की अदभुत रचनात्मक विशेषता।
                             (१) अक्षरों की क्रमबद्धता से बनती रोचक काव्य पंक्ति। अंग्रेजी में THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG. ऐसा प्रसिद्ध वाक्य है। अंग्रेजी आल्फाबेट के सभी अक्षर उसमें समाहित है। किन्तु कुछ कमी भी है :-
१) अंग्रेजी अक्षरें २६ है और यहां जबरन ३३ अक्षरों का उपयोग करना पड़ा है। चार O है और A तथा R दो-दो है।
२) अक्षरों का ABCD... यह स्थापित क्रम नहीं दिख रहा। सब अस्तव्यस्त है।
                   सामर्थ्य की दृष्टि से संस्कृत बहुत ही उच्च कक्षा की है यह अधोलिखित पद्य और उनके भावार्थ से पता चलता है।
क: खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोऽटौठीडडण्ढण:।
तथोदधीन् पफर्बाभीर्मयोऽरिल्वाशिषां सह।।
                    अर्थात्- पक्षीओं का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दुसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु। संहार को में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करनार कौन? राजा मय कि जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं। " आप देख सकते हैं कि संस्कृत वर्णमाला के सभी ३३ व्यंजनों इस पद्य में आ जाते हैं इतना ही नहीं, उनका क्रम भी योग्य है।
                           (२) एक ही अक्षरों का अद्भूत अर्थ विस्तार। माघ कवि ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल "भ" और "म " दो ही अक्षरों से एक श्लोक बनाया है।
भूरिभिर्भारिभिर्भीभीराभूभारैरभिरेभिरे।
भेरीरेभिभिरभ्राभैरूभीरूभिरिभैरिभा:।।
                     अर्थात्- धरा को भी वजन लगे ऐसा वजनदार, वाद्य यंत्र जैसा अवाज निकाल ने वाले और मेघ जैसा काला निडर हाथी ने अपने दुश्मन हाथी पर हमला किया। " किरातार्जुनीयम्काव्य संग्रह में केवल " न " व्यंजन से अद्भूत श्लोक बनाया है और गजब का कौशल्य का प्रयोग करके भारवि नामक महाकवि ने थोडे में बहुत कहा है:-
न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नाना नना ननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नन्नुनन्नुनुत्।।
                         अर्थात् :- जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है।।

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संस्कृत भाषा ही सर्वश्रेष्ठ क्योँ और इसकी वैज्ञानिकता क्या?

प्रश्न:- संस्कृत भाषा ही सर्वश्रेष्ठ क्योँ और इसकी वैज्ञानिकता क्या? उत्तर:- देवभाषा संस्कृत की गूंज कुछ साल बाद अंतरिक्ष में सुनाई दे सकती है। इसके वैज्ञानिक पहलू का मुरीद हुआ अमेरिका नासा की भाषा बनाने की कसरत में जुटा है।इस प्रोजेक्ट पर भारतीय संस्कृत विद्वानों के इन्कार के बाद अमेरिका अपनी नई पीढ़ी को इस भाषा में पारंगत करने में जुट गया है। नासा के वैज्ञानिक 'रिक ब्रिग्स' ने 1985 मेंभारत से संस्कृत के 1,000 प्रकांड विद्वानों को बुलाया था। उन्हें नासा में नौकरी का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने बताया कि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है। विदेशी उपयोग में अपनी भाषा की मदद देने से उन विद्वानों ने इन्कार कर दिया था। इसके कई अन्य वैज्ञानिक पहलू समझते हुए अमेरिका ने वहां नर्सरी क्लास से ही बच्चों को संस्कृत की शिक्षा शुरू कर दी है। नासा के 'मिशन संस्कृत' की पुष्टि उसकी वेबसाइट भी करती है। उसमें स्पष्ट लिखा है कि 20 साल से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और मेहनत कर चुकी है। साथ ही इसके कंप्यूटर प्रयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ भाषा का भी उल्लेख है। 'नासा' संस्कृत को कंप्यूटर की भाषा बनाने के लिए शोध कर रहा है क्यूंकी इसका वाक्यविन्यास (Syntax) उत्तम है और त्रुटि की जरा भी संभावना नहीं है.... इधर हमारे देश में इंग्लिश बोलना शान की बात मानी जा रही है। इंग्लिश नहीं आने पर लोग आत्मग्लानि अनुभव करते है, जगह जगह इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स चल रहें है और उधर हमारे देश की संस्कृत विदेशों में सम्मान पा रही है...लोर्ड मैकाले वाकई सफल रहें अपने षडयंत्र में। ** भारत की सरकार और लोगों को भी अब जागना चाहिए और अँग्रेजी की गुलामी से बाहर निकाल कर अपनी भाषा और संस्कृति पर गर्व करना चाहिए। भारत सरकार को भी'संस्कृत' को नर्सरी से ही पाठ्यक्रम में शामिल करके देववाणी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाना चाहिए। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

संस्कृत सभी भाषाओं की जननी हैः सर्वोच्च न्यायालय।

संस्कृत सभी भाषाओं की जननी हैः सर्वोच्च न्यायालय। संस्कृत भाषा भारतीय संस्कृति का आधारस्तम्भ है। यह संसार की समृद्धतम भाषा है। इसका अध्ययन मनुष्य को सूक्ष्म विचारशक्ति प्रदान करता है और मौलिक चिंतन को जन्म देता है। इससे मन में स्वाभाविक ही अंतर्मुख होने लगता है। सनातन संस्कृति के सभी मूल शास्त्र संस्कृत भाषा में ही हैं। अतः उनके रसपान व ज्ञान में गोता लगाने के लिए इस भाषा का ज्ञान होना अति आवश्यक है। पूज्य संत श्री आशाराम जी बापू पिछले 50 वर्षों से अपने सत्संगों द्वारा इसकी महत्ता बताते आये हैं और सत्संग में वेद, उपनिषद, गीता, भागवत के श्लोकों की सुंदर व्याख्या करके उनमें छुपे अमृत का रसास्वादन कराते रहे हैं। संस्कृत व संस्कृति के रक्षक पूज्य बापू जी कहते हैं- "संस्कृत भाषा देवभाषा है और इसके उच्चारणमात्र से दैवी गुण विकसित होने लगते हैं। अधिकांश मंत्र संस्कृत में ही हैं।" इस भाषा का ज्ञान सभी भारतवासियों को होना ही चाहिए। विद्यालयों में इसकी शिक्षा आवश्यक रूप से सभी बच्चों को मिलनी चाहिए। माननीय सर्वोच्च न्यायालय को सरकार की ओर से पेश अटॉर्नी जनरल ने बताया कि "केन्द्रिय विद्यालयों में शिक्षा 6 से 8 तक संस्कृत ही तीसरी भाषा होगी। जर्मन पढ़ाया जाना गलत है और गलती को जारी नहीं रखा जा सकता।" इस पर माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने कहाः "हमें क्यों अपनी संस्कृति भूलनी चाहिए ! संस्कृत के जरिये आप अन्य भाषाओं को आसानी से सीख सकते हैं। संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। सरकार अगले सत्र से इसे बेहतर तरीके से क्रियान्वित करे।" संस्कृत का अखंड प्रवाह पालि, प्राकृत व अपभ्रंश भाषाओं में बह रहा है। चाहे तमिल, कन्नड़ या बंगाली हो अथवा मलयालम, ओड़िया, तेलुगू, मराठी या पंजाबी हो – सभी भारतीय भाषाओं के लिए लिए संस्कृत ही अंत-प्रेरणा- स्रोत है। आज भी इन भाषाओं का पोषण और संवर्धन संस्कृत द्वारा ही होता है। संस्कृत की सहायता से कोई भी उत्तर भारतीय व्यक्ति तेलुगू, कन्नड़, ओड़िया, मलयालम आदि दक्षिण एवं पूर्व भारतीय भाषाओं को सरलतापूर्वक सीख सकता है। आज तो ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज और कोलम्बिया जैसे प्रतिष्ठित 200 से भी ज्यादा विदेशी विश्वविद्यालय ों में संस्कृत पढ़ायी जा रही है। ब्रिटिश स्कूलों में संस्कृत अनिवार्य 'संस्कृत से छात्रों में प्रतिभा का विकास होता है। यह उनकी वैचारिक क्षमता को निखारती है, जो उनके बेहतर भविष्य के लिए सहायक है।' ऐसा मानना है लंदन के सेंट जेम्स कान्वेंट स्कूल का, जहाँ बच्चों को द्वितिय भाषा के रूप में संस्कृत सीखना आवश्यक है। याद्दाश्त को भी बेहतर बनाती है संस्कृत शिक्षाविद् पॉल मॉस के अनुसार 'संस्कृत से सेरेब्रेल कॉर्टेक्स सक्रिय होता है। किसी बालक के लिए उँगलियों और जुबान की कठोरता से मुक्ति पाने के लिए देवनागरी लिपि व संस्कृत बोली ही सर्वोत्तम मार्ग है। वर्तमान यूरोपीय भाषाएँ बोलते समय जीभ और मुँह के कई हिस्सों का और लिखते समय उँगलियों की कई हलचलों का इस्तेमाल ही नहीं होता, जब कि संस्कृत उच्चारण- विज्ञान के माध्यम से मस्तिष्क की दक्षता को विकसित करने में काफी मदद करती है।' डॉ. विल डुरंट लिखते हैं- 'संस्कृत आधुनिक भाषाओं की जननी है। संस्कृत बच्चों के सर्वांगीण बोध ज्ञान को विकसित करने में मदद करती है।' कई शोधों में यह पाया गया कि जिन छात्रों की संस्कृत पर अच्छी पकड़ थी, उन्होंने गणित और विज्ञान में भी अच्छे अंक प्राप्त किये। वैज्ञानिकों का मानना है कि संस्कृत के तार्किक और लयबद्ध व्याकरण के कारण स्मरणशक्ति और एकाग्रता का विकास होता है। इसके ताजा उदाहरण हैं गणित का नोबेल पुरस्कार कहे जाने वाले सर्वोच्च सम्मान 'फील्डस मेडल' के विजेता भारतीय मूल के गणितज्ञ मंजुल भार्गव, जो अपनी योग्यता का श्रेय संस्कृत भाषा को देते हैं। इसके तर्कपूर्ण व्याकरण ने उनके भीतर गणित की बारीकियों को समझने का तार्किक नजरिया विकसित किया। मैकाले शिक्षा- पद्धति के पढ़े लोग अज्ञानवश इसे सिर्फ पूजा-पाठ, कर्मकाण्ड से जुड़ा मानकर इस भाषा को अवैज्ञानिक तथा अनुपयोगी बताते हैं परंतु वास्तविकता यह है कि वर्तमान में यह भाषा केवल साहित्य, दर्शन या अध्यात्म तक ही नहीं बल्कि गणित, विज्ञान, औषधि, चिकित्सा, इतिहास, मनोविज्ञान, भाषाविज्ञान जैसे विविध क्षेत्रों में भी अपना महत्वपूर्ण स्थान बना रही है। इसके साथ ही ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कम्पयूटर क्षेत्र में भी संस्कृत के प्रयोग की सम्भावनाओं पर भारत ही नहीं, फ्रांस, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी, इंग्लैंड आदि देशों में शोध जारी है। वानस्पतिक सौंदर्य प्रसाधन (डर्बल कॉस्मैटिक्स) एवं आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति के तेजी से बढ़ते प्रचलन से संस्कृत की उपयोगिता और बढ़ गयी है क्योंकि आयुर्वेद पद्धतियों का ज्ञान संस्कृत में ही लिपिबद्ध है। अपनी सुस्पष्ट और छंदात्मक उच्चारण प्रणाली के चलते संस्कृत भाषा को 'स्पीच थेरेपी टूल' (भाषण चिकित्सा उपकरण) के रूप में मान्यता मिल रही है। लौकिक नश्वर उन्नति, वैज्ञानिक प्रगति एवं सुख-सुविधा के लिए संस्कृत का लाभ लेने वालों को हमारा धन्यवाद है। परंतु यह तो बहुत छोटी चीज है, छाछ है, मक्खन तो संस्कृत साहित्य एवं शास्त्रों में छुपा अध्यात्मविद्या का ज्ञानामृत है, जो अनमोल है। मनुष्य जन्म के परम लक्ष्य परमात्मप्राप्ति हेतु वैदिक, औपनिषदिक एवं गीता, भागवत, रामायण, महाभारत का ज्ञान भण्डार तो केवल और केवल संस्कृत भाषा में ही है। अन्यत्र जो भी है संस्कृत से ही प्रसादरूप से प्राप्त किया गया है। व्यासोच्छिष्टं जगत्सर्वम्। जब विदेशी इसका भरपूर लाभ ले रहे हैं तो भारतीय इस अनूठी सभ्यता की की अनमोल धरोहर से वंचित क्यों रहें ! भारतीय संस्कृति की सुरक्षा, चरित्रवान नागरिकों के निर्माण, सदभावनाओं के विकास एवं विश्वशांति हेतु भारत एवं पूरे विश्व में संस्कृत का अध्ययन- अध्यापन अवश्य होना चाहिए। इसी से होगा सबका मंगल, सबका भला.... सबका विकास, सच्चा विकास-मंगल और भला वाला। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

वैज्ञानिक अनुसंधानों का आधार है देवभाषा संस्कृत।

वैज्ञानिक अनुसंधानों का आधार है देवभाषा संस्कृत।

                             देवभाषा संस्कृत सभी भाषाओं की जननी है। वेद भी इसी भाषा में होने के कारण इसे वैदिक भाषा भी कहते हैं। 'संस्कृत' शब्द का अर्थ होता है परिष्कृत, पूर्ण एवं अलंकृत। संस्कृत में बहुत कम शब्दों में अधिक आशय प्रकट कर सकते हैं। इसमें जैसा लिखा जाता है, वैसा ही उच्चारण किया जाता है। संस्कृत में भाषागत त्रुटियाँ नहीं मिलती हैं। भाषाविद मानते हैं कि विश्व की सभी भाषाओं की उत्पत्ति का तार कहीं-न-कहीं संस्कृत से जुड़ा है। यह सबसे पुरानी एवं समृद्ध भाषा है। विभिन्न भाषाओं में संस्कृत के शब्द बहुतायत में पाये जाते हैं। कई शब्द अपभ्रंश के रूप में हैं तो कई ज्यों-के-त्यों हैं। संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है। वैज्ञानिकों का भी संस्कृत को समर्थन संस्कृत की वैज्ञानिकता बड़ी-बड़ी वैज्ञानिक खोजों का आधार बनी है। वेंकट रमन, जगदीशचन्द्र बसु, आचार्य प्रफुल्लचन्द्र राय, डॉ. मेघनाद साहा जैसे विश्वविख्यात विज्ञानी संस्कृत भाषा से अत्यधिक प्रेम था और वैज्ञानिक खोजों के लिए ये संस्कृत को आधार मानते थे। इनका कहना था कि संस्कृत का प्रत्येक शब्द वैज्ञानिकों को अनुसंधान के लिए प्रेरित करता है। प्राचीन ऋषि-महर्षियों ने विज्ञान में जितनी उन्नति की थी, वर्तमान में उसका कोई तुलना नहीं कर सकता।
                        ऋषि-महर्षियों का सम्पूर्ण ज्ञान-सार संस्कृत में निहित है। आचार्य राय विज्ञान के लिए संस्कृत की शिक्षा आवश्यक मानते थे। जगदीशचन्द्र बसु ने अपने अनुसंधानों के स्रोत संस्कृत में खोजे थे। डॉ. साहा अपने घर के बच्चों की शिक्षा संस्कृत में ही कराते थे और एक विज्ञानी होने के बाद भी बहुत समय तक वे स्वयं बच्चों को संस्कृत पढ़ाते थे। संस्कृत शब्दों द्वारा वैज्ञानिक अनुसंधान एक बार संस्कृत के महापंडित आचार्य कपिल देव शर्मा ने जगदीशचन्द्र बसु से पूछाः "वनस्पतियों में प्राण होने का अनुसंधान करने की प्रेरणा आपको कहाँ से मिली ?" उत्तर के बजाय बसु ने प्रश्न कियाः "आप संस्कृत का ऐसा शब्द बताइये जिससे बहुत से पेड़-पौधों का बोध हो।" आचार्य शर्मा को 'शस्यश्यामलां मातरम्।' ध्यान आ गया। उन्होंने कहाः "शस्य"। "शस्य किस धातु से बना है ?" "शस् धातु से।" "शस का अर्थ?" "हत्या करना।" "तो शस्य का क्या अर्थ हुआ ?" "जिनकी हत्या करना सम्भव हो।" आचार्य शर्मा से बसु महोदय ने मुस्कराकर कहाः "यदि वनस्पतियों में प्राण न होते तो उन्हें हत्या योग्य कहा ही न जाता। संस्कृत के 'शस्य' शब्द ने ही मुझे इस अनुसंधान के लिए प्रेरित किया।" उन्होंने ऐसे कई संस्कृत शब्दों के बारे में आचार्य शर्मा को बताया जो उन्हें अनुसंधान में सहायक सिद्ध हुए।
           भारतीय वैज्ञानिकों के साथ पाश्चात्य विद्वानों ने भी संस्कृत की समृद्धता को स्वीकारा है। सर विलियम जोन्स ने 2 फरवरी, 1786 को एशियाटिक सोसायटी के माध्यम से सारे विश्व में यह घोषणा कर दी थीः "संस्कृत एक अदभुत भाषा है। यह ग्रीक से अधिक पूर्ण है, लैटिन से अधिक समृद्ध और दोनों ही भाषाओं से अधिक परिष्कृत है।" आधुनिक विज्ञान के लिए संस्कृत बन सकती है वरदानरूप वर्तमान समय में संस्कृत भाषा विश्वभर के विज्ञानियों के लिए शोध का विषय बन गयी है। यूरोप की सर्वश्रेष्ठ पत्रिका 'फोर्ब्ज' द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार 'संस्कृत भाषा कम्पयूटर के लिए सबसे उत्तम भाषा है तथा समस्त यूरोपिय भाषाओं की जननी है। आधुनिक विज्ञान सृष्टि के रहस्यों को सुलझाने में बौना पड़ रहा है। अलौकिक शक्तियों से सम्पन्न मंत्र-विज्ञान की महिमा से विज्ञन आज भी अनभिज्ञ है। उड़न तश्तरियाँ कहाँ से आती हैं और कहाँ गायब हो जाती हैं इस प्रकार की कई बातें हैं जो आज भी विज्ञान के लिए रहस्य हैं। प्राचीन संस्कृत ग्रंथों से ऐसे कई रहस्यों को सुलझाया जा सकता है। विमान विज्ञान, नौका विज्ञान से संबंधित कई महत्त्वपूर्ण सिद्धान्त हमारे ग्रंथों से प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार के और भी अनगिनत सूत्र हमारे ग्रंथों में समाये हुए हैं, जिनसे विज्ञान को अनुसंधान के क्षेत्र में दिशानिर्देश मिल सकते हैं। आज अगर विज्ञान के साथ संस्कृत का समन्वय कर दिया जाय तो अनुसंधान के क्षेत्र में बहुत उन्नति हो सकती है। हिन्दू धर्म के प्राचीन महान ग्रंथों के अलावा बौद्ध, जैन आदि धर्मों के अनेक मूल धार्मिक ग्रंथ भी संस्कृत में ही हैं। संस्कारी जीवन की नींवः संस्कृत वर्तमान समय में भौतिक सुख-सुविधाओं का अम्बार होने के बाद भी भी मानव-समाज अवसाद, तनाव, चिंता और अनेक प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त है क्योंकि केवल भौतिक उन्नति से मानव का सर्वांगीण विकास सम्भव नहीं है, इसके लिए आध्यात्मिक उन्नति अत्यंत आवश्यक है। जिस समय संस्कृत का बोलबाला था उस समय मानव-जीवन ज्यादा संस्कारित था। यदि समाज को फिर से वैसा संस्कारित करना हो तो हमें फिर से सनातन धर्म के प्राचीन संस्कृत ग्रंथों का सहारा लेना ही पड़ेगा। हमारे प्राचीन ग्रंथों का सहारा लेना ही पड़ेगा। हमारे प्राचीन संस्कृत ग्रंथ शाश्वत मूल्यों एवं व्यावहारिक जीवन के अनमोल सूत्रों के भण्डार हैं, जिनसे लाभ लेकर वर्तमान समाज की सच्ची और वास्तविक उन्नति सम्भव है। संस्कृत के शब्द चित्ताकर्षक एवं आनन्ददायक भी हैं, जैसे सुप्रभातम्, सुस्वागतम्, 'मधुराष्टकम्' के शब्द आदि। बोलचाल में यदि संस्कृत का प्रयोग किया जाय तो हम आनंदित रहते हैं। परंतु अफसोस कि वर्तमान में पाश्चात्य अंधानुकरण से संस्कृत भाषा का प्रयोग बिल्कुल बंद सा हो गया है। संस्कृत के उत्थान के लिए हमें अपने बोलचाल में संस्कृत का प्रयोग शुरु करना होगा। बच्चों को पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ायी जानी चाहिए। और उन्हें इसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। विद्यार्थियों को वैदिक गणित का लाभ दिलायें तो वे गणित के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ सकते हैं। संस्कृत भाषा हमारे देश व संस्कृति की पहचान है, स्वाभिमान है। हमें इस भाषा को विलुप्त होने से बचाना होगा।

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पाश्चात्त्य देशोंके विद्वानों द्वारा पहचानी गई संस्कृत भाषा की महानता!

पाश्चात्त्य देशोंके विद्वानों द्वारा पहचानी गई संस्कृत भाषा की महानता! १. यूरोपीय और अरेबियन भाषाओंका संस्कृत भाषासे साधम्र्य ! - विल्यम जोन्स, ‘वेल्श’ विद्वान ‘इ.स. १७८३ में विल्यम जोन्स नामक ‘वेल्श’ (वेल्श, ‘ग्रेट ब्रिटन’का एक वंश है ।) विद्वान कोलकातामें न्यायाधीशके पदपर नियुक्त हुआ । ग्रीक, लैटीन, फ्रेंच, जर्मन, इटालियन, अरेबियन और फारसी भाषाओंसे वह पहलेसे ही अवगत था । भारतमें आते ही उसने संस्कृत भाषा सिखना आरंभ किया । संस्कृत सिखते समय उसके ध्यानमें आया कि, ‘यूरोपकी ग्रीक, लैटीन भाषाएं, मध्य एशियाकी अरेबियन, फारसी भाषाएं और भारतकी संस्कृत भाषा एक-दूसरोंसे दूर होकर भी उनमें साधर्म्य है । इन भाषाओंका मूलस्रोत एक ही भाषा है और इतिहासक्रममें इनमें धीरे-धीरे परिवर्तन आया, जिससे कि वे उसके परिवर्तित एवं सुधारित संस्करण हैं ।’ २. ग्रीक, लैटीन, फारसी इत्यादि भाषाएं जिस मूल भाषासे उत्क्रांत हुई, वह मूल भाषा है, संस्कृत! जर्मन विद्वान प्रेडरिक श्वेगेल जोन्स द्वारा कोलकाता में स्थापित ‘एशियाटिक सोसायटी’का सदस्य अलेक्झांडर हॅमिल्टन, जोन्स जैसा ही संस्कृत भाषाका प्रेमी था । पैरीसमें युद्धबंदीके रूपमें रहते समय वहां प्रेडरिक श्वेगेल नामक जर्मन विद्वानसे उसकी निकटता हुई । हॅमिल्टनने श्लेगेलको संस्कृतके पाठ पढाएं । इ.स. १८०८ में श्लेगेलने भारतीय संस्कृति और संस्कृत, ग्रीक, लैटिन, फारसी और जर्मन इन भाषाओंके अंतर्गत समान शब्द ढूंढकर ऐसा कहा कि, ‘ये सर्व भाषाएं जिस मूल भाषासे उत्क्रांत हुई, वह मूल भाषा अन्य कोई नहीं, अपितु संस्कृत ही है ।’ ३. आसामके राज्य संग्रहालयके मुख्य संचालक डॉ. एस्. अहमद के संस्कृतविषयक विचार ! आसामके राज्य संग्रहालयके मुख्य संचालक डॉ. एस्. अहमद, संस्कृतप्रेमियोंमेंसे एक थे । गुवाहाटी विद्यापिठसे अहमदने संस्कृतमें पी.एच्.डी. संपादित की है । उर्दू और संस्कृत इन भाषाओंसहित और कुछ भाषाओंका भी अहमदका प्रगाढ अध्ययन है । संस्कृतके प्रचार-प्रसारके लिए दिया जानेवाला पं. माखन प्रसाद दुआरा पुरस्कार वर्ष २००७ में अहमदको प्रदान किया गया । उनके संस्कृत विषयक विचार आगे दिए गए हैं । अ. ‘संस्कृति, तत्त्वज्ञान, गणित, चिकित्सा अथवा युद्धशास्त्र जैसे विषयोंका जितना भी अध्ययनयोग्य वाङ्मय संस्कृतमें उपलब्ध है, उतना अन्य किसी भी भाषामें नहीं है । आ. संस्कृतके अध्ययनसे बच्चोंको नैतिक और आध्यात्मिक बल प्राप्त हो सकता है । वर्तमान युवा पिढीको इस शक्तिकी नितांत आवश्यकता है । इसलिए विद्यालयीन जीवनसे ही संस्कृतका अध्ययनअनिवार्य होना चाहिए । इ. भारतका सर्व प्राचीन वाङ्मय, शिलालेख संस्कृतमें लिखे हैं, इसलिए भारतीय इतिहास समझनेके लिए भी संस्कृतका अध्ययन महत्त्वपूर्ण है । ई. संस्कृत केवल भारतियोंकी, केवल हिंदु संस्कृतिवालोंकी भाषा नहीं है । संस्कृत इंडोनेशियामें भी लोकप्रिय है । जापानमें उसके प्रति आकर्षण है और जर्मनी एवं अमेरिकामें भी उसके अभ्यासकोंकी संख्यामें वृद्धि हो रही है । संस्कृतका महत्त्व समझकर उसका लाभ लेनेवाले विदेशी! अ.२६.४.२००७ को भारतके भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ग्रीस देशमें गए थे । वहांके एक स्वागत समारंभमें ग्रीसके राष्ट्रपति कार्लोस पाम्पाडलीस इन्होंने ‘राष्ट्रपतिमहाभाग ! सुस्वागतं यवनदेशे !’, इस संस्कृत वाक्यसे अपने भाषणका प्रारंभ किया । अपने भाषणमें उन्होंने संस्कृत यह प्राचीन भारत की भाषा होकर इस भाषाका संबंध ग्रीक भाषासे भी है ऐसा बताया । आ. जुलाई २००७ में ‘अमेरिकी सिनेट’का प्रारंभ वैदिक प्रार्थनासे हुआ । पिछले २१८ वर्षोंके अमेरिकाके इतिहासमें प्रथमही यह घटना घटी । ‘ॐ शांति: शांति: शांति: ।’ ऐसी संस्कृतकी प्रार्थना बोलकर संस्कृतको ‘मृतभाषा’ कहनेवाले नेहरू-गांधी कुटूंबको अमेरीका सिनेटने तमाचा लगाया है । इ. अमेरीकाके विद्यापीठमें भी संस्कृतका अध्ययन और अध्यापन पिछले अनेक वर्षोंसे चल रहा है । वहांके केलिफोर्निया विद्यापिठमें सन् १८९७ सेही संस्कृत भाषा पढाई जा रही है । ई. २७ अगस्त २००७ से चालू होनेवाले केलिफोर्निया सिनेटका प्रारंभ संस्कृत मंत्रोच्चारसे हुआ । उसके पश्चात् न्यू जर्सी सिनेटका भी प्रारंभ संस्कृत मंत्रोच्चारसे हुआ । उ.मेरीलैंड (अमेरिका) विद्यापिठके विद्यार्थीयोंने ‘संस्कृतभारती’ इस नामसे एक गुट तैयार किया है । उस नामसे उन्होंने एक जालस्थानभी ( www.speaksanskrit.org) प्रारंभ किया है । ऊ. ११ अप्रैल २०१० इस दिन अमेरिकाकी सिनेटका प्रारंभ संस्कृत श्लोकपठनसे हुआ । संसारके सभी उदात्त विचारोंका उगम संस्कृत भाषामेंही है । संस्कृत यह अत्यंत परिपूर्ण, शास्त्रशुद्ध तथा हजारों वर्ष बितनेपरभी जैसी की वैसी जिवित रहनेवाली एकमेव भाषा है ! - पाश्चात्त्य विद्वान तथा विद्यापिठोंके अभ्यासक। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

आवश्यकता...संस्कृत सीखनेकी!

आवश्यकता...संस्कृत सीखनेकी! केंब्रिज विद्यापीठके अपने शांत कक्षमें बैठे प्राध्यापक अभ्यासमें लीन थे। तभी अचानक एक त्रस्त सैनिक आया और सीधे-सीधे उनपर आरोप लगाने लगा कि जर्मनी विरुद्ध लडने वाले उसके समान अनेक सैनिक युद्ध से निर्माण होने वाली निराशा से दु:खी हैं और आपको उसकी कोई भी जानकारी कैसे नहीं ? प्राध्यापक ने उस युवक सैनिक से शांति से पूछा, ‘किस लिए लड रहे हो तुम ?’ त्वरित उत्तर मिला, ‘देश के संरक्षणहेतु।’ प्राध्यापकने आगे पूछा- ‘स्वयं का रक्त बहाने जितना महत्वपूर्ण क्या है उसमें ?’ ‘देशकी भूमि और उसके नागरिक ।’ प्राध्यापक ने और गहराई में जाकर पूछा तब उत्तर मिला, ‘ये नहीं । मैं अपनी संस्कृति का रक्षण करने के लिए लडता हूँ।’ प्राध्यापक पहले की तरह शांति से बोले, ‘इस संस्कृति में मेरा भी योगदान है !’ सैनिक स्तब्ध हो गया । प्राध्यापक के सामने आदर से नतमस्तक हो गया और देश की संस्कृति का जतन करने हेतु प्राणों का विचार किए बिना ही लडने की शपथ ली । यह प्रसंग दूसरे महायुद्ध के अंतिम चरण में जब अंग्रजी सैनिक अंतिम यश प्राप्त हेतु अपना योगदान दे रहे थे तब का है। इससे यह पता चलता है कि पश्चिमी लोगों को भी अपनी संस्कृति का कितना अभिमान है। हम भारतीयों के मनमें भी अति प्राचीन भारत देशकी सांस्कृतिक परंपरा के लिए नितांत आदर है। हमारी संस्कृति का जतन करने हेतु संस्कृत सीखना बहुत आवश्यक है । सुप्रीम कोर्ट ने भी यह मान्य किया है कि संस्कृति की रक्षा करने हेतु संस्कृत सीखना निश्चित रूप से आवश्यक है । हमारी संस्कृति जिस तत्वज्ञानपर आधारित है वह समझने के लिए संस्कृत सीखे बिना और कोई पर्याय नहीं है । संस्कृत कमीशन रिपोर्ट के आधार पर कोर्ट ने कहा कि इस देश के नागरि कों में कितनी ही भिन्नता हो परंतु अपनी सांस्कृतिक परंपराआ के अभिमान पर सभी एक मत हैं और यही तो संस्कृत्की परंपरा है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

‘संस्कृत’की महत्ता जानिए!

‘संस्कृत’की महत्ता जानिए! ‘संस्कृतईश्वरकीही निर्माण की हुई भाषा है । यह संसारकी सर्व भाषाओंकी जननी है । संस्कृतका महत्त्व आज पश्चिमी लोगोंनेभी जाना है । पश्चिमी संगणकशास्त्रज्ञ ऐसी भाषाके शोधमें थे, जिसका संगणकीय प्रणालीमें उपयोग कर, उसका संसारकी किसीभी आठ भाषाओंमे उसी क्षण रूपांतर हो जाए । उन्हें संस्कृत’ ही ऐसी भाषा नजर आई । संस्कृत ही संसारकी सर्वोत्तम भाषा है, जो संगणकीय प्रणालीके लिए उपयुक्त है । वेद, उपनिषद, गीता आदि मूल धर्मग्रंथ संस्कृतमें हैं । कालीदास, भवभूति इत्यादि महाकवियोंकी प्रतिभा संस्कृतमें फलीफूली । संस्कृतमें चैतन्य है । संस्कृतमें लिखे हुए शब्दोंका अर्थ न समझे, तो भी उसके चैतन्य एवं सात्विकताका लाभ होता है । संस्कृतकी वाणी, मन एवं बुद्धको शुद्ध करनेवाली भाषा है । अपनी प्राचीन संस्कृत भाषाकी महत्ता जानिए ! विद्यार्थियो, हिंदु संस्कृतिकी ‘संस्कृत भाषा’ रूपीय चैतन्यमय विरासत टिकाए रखनेके लिए संस्कृत सीखिए, उसी प्रकार पाठशालाओंमें ‘संस्कृत’ विषय सिखानेका आग्रह कीजिए !’ संस्कृत का उद्भव हमारी वैदिक परंपरा ने स्वयं में विश्व संरचना से लेकर साद्यंत(संपूर्ण) इतिहास जतन कर रखा है । पहले सर्वत्र शून्य था; तत्पश्चात् आकाश में ‘ॐ’ ध्वनि का निनाद हुआ एवं शेषशायी श्रीविष्णु प्रकट हुए । उनकी नाभि से ब्रह्मदेव प्रकट हुए; तदुपरांत प्रजापति, मातृका, धन्वंतरी, गंधर्व, विश्वकर्मा इत्यादि प्रकट हुए । उसी समय ईश्वरने ऐसे वेद उपलब्ध किए जिसमें समस्त विश्व का ज्ञान भंडार समाया हुआ है । वेद संस्कृत भाषा में है । संस्कृत ‘देववाणी’ है । जिस प्रकार वेद अपौरुषेय यानी ईश्वरप्रणीत है, उसी प्रकार संस्कृत भाषा भी ईश्वर की रचना है । उसकी रचना और लिपि ईश्वर द्वारा रचित है, अत: उस लिपि को भी ‘देवनागरी’ कहते है । संस्कृत भाषा के सारे संबोधन भी देवभाषा में हैं ऐसा स्पष्ट है, उदा. ‘गीर्वाणभारती’ उसमें का ‘गीर्वाण’ शब्द का अर्थ है ‘देव’। इस सृष्टि की संरचना ईश्वरीय संकल्प से हुई है । मनुष्य की रचना के पश्चात् मनुष्य को आवश्यकतानुसार सब कुछ उस ईश्वरने ही दिया । इतना ही नहीं, मानव को कालानुसार आगे जिस वस्तु की भी आवश्यकता होगी वह देने की व्यवस्था भी उस परम पिता परमेश्वर ने की है । सृष्टि की संरचना से पूर्व ही ईश्वर ने मनुष्य को मोक्ष प्राप्ति के लिए उपयोगी तथा चैतन्य से ओतप्रोत (भरी हुई) ऐसी एक भाषा तैयार की... जिसका नाम है ‘संस्कृत’! आद्यमानव मनु तथा शतरूपा को ब्रह्मदेव ने संस्कृत सिखाई। ब्रह्मदेव ने अपने मानसपुत्र अत्री, वसिष्ठ, गौतमादि ऋषियोंको भी वेद एवं संस्कृत भाषा सिखाई। त्रेतायुग में जीव की शब्दातीत ज्ञान ग्रहण करने की क्षमता क्षीण हो गई ; शब्दों के माध्यम से जीव को ज्ञान प्राप्त होकर मोक्ष प्राप्ति सुलभता से हो, इसके लिए दत्तगुरु ने संस्कृत भाषा की पुनर्रचना की। सत्य, त्रेता और द्वापर इन तीनों युगोंमें संस्कृत ही विश्वभाषा थी। इसीलिए इस भाषा को ‘विश्ववाणी’ भी कहते हैं। कौरव - पांडवों के समय तक संस्कृत ही विश्व की एकमेव भाषा थी! ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

रविवार, 29 नवंबर 2015

चीन संस्कृत सिखा रहा है अपने बच्चों को॥ Sanskrit summer camp attracts China's intellectuals.

Buddhist chants were performed at the opening ceremony of the Sanskrit
summer camp. (Photo by Xiang Xiang)
HANGZHOU, Aug. 18 (Xinhua) -- A group of 60 Chinese intellectuals have
enrolled at the Hangzhou Buddhism Institute for a free summer camp to
study Sanskrit, an ancient Indian language.
The trainees were selected from more than 300 candidates and cover a
broad sphere of professions, including yoga instructors, mechanical
designers, performers, hotel management and environmental protection
personnel.
Their study over the next six days will focus on reading and writing Sanskrit.
The language has very complicated grammar. For the present tense
alone, the inflection of one verb can have 72 alterations, according
Li Wei, an instructor who holds a doctorate in Indology from the
University of Mainz, Germany.
Many of the trainees have been required to work overtime beforehand to
get the six days off, some used their annual vacation while others
working night-shifts to save the day for study.
Trainee He Min, who graduated with an economics degree from Renmin
University of China in Beijing and now works as a yoga practitioner in
Hangzhou, says the chance was "too precious" to pass up.
"Sanskrit is a common language used by yoga practitioners across the
world. Though many yoga textbooks are written in English, the postures
we practice remain named in Sanskrit and the chants are also in
Sanskrit," said the 39-year-old who practices yoga two or three hours
a day.
Teaching herself Sanskrit for almost three years, she said she was
"still a rookie" due to the lack of professional instruction.
Another trainee Pan Long, a PHD in mechanical design and automation
with Zhejiang University, joined the summer camp hoping to better
understand Buddhist scriptures written in Sanskrit.
"In my spare time, I often read classical literature and Buddhist
works such as the Heart Sutra and the Diamond Sutra, but do not
understand them well. This summer camp gives me a chance to live a
different life and provides a getaway from everyday stress," the
27-year-old said.
Before the trainees arrived, volunteers from an ongoing Sanskrit class
organized by the institute designed a T-shirt and a flag decorated
with Sanskrit for participants.
Trainees wearing special T-shirtdecorated with Sanskritwhile watching
tea ceremony. (Photo by Xiang Xiang)
Since March, more than 100 students have regularly attended the
two-hour class held twice a week at the Institute. The lecture is also
free, but currently in recess due to summer break.
To help the 60 trainees learn as much as possible, Li Wei said a dozen
students from the regular class volunteered to be teaching assistants.
They will help teach pronunciation and handwriting.
"Although the summer camp is only week-long, I hope all participants
grasp basic reading and writing, while those who aspire to learn
further can also get the assistance they need," said Li.
Trainee Zhang Can, 25, said she was inspired after the first day on
Monday. She said the instructor clearly outlined the differences
between Mandarin and Sanskrit, making study much easier.
"My goal for the summer camp is to speak and write correctly and use
Sanskrit dictionaries properly. Therefore, in the future I can try
teaching myself and consult with the instructor when necessary," she
said.
Chinese schools began Sanskrit classes in the late 1940s. But the
discipline has developed slowly due to the lack of proper textbooks
and a teacher shortage.
Gang Xiao, deputy chief of the Hangzhou Buddhism Institute, said the
purpose of holding the free summer camp was to meet growing public
interests in Sanskrit and facilitate the disciplinary development of
the language.
A flag decorated with Sanskrit was shown at the opening ceremony.
(Photo by Xiang Xiang)
"Through public education and future international academic exchanges,
we are hoping to turn Hangzhou into a center of Sanskrit study and
exchanges," he said.
Having studied Sanskrit and Indology for 14 years in Germany, Li Wei
said despite its slow academic progresses in Sanskrit, China has a
rich history in Sanskrit study.
"The earliest Sanskrit study in China began at temples, with clergy of
different generations spending more than 1,000 years translating
Sanskrit Buddhist scripture," said he.
Amid all the alien words in modern Chinese, Sanskrit ranks the second
biggest source only next to English. The amount of words from Sanskrit
is twice as much as that from French, he added.
"The influence of Sanskrit upon the Chinese culture is so subtle that
few people realize it,"said Li.
Zu Guang, a master with the Hangzhou Buddhism Institute and a
doctorate in philosophy from the the Sri Lanka International Buddhist
Academy, regarded the growing interest among Chinese intellectuals in
Sanskrit "a good phenomenon".
"Quite a number of people used to think making more money as the way
to live a better life. Now, they would rather devote their spare time
to the study of an ancient language as well as ancient culture, that
is exhilarating," she said.

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SEE FULL REPORT :-

http://news.xinhuanet.com/english/2015-08/19/c_134534376.htm
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चीन में बढने लगी संस्कृत भाषा की लोकप्रियता...

योग की लोकप्रियता से बढी संस्कृत सीखने की चाहत !
बीजिंग :वामपंथी शासनवाले मुल्क चीन की नई पीढी में भारत की प्राचीन भाषा
संस्कृत की लोकप्रियता बढ रही है। बीजिंग के बौद्ध संस्थान के
ग्रीष्मकालीन शिविर (समर कैंप) में ६० लोगोंने संस्कृत पढऩे के लिए
नामांकन कराया है। विद्वान, योगाचार्य के साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में
कार्यरत पेशेवर लोग धर्म और योग को बेहतर ढंग से समझने के लिए संस्कृत
भाषा सीखना चाहते हैं।
ग्रीष्मकालीन शिविर के लिए ३०० लोगोंके समूह से इन प्रशिक्षुओंको चुना
गया है। इन में योगाचार्य, मैकेनिकल डिजाइनर, कार्यक्रम प्रस्तोता
(परफॉर्मर), होटल प्रबंधन और पर्यावरण संरक्षक के क्षेत्र में कार्यरत
लोग शामिल हैं। ये लोग पूर्वी चीन के हांगजोऊ बौद्ध संस्थान में छह दिन
तक संस्कृत का अध्ययन करेंगे। इस दौरान पढऩे और लिखने पर खास ध्यान दिया
जाएगा।
जर्मनी के माइंज विवि से इंडोलॉजी में डॉक्टरेट करने वाले ली वी
प्रशिक्षुओंको संस्कृत भाषा पढाएंगे। ली के मुताबिक, संस्कृत की व्याकरण
बड़ी जटिल है। वर्तमान काल के लिए ही एक क्रिया का ७२ तरीके से प्रयोग
होता है।
ऐसे चीन पहुंची संस्कृत
छठी शताब्दी में प्रख्यात बौद्ध भिक्षु जुआन जांग ने भारत की यात्रा की
थी और वे १७ बरस तक भारत में रहे। उन्ही के जरिये संस्कृत भाषा चीन
पहुंची। इस के बाद कई और भिक्षुओंने भारत की यात्रा की और प्राचीन भारतीय
चिकित्सा पद्धति का ज्ञान अर्जित किया।
पीकिंग विवि में संस्कृत विभाग
चीन की पीकिंग यूनिवर्सिटी में संस्कृत के लिए एक अलग विभाग है जिस में
६० से ज्यादा लोग संस्कृत का अध्ययन करते हैं। प्रख्यात इंडोलॉजिस्ट जी
जियालिन को संस्कृत को बढावा देने के लिए पद्मश्री से भी नवाजा जा चुका
है।
योग की लोकप्रियता से बढी संस्कृत सीखने की चाहत
संयुक्त राष्ट्रसंघद्वारा २१ जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित करने
के बाद से चीन के लोगों में संस्कृत सीखने की इच्छा बढी है।
ओवर टाइम कर रहे
हांगजोऊ की कक्षा में ६ दिन संस्कृत पढऩे के लिए कई लोगोंने अवकाश लिया
है। कुछ ने सालाना मिलने वाली छुट्टियोंका इस काम के लिए उपयोग किया है।
इतना ही नहीं कई लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने अपने-अपने कार्यस्थल पर
ओवरटाइम किया है। कुछ ने दिन में होने वाली इस कक्षा में पढऩे के लिए
रात्रि पाली (नाइट शिफ्ट) में काम करना शुरू कर दिया है।
योग में कुशलता के लिए संस्कृत का ज्ञान जरूरी
अर्थशास्त्र में स्नातक और फिलहाल हांगजोऊ में योग प्रशिक्षक के रूप में
कार्यरत ३९ वर्षीय ही मिन का कहना है कि संस्कृत सीखने के लिए यह सुनहरा
मौका है। सारी दुनिया में योग करने वाले संस्कृत भाषा के जरिये ही
एक-दूसरे से संपर्क में रहते हैं, हालांकि कई योग पुस्तकें अंग्रेजी में
लिखी गई हैं लेकिन योग मुद्राओंके नाम और उच्चारण संस्कृत में ही है।
अध्यापकोंकी कमी
तीन साल से संस्कृत पढ रही एक महिला ने बताया चूंकि इस भाषा को सिखाने के
लिए कोई पेशेवर प्रशिक्षक नहीं है इस लिए मुझे संस्कृत अब भी कठिन लग रही
है। उल्लेखनीय है कि चीन के स्कूलोंने ४० के दशक के अंत में संस्कृत
पढाना शुरू किया था लेकिन शिक्षकों और समुचित पाठ्य पुस्तकोंके अभाव में
पठन-पाठन का माहौल धीरे-धीरे विकसित हो सका।

संस्कृत सीखने से तुतलाने या हकलाने की बिमारी ठीक हो जाती है।


संस्कृत भारती के राष्ट्रीय महामंत्री डाँ पी नंदकुमार।

"संस्कृत भाषा" के आश्चर्यजनक तथ्य ...

"संस्कृत भाषा" के आश्चर्यजनक तथ्य ...

१. कंप्यूटर में प्रयोग के लिए सबसे अच्छी भाषा।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका १९८७

२. सबसे अच्छे प्रकार का भारत का पंचांग जो प्रयोग किया जा रहा है
(जिसमें नया वर्ष सौर प्रणाली के भूवैज्ञानिक परिवर्तन के साथ आरंभ होता
है)।
संदर्भ: जर्मन स्टेट यूनिवर्सिटी

३. दवा के लिए सबसे उपयोगी भाषा अर्थात संस्कृत में बात करने से व्यक्ति
स्वस्थ और बीपी, मधुमेह, कोलेस्ट्रॉल आदि जैसे रोग से मुक्त हो जाएगा।
संस्कृत में बात करने से मानव शरीर का तंत्रिका तंत्र सक्रिय रहता है
जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश(Positive Charges) के साथ
सक्रिय हो जाता है।
संदर्भ: अमेरीकन हिन्दू यूनिवर्सिटी (शोध के बाद)

४. संस्कृत वह भाषा है जो अपनी पुस्तकों वेद, उपनिषदों, श्रुति, स्मृति,
पुराणों, महाभारत, रामायण आदि में सबसे उन्नत प्रौद्योगिकी रखती है।
संदर्भ: रशियन स्टेट यूनिवर्सिटी, नासा आदि
(नासा के पास ६०,००० ताड़ के पत्ते की पांडुलिपियों है जो वे अध्ययन का
उपयोग कर रहे हैं) (रूसी, जर्मन, जापानी, अमेरिकी सक्रिय रूप से हमारी
पवित्र पुस्तकों से नई चीजों पर शोध कर रहे हैं और उन्हें वापस दुनिया के
सामने अपने नाम से रख रहे हैं।) दुनिया के १७ देशों में एक या अधिक
संस्कृत विश्वविद्यालय संस्कृत के बारे में अध्ययन और नई प्रौद्योगिकी
प्राप्त करने के लिए है, लेकिन संस्कृत को समर्पित उसके वास्तविक अध्ययन
के लिए एक भी संस्कृत विश्वविद्यालय भारत में नहीं है।

५. दुनिया की सभी भाषाओं की माँ संस्कृत है। सभी भाषाएँ (९७ प्रतिसत
प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इस भाषा से प्रभावित है।)
संदर्भ: यूएनओ

६. नासा वैज्ञानिक द्वारा एक रिपोर्ट है कि अमेरिका ६ और ७ वीं पीढ़ी के
सुपर कंप्यूटर संस्कृत भाषा पर आधारित बना रहा है जिससे सुपर कंप्यूटर
अपनी अधिकतम सीमा तक उपयोग किया जा सके।
परियोजना की समय सीमा २०२५ (६ पीढ़ी के लिए) और २०३४ (७ वीं पीढ़ी के
लिए) है, इसके बाद दुनिया भर में संस्कृत सीखने के लिए एक भाषा क्रांति
होगी।

७. दुनिया में अनुवाद के उद्देश्य के लिए उपलब्ध सबसे अच्छी भाषा संस्कृत है।
संदर्भ: फोर्ब्स पत्रिका १९८५

८. संस्कृत भाषा वर्तमान में "उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी" तकनीक में
इस्तेमाल की जा रही है। (वर्तमान में, उन्नत किर्लियन फोटोग्राफी तकनीक
सिर्फ रूस और संयुक्त राज्य अमेरिका में ही मौजूद हैं। भारत के पास आज
"सरल किर्लियन फोटोग्राफी" भी नहीं है )

९. अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया
वर्तमान में भरतनाट्यम और नटराज के महत्व के बारे में शोध कर रहे हैं।
(नटराज शिव जी का कॉस्मिक नृत्य है। जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय
के सामने शिव या नटराज की एक मूर्ति है )

१०. ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर
शोध कर रहा है।

और भारत मेँ बेबकूफ लोग SPOKEN ENGLISH सीख रहे।
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नासा ने माना, अंतरिक्ष में केवल संस्कृत की ही चलती है!

नई दिल्ली : आजकल हर तरफ अंग्रेजी का बोलबाला है। विज्ञान से लेकर
कार्यालयी भाषा के रूप में अपनी जगह बना चुकी अंग्रेजी अब समय की जरूरत
बन चुकी है। लेकिन अगर हम कहें कि इस जरूरत की भी अपनी कुछ कमजोरियां
हैं। जिनका निदान केवल संस्कृत के पास है, तो निश्चित तौर पर आप पूछेंगे
कैसे? वह ऐसे कि देवताओं की भाषा संस्कृत अंतरिक्ष में कोई भी मैसेज
भेजने के लिए सबसे उपयोगी भाषा के रूप में सामने आई है।
नासा के वैज्ञानिकों की मानें तो जब वह स्पेस ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते
थे तो उनके वाक्य उलटे हो जाते थे। इस वजह से मेसेज का अर्थ ही बदल जाता
था। उन्होंने दुनिया के कई भाषा में प्रयोग किया लेकिन हर बार यही समस्या
आई। आखिर में उन्होंने संस्कृत में मेसेज भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य
उलटे हो जाने पर भी अपना अर्थ नहीं बदलते हैं। यह रोचक जानकारी हाल ही
में एक समारोह में दिल्ली सरकार के प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान के निदेशक
डॉ. जीतराम भट्ट ने दी।
दिल्ली सरकार की संस्कृत अकादमी ने दिल्ली के करोलबाग, मयूर विहार और
गौतम नगर में लोगों को संस्कृत सिखाने के उद्देश्य से तीन शिक्षालयों के
उद्धाटन के अवसर पर यह समारोह आयोजित किया। समारोह की अध्यक्षता करते हुए
स्वामी प्रणवानन्द महाराज ने कहा कि संस्कृत में सभी प्रकार के उपयोगी
विषय हैं, जरूरत उनके प्रसार की है। समारोह में अनेक डॉक्टर, इंजीनियर,
अधिकारी और व्यवसायी भी उपस्थित थे। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

संस्कृत भाषा की उपयोगिता।

संस्कृत भाषा की उपयोगिता। संस्कृत का अध्ययन मनुष्य को सूक्ष्म विचारशक्ति प्रदान करता है । मन स्वाभाविक ही अंतर्मुख होने लगता है । इसका अध्ययन मौलिक चिंतन को जन्म देता है । संस्कृत भाषा के पहले की कोई अन्य भाषा, संस्कृत वर्णमाला के पहले की कोई अन्य वर्णमाला देखने-सुनने में नहीं आती । इसका व्याकरण भी अद्भुत है । ऐसा सर्वांगपूर्ण व्याकरण जगत की किसी भी अन्य भाषा में देखने में नहीं आता । यह संसार भर की भाषाओं में प्राचीनतम और समृद्धतम है। ‘संस्कृत-ज्ञान के बिना हिन्दू तो असंस्कृत ही हैं । स्वामी विवेकानंदजी के शब्द हैं : ‘संस्कृत शब्दों की ध्वनिमात्र से इस जाति को शक्ति, बल और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है । संस्कृत-ज्ञान से प्रभावित विलियम थियॉडोर का कहना है कि ‘भारत तथा संसार का उद्धार और सुरक्षा संस्कृत-ज्ञान के द्वारा ही संभव है । संस्कृत का अखंड प्रवाह पाली, प्राकृत व अपभ्रंश भाषाओं से होता हुआ आज तक समस्त भारतीय भाषाओं में बह रहा है । चाहे तमिल, कन्नड या बँगला हो, मलयालम, उडिया, तेलगू, मराठी या पंजाबी हो - सभी भारतीय भाषाओं के लिए संस्कृत ही अन्तःप्रेरणा-स्रोत है । आज भी इन भाषाओं का पोषण और संवर्धन संस्कृत द्वारा ही होता है । संस्कृत की सहायता से कोई भी उत्तर भारतीय व्यक्ति तेलगू, कन्नड, उडिया, मलयालम आदि दक्षिण एवं पूर्व भारतीय भाषाओं को सरलतापूर्वक सीख सकता है । भारतीय संस्कृति की सुरक्षा, चरित्रवान नागरिकों के निर्माण, सद्भावनाओं के प्रसार, प्राचीन ज्ञान-विज्ञान की प्राप्ति, मौलिक चिंतन की प्रेरणा एवं विश्वशांति हेतु संस्कृत का अध्ययन-अध्यापन अवश्य होना चाहिए । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

व्याकरण की संधि का ज्ञान न होने पर इस राजा की तरह बार बार अपमानित होना पडता है।

व्याकरण की संधि का ज्ञान न होने पर इस राजा की तरह बार बार अपमानित होना पडता है।

एक बार एक राजा और उसकी रानी दोनों एक जलाशय में स्नान के लिए गए थे ।
तब जलक्रीडा करते समय राजा अपनी रानी पर जल उडा ने लगा । तभी रानी ने
कहा, ''मोदकै: ताडय त् ' यह सुन कर उस राजा ने कहा, ''मोदकै: ताडय? अरे,
कोई है ?' राजा की पुकार सुनकर सर्व सेवक तुरंत दौडे चले आए। राजा ने
आज्ञा दी, ''शीघ्रातिशीघ्र मोदक से भरी थालियां लेकर आओ।' मोदक से भरी
थालियाँ लाई गई, तब राजा ने रानी पर एक-एक मोदक मारना प्रारम्भ किया । यह
देखकर रानी ने माथा पीटा। अब कैसे समझाए इस राजा को? उसने कहा, ''स्वामी,
'मोदकै: ताडय' अर्थात 'मा उदकै: ताडय त्' उदक का अर्थ होता है जल ! उदक
से अर्थात जल से मुझे प्रताडित न करें जल से मुझे न मारिए । यह अर्थ
इसमें समाविष्ट है। राजा को व्याकरण की संधि का ज्ञान नहीं था । 'मोदकै:'
शब्द सुनते ही बोल पडा, मोदक लाओ !
जब तक वास्तविक स्वरूप का बोध नहीं होता, तब तक हमारी स्थिति इस राजा
समान ही होती है । इसलिए सदैव पहले योग्य अर्थ समझ लेना चाहिए। अन्यथा हम
भी इस राजा समान उपहास के पात्र बनेंगे।

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शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

"ज्ञान और बुद्धि के देवता श्री गणेश भगवान को कोटि कोटि प्रणाम।"

॥ॐ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ॐ॥
॥ॐ॥ ॐ गं गणपतये नमः ॥ॐ॥
॥ॐ॥ ॐ श्री सरस्वत्यै नमः ॥ॐ॥
॥ॐ॥ ॐ श्री गुरुवे नमः ॥ॐ॥

संस्कृत सीखेँ।
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॥ॐ॥ जय श्री कृष्ण॥ॐ॥