शनिवार, 26 दिसंबर 2015

संस्कृत भाषा व व्याकरण - सीखें और सिखायें।

संस्कृत भाषा व व्याकरण - सीखें और सिखायें।
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संस्कृत भाषा जितनी ही पुरातन है, उतनी ही वह अपने को चिर नवीन भी बनाती
आई है। विशाल वैदिक वांग्मय संस्कृत काव्य की अमूल्य निधि् है। कालिदास,
भवभूति, माघ, भास, बाणभट्ट , भर्तृहरि जैसे महान् रचनाकारों की कृतियाँ
संस्कृत की उदात्तता का परिचय देती हैं। इनके अलावा बहुत ऐसे अज्ञात कवि
हुए हैं जिन्होंने सामान्य जन की छोटी-छोटी इच्छाओं, सपनों एवं कठिनाइयों
को भी स्वर दिया है। संस्कृत के आधुनिक लेखन में यह लोकधारा और मुखर हुई
है। यही नहीं संस्कृत वर्तमान जीवन और हमारे संसार को समझने पहचानने के
लिये भी एक अच्छा माध्यम बनने की क्षमता रखती है।
आधुनिक भाषा-विज्ञान की दृष्टि से संस्कृत हिन्द-यूरोपीय भाषा-परिवारकी
हिन्द- ईरानी शाखाकी हिन्द-आर्य उपशाखामें शामिल है, । अनेक लिपियों में
लिखी जाती है, जिनकी प्राचीन लिपियों में 'सरस्वती ( सिन्धु ) ' और '
ब्राह्मी लिपि' एवं आधुनिक लिपियों में 'देवनागरी' प्रमुख है।
किसी भी भाषा के अंग प्रत्यंग का विश्लेषण तथा विवेचनव्याकरण(ग्रामर)
कहलाता है। व्याकरण वह विद्या है जिसके द्वारा किसी भाषा का शुद्ध बोलना,
शुद्ध पढ़ना और शुद्ध लिखना आता है। किसी भी भाषा के लिखने, पढ़ने और
बोलने के निश्चित नियम होते हैं। भाषा की शुद्धता व सुंदरता को बनाए रखने
के लिए इन नियमों का पालन करना आवश्यक होता है। ये नियम भी व्याकरण के
अंतर्गत आते हैं। व्याकरण भाषा के अध्ययन का महत्त्वपूर्ण हिस्सा है।
व्याकरण का दूसरा नाम "शब्दानुशासन" भी है। वह शब्दसंबंधी अनुशासन करता
है - बतलाता है कि किसी शब्द का किस तरह प्रयोग करना चाहिए। भाषा में
शब्दों की प्रवृत्ति अपनी ही रहती है; व्याकरण के कहने से भाषा में शब्द
नहीं चलते। परंतु भाषा की प्रवृत्ति के अनुसार व्याकरण शब्दप्रयोग का
निर्देश करता है। यह भाषा पर शासन नहीं करता, उसकी स्थितिप्रवृत्ति के
अनुसार लोकशिक्षण करता है। व्याकरण का महत्व यह श्लोक भली-भाँति
प्रतिपादित करता है :
यद्यपि बहु नाधीषे तथापि पठ पुत्र व्याकरणम्।
स्वजनो श्वजनो माऽभूत्सकलं शकलं सकृत्शकृत्॥
अर्थ : " पुत्र! यदि तुम बहुत विद्वान नहीं बन पाते हो तो भी व्याकरण
(अवश्य) पढ़ो ताकि 'स्वजन' 'श्वजन' (कुत्ता) न बने और 'सकल' (सम्पूर्ण)
'शकल' (टूटा हुआ) न बने तथा 'सकृत्' (किसी समय) 'शकृत्' (गोबर का घूरा) न
बन जाय। "
महाभाष्यकार " पतंजलि " ने ऋग्वेद की इस ऋचा से व्याकरण ( संस्कृत ) का
स्वरूप बतलाया है :
चत्वारि श्रृंगात्रयो अस्य पादा द्वेशीर्षे सप्तहस्तासोऽस्य।
त्रिधावद्धो वृषभोरोरवीति महोदेवोमित्र्यां आविवेश॥ ( ऋग.४.५८.३ )
यद्यपि वैदिकी टीकाओं में इसकी व्याख्या भिन्न है किन्तु देखिये कितनी
सुन्दरता से उन्होंने इसका व्याकरण के सन्दर्भ में भावार्थ किया है , वो
इसकी व्याख्या करते हुए कहते हैं कि : " मनुष्य में एक वृषभ है , जो
दिव्य गुणों से युक्त महान देव है। इसके चार सींग ( नाम, आख्यात, उपसर्ग
और निपात ), तीन पैर ( भूत, भविष्यत और वर्तमान काल ), दो सिर ( नित्य और
अनित्य शब्द ), सात हाथ ( सात विभक्तियाँ ), यह तीन स्थानों ( वक्ष, कंठ
और मष्तिष्क ) पर बंधा हुआ बार-बार शब्द करता है। इस शब्द के देवता के
साथ सायुज्य स्थापित करने के लिये हमें व्याकरण पढ़ना चाहिये ।"
आपके मित्र अमित ने संस्कृत-व्याकरण की एक पुस्तकमाला संकलित की है। इसकी
सहायता से आप सुगमता पूर्वक हिन्दी से संस्कृत-व्याकरण का अध्ययन कर सकते
हैं।

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(१) संस्कृत व्याकरणम:यह पुस्तकपं.रामचन्द्र झा 'व्याकरणाचार्य'कृत है ,
इसके प्रकाशकचौखम्बा प्रकाशन, वाराणसीहैं। इसका आकार १५.९ मे.बा है ।
हिन्दी से संस्कृत सीखने की शुरुआत करने वालों के लिये यह उत्तम ग्रन्थ
है। https://ia801705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/SanskritVyakaranam.pdf
(२) संस्कृत व्याकरण प्रवेशिका:यह पुस्तकश्री बाबूराम सक्सेनाद्वारा
लिखित है। इसका आकार २१.६ मे.बा. है । उन जिज्ञासुओं के लिए एक अच्छी
पुस्तक है जो पहले-पहल संस्कृत व्याकरण सीखना चाहते हैं।
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/sanskrit_vyakaran_praveshika.pdf
(३) प्रौढ़ रचनानुवाद कौमुदी: डॉ.कपिलदेव द्विवेदी आचार्यलिखित इस पुस्तक
के प्रकाशक हैं विश्वविद्यालय प्रकाशन, गोरखपुर, उपरोक्त दोनों ग्रन्थों
का अध्ययन करते समय यह पुस्तक विशेष रूप से प्रभावी है । इसका आकार ४४.३
मे.बा. है। https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/PraudhaRachananuvadKaumudi.pdf
(४) लघु सिद्धांत कौमुदी :यह संस्कृत-व्याकरण का सारभूत ग्रंथ है। इसके
रचनाकार श्री वरदराज जी हैं। कहते हैं कि लघु सिद्धांत कौमुदी संस्कृत
व्याकरण का वह ग्रंथ है जिसका अध्ययन किए बिना संस्कृत का पूर्ण ज्ञान
प्राप्त नहीं होता और पढ़ लेने पर संस्कृत व्याकरण की योग्यता में संदेह
नहीं रहता। यह ग्रन्थ मूलत: संस्कृत में ही है जिसकी संस्कृत व हिन्दी
में अनेक व्याख्याकारों द्वारा विभिन्न व्याख्यायें प्रस्तुत की गईं हैं।
हिन्दी में इस ग्रन्थ की सम्भवत: सबसे विशद व्याख्या श्री भीमसेन
शास्त्री द्वारा प्रस्तुत है जो भैमी व्याख्या के नाम से प्रसिद्ध है। यह
छ: खंडों में उपलब्ध है। भैमी प्रकाशन , दिल्लीद्वारा प्रकाशित है। इसके
सभी खंडों का वर्णन निम्नानुसार है :
४.१ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - १:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/laghu-siddhanta-kaumudi-bhaimi-vyakhya-i-bhim-sena-shastri.pdf
आकार- ३४.३मे.बा.
४.२ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - २:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-Bhaimi-Vyakhya-Avyaya-Prakaran.pdf
आकार- ६.५मे.बा.
४.३ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ३:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-III-Bhaimi-Vyakhya-Kridanta.pdf
आकार- २०.९मे.बा.
४.४ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ४:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-IV-Bhaimi-Vyakhya-Samas.pdf
आकार- २३.८मे.बा.
४.५ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ५:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-V-Taddhita-Bhim-Sena-Shastri.pdf
आकार- १५.०मे.बा.
४.६ - लघु सिद्धांत कौमुदी भाग - ६:
https://ia601705.us.archive.org/2/items/Vyakarana/Laghu-Siddhanta-Kaumudi-Bhaimi-Vyakhya-Stri-Pratyaya-Prakarana-Part-6.pdf
आकार- १६.६मे.बा.
संस्कृत व्याकरण के जिज्ञासुओं को लघु सिद्धांत कौमुदी का अध्ययन अवश्य
ही करना चाहिए। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

सोमवार, 21 दिसंबर 2015

संस्कृत को केवल धर्म-कर्म की भाषा नहीं समझना चाहिए-यह लौकिक प्रयोजनों की भी भाषा है।

संस्कृत को केवल धर्म-कर्म की भाषा नहीं समझना चाहिए-यह लौकिक प्रयोजनों की भी भाषा है। संस्कृत में अद्भुत कविताएं लिखी गई हैं, चिकित्सा, गणित, ज्योतिर्विज्ञान, व्याकरण, दर्शन आदि की महत्वपूर्ण पुस्तकें उपलब्ध हैं। केवल आध्यात्मिक चिंतन ही नहीं है, बल्कि दाशर्निक ग्रंथ भी उपलब्ध हैं। किन्तु रामायण और श्रीमदभगवद्गीता की भाषा को आज भारत में केवल हँसी मजाक की भाषा बनाकर रख दिया गया है। भारतीय फिल्मे हों या टी.वी. प्रोग्राम उनमेँ जोकरों को संस्कृत के ऐसे ऐसे शब्द बनाकर लोगों को हँसाने की कोशिश की जाती है जो संस्कृत के होते ही नहीं हैं। और हमारी नई पीढी जिसे संस्कृत से लगातार दूर किया जा रहा है। वो संस्कृत की महिमा को जाने बिना ही उन कॉमेडी सीनों पर दाँत दिखाती है। अमेरिका, रूस, स्वीडन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, जापान और ऑस्ट्रिया जैसे देशों में नर्सरी से ही बच्चों को संस्कृत पढ़ाई जाने लगी है, कहीं एसा न हो की हमारी संस्कृत कल वैश्विक भाषा बन जाये और हमारे नवयुवक संस्कृत को केवल भोंडे और भद्दे मसखरों के भाषा समझते रहें। अपने इस लेख से मैँ भारत के यूवाओं को आह्वान करता हूँ की आने वाले समय में संस्कृत कम्पुटर की भाषा बन्ने जा रही है ,सन २०२५ तक नासा ने संस्कृत में कार्य करने का लक्ष्य रखा है। अतः अंग्रेजी भाषा के साथ साथ वे अपने बच्चों को संस्कृत का ज्ञान जरूर दिलाऐँ और संस्कृत भाषा को भारत में उपहास का कारन न बनाये क्यों की संस्कृत हमारी देव भाषा है। संस्कृत का उपहास करके हम अपनी जननी का उपहास कर रहे है। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

विदेशियों को संस्कृत के महत्व का पता चला।

                         वैज्ञानिक पहलू जानकर अमेरिका नासा की भाषा बनाने की कसरत में जुटा हुआ है । इस प्रोजेक्ट पर भारतीय संस्कृत विद्वानों के इन्कार के बाद अमेरिका अपनी नई पीढ़ी को इस भाषा में पारंगत करने में जुट गया है। गत दिनों आगरा दौरे पर आए अरविंद फाउंडेशन [इंडियन कल्चर] पांडिचेरी के निदेशक संपदानंद मिश्रा ने जागरणसे बातचीत में यह रहस्योद्घाटन किया कि नासा के वैज्ञानिक रिक ब्रिग्स ने १९८५ में भारत से संस्कृत के एक हजार प्रकांड विद्वानों को बुलाया था। उन्हें नासा में नौकरी का प्रस्ताव दिया था। उन्होंने बताया कि संस्कृत ऐसी प्राकृतिक भाषा है, जिसमें सूत्र के रूप में कंप्यूटर के जरिए कोई भी संदेश कम से कम शब्दों में भेजा जा सकता है। विदेशी उपयोग में अपनी भाषा की सहायता देने से उन विद्वानों ने मना कर दिया था। इसके बाद कई अन्य वैज्ञानिक पहलू समझते हुए अमेरिका ने वहाँ छोटे बच्चों को संस्कृत की शिक्षा शुरू कर दी है। नासा के मिशन संस्कृतकी पुष्टि उसकी वेबसाइट भी करती है। उसमें स्पष्ट लिखा है कि २० वर्षोँ से नासा संस्कृत पर काफी पैसा और मेहनत कर चुकी है। साथ ही इसके कंप्यूटर प्रयोग के लिए सर्वश्रेष्ठ भाषा का भी उल्लेख है। ब्रिटेन वर्तमान में हमारे श्री चक्र पर आधारित एक रक्षा प्रणाली पर शोध कर रहा है। लेकिन यहाँ यह बात अवश्य सोचने की है, की आज जहाँ पूरे विश्व में संस्कृत पर शोध चल रहे हैं। वहीँ हमारे देश के लुच्चे नेता संस्कृत को मृत भाषा बताने में बाज नहीं आ रहे हैं अभी ३ वर्ष पहले हमारा एक केन्द्रीय मंत्री बी. एच .यू . में गया था तब उसने वहाँ पर संस्कृत को मृत भाषा बताया था। यह बात कहकर वह अपनी माँ को गाली दे गया, और ये वही लोग हैं जो भारत की संस्कृति को समाप्त करने के लिए यहाँ की जनता पर अंग्रेजी और उर्दू को जबरदस्ती थोप रहे हैं। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

"श्रीमदभगवद्गीता जयंती" की हार्दिक शुभकामनाएँ।(संस्कृत-हिन्दी मेँ श्रीमदभगवद्गीता देवनागरी लिपि मेँ डाउनलोड करेँ।)

"श्रीमदभगवद्गीता जयंती" की हार्दिक शुभकामनाएँ। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ
"श्रीमदभगवद्गीता" पढने के लिए यहाँ देखेँ HTML
http://www.hariomgroup.org/hariombooks_satsang_hindi/ShrimadBhagwadGeeta.htm
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PDF : http://www.hariomgroup.org/hariombooks_satsang_hindi/ShrimadBhagwadGeeta.pdf
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गुरुवार, 10 दिसंबर 2015

संस्कृत भाषा क्यों सीखनी चाहिए ?

संस्कृत भाषा क्यों सीखनी चाहिए ?

(१) यह संसार की सबसे प्राचीन भाषा है ।
(२) यह सबसे अधिक स्पष्ट और सरल भाषा है ।
(३) इस भाषा को पृथ्वी का कोई भी व्यक्ति किसी भी आयु में सीख सकता है ।
(४) यह भाषा कम शब्दों में ही पूरी बात को स्पष्ट कर देती है।
(५) इस भाषा को पढ़ने वालों का मस्तिष्क तेज रहता है । क्योंकि
विभक्तियाँ और धातुओं का क्रम याद करते रहने से।
(६) यह आने वाले युग की भाषा है ,बीच में अब विकृत्ति आ गई तो क्या हुआ !
(७) कमप्युटर के लिए उप्युक्त भाषा है ।
(८) यह भाषा दुनिया के सर्वश्रेष्ठ ज्ञान- विज्ञान वेद की कूंजी है।
(९) यह वर्ग विशेष पंडितों आचार्यों की भाषा नहीं है यह सर्व मनुष्यों की
भाषा है ।
(१०) यह गणित की भांती ही है जिसमें विद्यार्थी १००/१०० अंक प्राप्त कर सकता है ।
(११) यह सबसे मधुर और मीठी भाषा है । इसमें गालीयाँ भी नहीं दी जा सकतीं ।
(१२) यह भाषा प्रकृति के समीप है । जिसमें मनुष्यों के सभी भाव व्यक्त
करने की क्षमता है ।
(१३) यह भाषा देवनागरी में लिखी जाती है ।
(१४) यह हमारे राष्ट्र की धरोहर है हमारी आत्मा की भाषा है ।
(१५) इसका व्याकरण पाणिनिय अष्टाध्यायी और पतञ्जल महाभाष्य पृथ्वी पर
मानव मस्तिष्क की सर्वश्रेष्ठ रचना माना जाता है । जयतु संस्कृतम् ।।
ओ३म् तत् सत् । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

बुधवार, 9 दिसंबर 2015

अगर आज सुरक्षित एवं शक्तिशाली बनना है तो एक ही विकल्प है - सनातन धर्म और संस्कृति का अनुशरण करना।

१.      संस्कृत भाषा विश्व के समस्त हिन्दुओं को एक कर सकती है। इसी तथ्य को ध्यान में रख कर कांग्रेस ने धीरे धीरे षड्यंत्र रच कर भारत से संस्कृत को लगभग मिटा सा दिया है .. केवल कुछ गाँव ही हैं जहाँ आज भी संस्कृत भाषा का प्रयोग होता है।
२.      जैसा की सभी जानते हैँ सनातन धर्म के सभी ग्रंथ और पुराण संस्कृत भाषा मेँ और देवनागरी लिपि मेँ लिखे गये हैँ। अर्थात् मूल संस्कृत ही है। समय के परिवर्तन के साथ अन्य क्षेत्रीय भाषाएँ भी बनीँ जैसे - मराठी, गुजराती, कन्नड, तमिल, हिँदी, नेपाली, उडिया, मलयालम, राजस्थानी, सिँधी, इत्यादि। इनके अतिरिक्त बहुत सी भाषाएँ समय के साथ काल के गाल मेँ समा गयीँ। लेकिन जितनी भी भाषाएँ बनी, सभी संस्कृत से ही बनी हैँ सभी भाषाओँ मेँ संस्कृत के शब्द मिलते हैँ। यहाँ तक की कथित अंग्रेजी के शब्दकोश मेँ संस्कृत के शब्द अधिक मात्रा मेँ हैँ और साथ मेँ हिँदी के शब्द भी हैँ बाकीँ अन्य देशोँ के शब्दोँ को मिलाकर अंग्रेजी बनी है।
३.      स्वर्णिम काल मेँ भारत मेँ संस्कृत सर्वमान्य थी क्योँकी पहले बुद्धमान लोग पैदा होते थे। लेकिन आज कलियुग के प्रभाव के कारण मूर्खोँ के झुण्ड तैयार होते जा रहे हैँ जो संस्कृति की दुर्गति किये हुए हैँ। जब संस्कृत सर्वमान्य थी तब भारत महाज्ञानी विश्वगुरु और अखण्ड था। सभी सुःखपूर्वक रहते थे कोई मारा मारी नहीँ थी और आज स्थिति ये है की कौन सा देश किस देश पर कब परमाणु अस्त्रोँ का प्रयोग करके उसे नष्ट करदे कोई पता पता नहीँ।
४.      ये तो अधिकतर लोग जानते हैँ की हमारे पुस्तकालयोँ को जलाया एवं गुरुकुलोँ को नष्ट किया गया। लेकिन ये बहुत अल्प मात्रा मेँ लोग जानते हैँ की विदेशी लोगोँ ने भारी मात्रा मेँ पुस्तकोँ को चुराकर भारत से बाहर ले गये। जिनका आज गुप्त रुप से संस्कृत से अन्य भाषाओँ मेँ अनुवाद किया जा रहा है और साथ मेँ परीक्षण करके भारत के विरुद्ध ही प्रयोग मेँ लाया जा रहा है। जो आक्रमणकारी भारत को नष्ट भ्रष्ट करना चाहते हैँ, उनके जासूस भारत मेँ ही छिपकर सनातन संस्कृति और भारत के विरुद्ध षड्यंत्र कर रहे हैँ।
५.      उन्हीँ के कुछ कठपुतली और जासूस संस्थाऐँ "संस्कृत भाषा" का पुरजोर विरोध कर रही हैँ। संस्कृत भाषा के साथ षड्यंत्र पर षड्यंत्र किये जा रहे हैँ। संस्कृत भाषी पुस्तकोँ का अपमान किया जा रहा है। अभी एक विदेशी षड्यंत्रकारी संस्थाओँ और देशोँ द्वारा संस्कृत के संड्गणक (SANSKRIT OPERATING SYSTEM- COMPUTER SOFTWARE) के साथ छेड़छाड़ की गई कई शब्दोँ के अर्थ बदले गये।
६.      सनातन धर्म के ज्ञान का सम्पूर्ण खजाना वेद शास्त्रोँ मेँ भरा है। (वो सभी संस्कृत भाषा मेँ हैँ।) लेकिन आज उनको बोल चाल मेँ संस्कृत भाषा का प्रयोग न होने और लगातार षड्यंत्र होने के कारण उनकोँ नहीँ पढा जा सकता। संस्कृत के अभाव मेँ हम शक्तिहीन और ज्ञानहीन होते जा रहे हैँ। संस्कृत के कारण ही हम महाशक्तिशाली और ज्ञानी एवं विश्वगुरु थे। यही कारण है की भारत लगातार कमजोर होता जा रहा है।
अगर आज सुरक्षित एवं शक्तिशाली बनना है तो एक ही विकल्प है - सनातन धर्म और संस्कृति का अनुशरण करना। सनातन धर्म को जानना है तो संस्कृत भाषा अनिवार्य है। 

शनिवार, 5 दिसंबर 2015

वर्णमाला, स्वर, व्यञ्जन को जानेँ।

वर्णमाला, स्वर, व्यञ्जन को जानेँ।


संस्कृत में हर अक्षर, स्वर और व्यञ्जन के संयोग से बनता है, जैसे कि " क
" याने क् (हलन्त) अधिक अ ।
" स्वर " - सूर/लय सूचक है, और
" व्यञ्जन " - शृंगार सूचक ।
संस्कृत वर्णमाला में १४ स्वर, ३३ व्यञ्जन और २ स्वराश्रित ऐसे कुल
मिलाकर के ४९ वर्ण हैं ।
" स्वर " को " अच् " और
" व्यञ्जन " को " हल् " कहते हैं ।
अच् – १४ ( ५ + ९ ) ; हल् – ३३ ; स्वराश्रित – २
१४ स्वरों में से ५ शुद्ध स्वर हैं:- अ, इ, उ, ऋ, लृ और
९ अन्य स्वर:- आ, ई, ऊ, ऋ, लृ, ए, ऐ, ओ, औ
स्वर कि परिभाषा : -
मुख के अंदर स्थान-स्थान पर हवा को दबाने से भिन्न-भिन्न वर्णो का
उच्चारण होता है । मुख के अंदर पाँच विभाग हैं, जिनको " स्थान " कहते हैं
। इन पाँच विभागों में से प्रत्येक विभाग में एक-एक स्वर उत्पन्न होता
है, ये ही पाँच " शुद्ध स्वर "कहलाते हैं । स्वर उसको कहते हैं, जो एक ही
आवाज में बहुत देर तक बोला जा सके ।
व्यञ्जन कि परिभाषा : -
३३ व्यञ्जनों में २५ वर्ण, वर्गीय वर्ण हैं याने कि वे पाँच–पाँच वर्णो
के वर्ग में विभाजित किये हुए हैं । बाकी के ८ व्यञ्जन " विशिष्ट
व्यञ्जन" हैं, क्यों कि वे वर्ग़ीय व्यञ्जन की तरह किसी एक वर्ग में नहीं
बैठ सकतें । वर्गीय व्यञ्जनों का विभाजन उनके उच्चारण की समानता के
अनुसार किया गया है ।
* " कंठ " से आनेवाले वर्ण " कंठव्य " कहलाते हैं । उ.दा. क, ख, ग, घ
* " तालु " की मदद से होनेवाले उच्चार " तालव्य " कहलाते हैं । उ.दा. च, छ, ज, झ
* " मूर्धा " से (कंठ के थोडे उपर का स्थान) होनेवाले उच्चार "
मूर्धन्य " हैं । उ.दा. ट, ठ, ड, ढ, ण
* " दांत " की मदद से बोले जानेवाले वर्ण " दंतव्य " हैं । उ.दा. त, थ,
द, ध, न; औ
* " होठों " से बोले जानेवाले वर्ण " ओष्ठव्य " कहे जाते हैं । उ.दा.
प, फ, ब, भ, म
( ०१ ) कंठव्य / ' क ' वर्ग – क् ख् ग् घ् ङ् ;
( ०२ ) तालव्य / ' च ' वर्ग – च् छ् ज् झ् ञ् ;
( ०३ ) मूर्धन्य / ' ट ' वर्ग – ट् ठ् ड् ढ् ण् ;
( ०४ ) दंतव्य / ' त ' वर्ग – त् थ् द् ध् न् ;
( ०५ ) ओष्ठव्य / ' प ' वर्ग – प् फ् ब् भ् म् ;
विशिष्ट व्यञ्जन :- य् व् र् ल् श् ष् स् ह्
************************************************
स्वर और व्यञ्जन के अलावा "ं" (अनुस्वार), और 'ः' (विसर्ग) ये दो "
स्वराश्रित " कहे जाते हैं, और इनके उच्चार कुछ खास नियमों से चलते हैं ।
इन ४९ वर्णों को छोडकर, और भी कुछ वर्ण सामान्य तौर पे प्रयुक्त होते हैं ,
जैसे कि " त्र " , " क्ष " , " ज्ञ " , " श्र " , " ॐ " इत्यादि । पर ये
सब किसी न किसी व्यञ्जनों के संयोग से बने गये होने से उनका अलग अस्तित्व
नहि है; और इन्हें " संयुक्त वर्ण " भी कहा जा सकता है ।
" य " , " व " , " र " , और " ल " ये " विशिष्ट वर्ण " हैं क्यों कि
स्वर-जन्य (स्वरों से बने हुए) हैं, ये " अन्तःस्थ व्यञ्जन " भी कहे जाते
हैं ।
देखिए:
>> इ / ई + अ = य (तालव्य)
>> उ / ऊ + अ = व (दंतव्य तथा ओष्ठव्य)
>> ऋ / ऋ + अ = र (मूर्धन्य)
>> लृ / लृ + अ = ल (दंतव्य)
इनके अलावा
" श ", " ष ", और " स " के उच्चारों में बहुधा अशुद्धि पायी जाती है ।
इनके उच्चार स्थान अगर ध्यान में रहे, तो उनका उच्चारण काफी हद तक सुधारा
जा सकता है ।
श = तालव्य
ष = मूर्धन्य
स = दंतव्य
ह = कण्ठ्य
ये चारों " ऊष्म व्यञ्जन " होने से विशिष्ट माने गये हैं ।
ॐ शांति ।। जयतु हिन्दी ।। जयतु संस्कृतम् ।। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

संस्कृत के विकास के लिए एकजुट हों-अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कामत।

संस्कृत के विकास के लिए एकजुट हों-अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कामत।


जिस प्रकार से उर्दू और अंग्रेजी के लोग संगठित हैं और उनका विकास हो रहा
है। उसी प्रकार से संस्कृत से जुड़े लोगों को संगठित होने की जरूरत है।
यह बात संस्कृत भारती के अखिल भारतीय संगठन मंत्री दिनेश कामत ने नगर
क्षेत्र के दशई पोखरा स्थित डानवास्कों स्कूल में प्रेसवार्ता के दौरान
कही। वे स्कूल में आयोजित संस्कृत भारती के तत्वावधान में आयोजित शिविर
के समाप समारोह में भाग लेने के लिए आए थे।
उन्होंने कहा कि संस्कृत न तो केवल भाषा है। ये भारत के ज्ञान विज्ञान की
भारतीय संस्कृति की वाहक है। भारत की पहचान है। संस्कृत का पुनरुजीवन
भारत का ही पुर्नजीवन है। संस्कृत के पुनरुत्थान के लिए संस्कृत भारती
संस्था कार्यरत है। उन्होंने कहा कि संभाषण शिविर में दो घंटा प्रतिदिन
देने पर मात्र दस दिनों में कोई भी संस्कृत बोलना सीख सकता है। ऐसे शिविर
भारत में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। इन शिविरों में ९० लाख से अधिक लोगों
ने भाग लिया है। उन्होंने बताया कि विश्व के २८ देशों के २५४
विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ाई जाती है। उन्होंने कहा कि संस्कृत
सर्वत्र ले जाने की संस्कृत सब लोगों की अभियान में लाखों युवा जुट रहे
हैं। बताया कि उत्तर प्रदेश में ६ और पूरे भारत में ३४ वर्ग शिविर चल रहे
हैं। उन्होंने सभी से संस्कृत को आगे ले जाने के लिए निवेदन किया।
ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाया जाता तो मुख्यतः दो लाभ होते।

                         १९४७ में भारतीय राष्ट्रभाषा के विषय पर बात की गई …. जब पाकिस्तान ने उर्दू को राष्ट्रीय भाषा बनाया था…. उस समय दक्षिण भारत से एक व्यक्ति सामने आया जिसका नाम था अन्ना दुरई एक communist थेजिस कारण ज्यादा जन-आधार नहीं था उनके पासपरन्तु उनके एक वक्तव्य ने उनको इतना जन-आधार दिया की वो पूरे दक्षिण भारत में प्रसिद्ध हो गए….उनकी मांग थी की संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाया जाए….नेहरु ने कहा की संस्कृत is an outdated language”.. अन्ना दुरई ने कहा की कैसे कौन सा ऐसा घर हैं जिसमे गायत्री महामंत्र नहीं बोला जाता.. या कौन सा ऐसा भारतीय है जो ॐ बोलना या उच्चारण न जानता हो”.. परन्तु नेहरु और गाँधी ने उनकी मांग सिरे से नकार दिया और ३०० वर्ष पुरानी भाषा हिंदी पूरे देश पर थोप दी गई। अब यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाया जाता तो मुख्यतः दो लाभ होते। १९४७ में संस्कृत के नाम पर सभी एकजुट थे क्योंकि सभी भाषाएँ संस्कृत से ही बनी हैं।
अब यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाया जाता तो मुख्यतः दो लाभ होते:
१. समस्त भारत से भाषा और प्रांतवाद का मुद्दा ख़त्म हो जाता। संस्कृत के राष्ट्रभाषा होने के कारण आप किसी भी प्रदेश में जाकर सबसे संस्कृत में जुड़ सकते थे। आज की तरह आपको भाषाओँ के कारण कोई समस्या न रहती।
२. यदि संस्कृत को राष्ट्रभाषा बनाया जाता तो समस्त स्कूलों में संस्कृत पढ़ाई जाती और सभी अपने वेदों, उपनिषदों, पुराणों, धर्मग्रन्थों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ जाते...पढ़ पाते...और समझ पाते की सनातन धर्म और अन्य पैशाचिक धर्मो की शिक्षाओं में क्या अंतर है?

                     सनातन धर्म और अन्य धर्मो की शिक्षाओं में क्या क्या भेद हैं? और नेहरु की यही नीति आज सबसे बड़ा जहर बन चुकी है। एक और प्रांतवाद और भाषावाद के नाम पर लोग लड़ रहे हैं दूसरी और.... ९९.९९% मुस्लमान अपने धर्मग्रन्थ उर्दू अरबी फारसी में पढ़ कर सब समझ जाते हैं की उन्हें क्या क्या करना है ?? और ९९.९९% हिन्दू कभी अपने धर्म-ग्रन्थों को छू भी नहीं पाते। मुसलमानों को इतना पता होता है हिन्दू धर्म के बारे में जितना हिन्दुओं को ही पता नहीं होता। एक ५ वर्ष का बच्चा मस्जिद जाता है, उसका बाप लेकर जाता है। एक १० वर्ष का बच्चा उर्दू, अरबी, फारसी में कुरान, हदीश, शूरा आदि सब पढ़ता है। एक १५ वर्ष का बच्चा रमजान के सारे रोजे रखता है। अब ८० वर्ष के कितने सनातन धर्मी होंगे जिन्होंने अपने जीवनकाल में कभी वेदों, का अध्ययन किया हो। आज हिन्दू समाज को महान चिँतन की आवश्यकता है की उनकी आने वाली पीढी का क्या होगा ......। उत्तेष्टि भारत !! वन्दे मातरम !! संघे शक्ति कलयुगे !! भारत माता की जय !! जय जय माँ भारती !! ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

भारत के प्रधानमंत्री नरेँद्र मोदी जी का आयरलैंड में शुद्ध संस्कृत श्लोकों से स्वागत और पिछले ७० वर्षोँ मेँ संस्कृत का अपमान।


                                  भारत के प्रधानमंत्री नरेँद्र मोदी जी ने आयरलैंड में शुद्ध संस्कृत श्लोकों से स्वागत होने पर कहा की अगर ये भारत में होता तो वहाँ का सेकुलरिज्म खतरे में पड़ जाता। इस पर बवाल करते कांग्रेसियों ने कहा की उन्होंने संस्कृत का कभी विरोध नही किया।!
अब ये पढ़िए ध्यान से....
                       १९४९ में मुस्लिम लीग के नज़िरुद्दीन अहमद ने कहा था की संस्कृत को राष्ट्रभाषा का दर्ज़ा दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा की भारत की संस्कृति और महान ज्ञान, संस्कृत में है। डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भी उनका समर्थन किया था। लेकिन नेहरू को लगा की संस्कृत को राष्ट्र भाषा का दर्ज़ा देने से हिन्दू धर्म को विशेष महत्व मिलेगा !! और वो नही माना !! पूरा मुस्लिम लीग एकजुट, संस्कृत की पैरवी कर रहा था। क्योंकि १९४९ में वहीँ मुस्लिम भारत में रहे जिन्हें वाकई भारत से प्रेम था। कांग्रेस सरकार की ये घटिया सोच की संस्कृत से हिन्दू अपने गौरवशाली इतिहास को जानेंगे तो समस्या हो जायेगी। जिसकी वजह से हम अपने पूर्वजों के शास्त्रों, शस्त्रों, दर्शन, कानून, अर्थशास्र, औषधि, विज्ञान, गणित - खगोल, ज्योतिष विद्या, वास्तुशिल्प आदि से वंचित रह गए। १९९४ में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा की संस्कृत किसी धर्म की भाषा नही है और इससे भारत की सेकुलरिज्म को कोई खतरा नही। १९९३ में इलाहबाद हाई कोर्ट ने कहा की जिस संस्कृत भाषा को सर विलियम जोन्स ने ग्रीक से ज़्यादा परफेक्ट, लैटिन से ज़्यादा विपुल और किसी भी अन्य भाषा से ज़्यादा विशोधित व् सभ्य माना। उसे अपने ही देश में उचित सम्मान नही और उसके शिक्षकों को अनचाहा संघर्ष करना पड़ता है। २००४ के सुप्रीम कोर्ट ने आर्य गुरुकुल v/s उत्तर प्रदेश सरकार, में कहा की संस्कृत का साहित्य और सामग्री इतनी वृहद और धनी है की ये स्पष्ट होता है की संस्कृत स्वतंत्र वैचारिकों की भाषा थी। एपीजे कलाम सर ने संस्कृत की बढ़ाई करते हुए कहा था की मेरी दिली तमन्ना है की अथर्ववेद की सही शोध और व्याख्या होने पर हम विज्ञान की हर शाखा में नई बुलंदियां छू सकते है। आज भी २१ वीं सदी में विकिपीडिया के डॉ मुजम्मिलुद्दीन कहते है की संस्कृत को बढ़ावा देना चाहिए, विकी को भी और विश्व को भी। वही भारत में, कांग्रेसी शासन में संस्कृत को कोई स्थान नहीँ दिया गया है। जहाँ पहले केंद्रीय विद्यालयों में कक्षा ५ से संस्कृत अनिवार्य थी, वहीं बाद में जर्मनी और संस्कृत के बीच आप्शन कर दिया !! JNU में ३२ वर्ष के संघर्ष के बाद "संस्कृत सेंटर" खुला।

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Download - संस्कृत व्याकरण पुस्तक संग्रह [Sanskrit Vyakarana pustak sangraha]

संस्कृत व्याकरण पुस्तक संग्रह Sanskrit Vyakarana pustak sangraha :
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1 A Sanskrit Gramma01( Whitney)
2 A-Dictionary - of-Sanskrit -Grammar- K-abhyanka r-Baroda- 1961-600dp i-Lossy
3 A-Reader- on-the- Sanskrit- Grammarian s- Ed-J-staal- MIT-1972-6 00dpi-Loss y
4 Aakhyatika
5 Ashtaadhya ayisootrapa athah (Yatibodhas ahitah).p65
6 Ashtaadhya ayisootrapa athah (Yatibodhas ahito laghukaaya shcha).p65
7 Ashtadhyayi of Panini- Adhyay-3
8 Astadhyayis utrapatha
9 AsubodhaV yakaranam- TaranathTa rkavachasp ati
10 Brihad Anuvada Chandrika
11 Daivam- Purushakar aTG Shastri
12 Dhatupath_a lphabeticalB Singh
13 Dhatupatha_ index_svar a
14 Durghatavri tti of Saranadeva -TG Sastri
15 Kashika
16 Laghu- Siddhanta- Kaumudi- Bhaimi- Vyakhya- Avyaya- Prakaran
17 Laghu- Siddhanta- Kaumudi- Bhaimi- Vyakhya- Stri-Pratya ya- Prakarana- Part-6
18 Laghu- Siddhanta- Kaumudi- III-Bhaimi- Vyakhya- Kridanta
19 Laghu- Siddhanta- Kaumudi- IV-Bhaimi- Vyakhya-S amas
20 Laghu- Siddhanta- Kaumudi- V-Taddhita - Bhim-Sena- Shastri
21 Maadhaviya Dhaatuvritti
22 Madhaviya Dhatuvritti- Panini
23 Mahabhash ya_III
24 Mahabhash ya_II
25 Mahabhash ya_IV
26 Mahabhash ya_I
27 Mahabhash ya_VI
28 Mahabhash ya_V
29 Paribashen du Shekhara
30 Paribhasha Vrtti
31 Paribhashe ndu Shekhara
32 Patanjali- s-Vyakaran a- Mahabhash ya- Paspasha- Ahnika- Ed-Tr-
S-D-joshi- J-roodberg en-Poona- 1986-600dp i-Lossy
33 Prathamavri tti-1
34 Prathamavri tti-2
35 Prathamavri tti-3
36 Praudha Rachananuv ad Kaumudi
37 Rachananuv ad Kaumudi
38 Rama-Nath- Sharma- The-ASTAd hyAyI- of-PANini- Volume-1
39 Rama-Nath- Sharma- The-ASTAd hyAyI- of-PANini- Volume-2
40 Rama-Nath- Sharma- The-ASTAd hyAyI- of-PANini- Volume-3
41 Rama-Nath- Sharma- The-ASTAd hyAyI- of-PANini- Volume-4
42 Rama-Nath- Sharma- The-ASTAd hyAyI- of-PANini- Volume-5
43 Rama-Nath- Sharma- The-ASTAd hyAyI- of-PANini- Volume-6
44 Sanskrit- Pathan- Pathan- Ki-Anubhut- Saraltama- Vidhi-II
45 SanskritVya karanam
46 Siddhisangr ah ( 01-64 )
47 Upsargarth -chandrika- ii-charudev a-shastri
48 Upsargarth -chandrika- iv-charude va-shastri
49 Upsargarth a- chandrika- 5-v-b- charudeva- shastri
50 Upsargarth a- chandrika- iii-charudev a-shastri
51 Vaiyakaran a Siddhanta Karika
52 Vaiyakaran a_Bhooshan asara_of_Ka undabhatta_ - _SS_Marulka r
53 kashika- Nyasa- Padamanjari - Sutrapatha- Dhatupatha -Ganapatha
54 laghu- siddhanta- kaumudi- bhaimi- vyakhya- i-bhim- sena-shastri
55 madhaviyad hatuvr00sa yauoft
56 madhaviyah dhatuv00sa yauoft
57 sanskrit_vy akaran_pra veshika
संस्कृत व्याकरण पुस्तक संग्रह Sanskrit Vyakarana pustak sangraha

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बुधवार, 2 दिसंबर 2015

अद्य संस्कृतम् संधान कुरु।

अद्य संस्कृतम् संधान कुरु।

संधान संस्कृत का शब्द है जिसका अर्थ है समझना और सुधारना। संधान में
दोनों ही बातें शामिल हैं – समझना भी और सुधारना भी, अर्थात् गहरी खोज
करके जो सत्य ज्ञात हो उसके अनुसार अपने लिए और समाज के लिए कुछ
सकारात्मक कार्य करना।
हम बिना समझे किसी चीज़ को सुधार नहीं सकते। एक घड़ी को सुधारने के लिए
आवश्यक है कि हम पहले जानें कि वह कैसे बनी है और कैसे काम करती है। भारत
को सुधारने का प्रयास करने के पहले हमें भारत की प्रकृति को समझना होगा।
और देशों की अंधी नकल करके हम न तो भारत को समझ सकते हैं और न ही उसे
सुधार सकते हैं।
आज भारत के सभी प्रबुद्ध व्यक्तियों को देश को सुधारने की आवश्यकता लग
रही है। पिछले सौ-दो सौ वर्षों में अनेक सामाजिक आंदोलन समाज को सुधारने
के लिए चले। स्वतंत्रता के लिए हमारा संघर्ष केवल राजनैतिक आज़ादी के
उद्देश्य को लेकर ही नहीं था। उस संघर्ष में लगे हुए नेता मृत भारत को
पुनर्जीवित करना चाहते थे। हमारे स्वतंत्रता आन्दोलन में भारत की आत्मा
की खोज एक बड़ी प्रेरणा शक्ति थी। वीर दामोदर सावरकर, बालगंगाधर तिलक,
श्री अरविन्द, बिपिनचन्द्र पाल, लाला लाजपतराय, सुभाषचन्द्र बोस,
चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, नाथूराम गोडसे, डा. राजेन्द्र प्रसाद आदि नेता
केवल भारत को परतंत्रता से मुक्त कराने के लिए ही संघर्ष नहीं कर रहे थे।
वे भारत की प्राचीन संस्कृति को आधार बनाकर एक पुनर्जागरण का अभियान
चलाना चाहते थे। और ये वे लोग थे जो पश्चिम के आधुनिक विचारों से पूरी
तरह परिचित थे और मानते थे कि न केवल भारत का अपितु संसार का भावी विकास
प्राचीन भारतीय विचारों के आधार पर ही हो सकता है।
भारत आन्तरिक जीवन के बारे में खोज करने में अग्रणी रहा है। पर आज के समय
में भारत को भी प्राचीन भारतीय ऋषियों द्वारा शताब्दियों की गहरी साधना
से खोजे गए सत्य को एक बार फिर से समझने की आवश्यकता है। उन खोजों के
परिणामों का संबंध मनुष्य की प्रकृति और उसके भविष्य से है और इसलिए वे
हम सभी के लिए प्रासंगिक हैं। ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

भारत के कर्नाटक राज्य के मत्तूरु गाँव का बच्चा बच्चा संस्कृत में बात करता है।

कर्नाटक स्थित मत्तूरु गाँव एक ऐसा गाँव है जहाँ का बच्चा बच्चा संस्कृत
में बात करता है ! इस गांव में रहने वाले सभी लोग संस्कृत में ही बात
करते हैं ! तुंग नदी के किनारे बसा ये गांव बेंगलुरु से ३०० किलोमीटर की
दूरी पर स्थित है ! इस गांव में संस्कृत प्राचीनकाल से ही बोली जाती है !
हालांकि बाद में यहां के लोग भी कन्नड़ भाषा बोलने लगे थे, लेकिन ३३ वर्ष
पहले पेजावर मठ के स्वामी ने इसे संस्कृत भाषी गांव बनाने का आह्वान किया
! जिसके बाद गाँव के लोग संस्कृत में ही वार्तालाप करने लगे !
१९८१-८२ तक इस गाँव में राज्य की कन्नड़ भाषा ही बोली जाती थी ! कई लोग
तमिल भी बोलते थे, क्योंकि पड़ोसी तमिलनाडु राज्य से बहुत सारे मज़दूर
क़रीब १०० वर्ष पहले यहाँ काम के सिलसिले में आकर बस गए थे ! मत्तूरु
गांव में ५०० से ज्यादा परिवार रहते हैं, जिनकी संख्या तकरीबन ३५०० के
आसपास है ! गांव के कई संस्कृतभाषी युवा आईटी इंजीनियर हैं ! यह युवा बड़ी
बड़ी कंपनियों में कार्यरत हैं ! कुछ सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं तो कुछ बड़े
शिक्षा संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों में संस्कृत पढ़ा रहे हैं ! विदेशों
से भी कई लोग संस्कृत सीखने के लिए इस गांव में आते हैं ! इस गाँव के
लोगों का संस्कृत के प्रति झुकाव दरअसल अपनी जड़ों की ओर लौटने जैसा एक
आंदोलन था, जो संस्कृत-विरोधी आंदोलन के ख़िलाफ़ शुरू हुआ था ! संस्कृत
को ब्राह्मणों की भाषा कहकर आलोचना की जाती थी ! इसे अचानक ही नीचे करके
इसकी जगह कन्नड़ को मान्यता दे दी गई !
इसके बाद पेजावर मठ के स्वामी ने इसे संस्कृत भाषी गाँव बनाने का आह्वान
किया ! सभी गाँव वासियों ने संस्कृत में बातचीत का निर्णय करके एक
नकारात्मक प्रचार को सकारात्मक मोड़ दे दिया ! मात्र १० दिनों तक रोज़ दो
घंटे के अभ्यास से पूरा गाँव संस्कृत में बातचीत करने लगा !
गाँव के न केवल संकेथी ब्राह्मण बल्कि दूसरे समुदायों के लोग भी संस्कृत
में बात करते हैं ! इनमें सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित तबका भी शामिल
है ! संकेथी ब्राह्मण एक छोटा सा ब्राह्मण समुदाय है, जो सदियों पहले
दक्षिणी केरल से आकर यहाँ बस गया था ! पूरे देश में क़रीब ३५,००० संकेथी
ब्राह्मण हैं और जो कन्नड़, तमिल, मलयालम और थोड़ी-बहुत तेलुगु से बनी
संकेथी भाषा बोलते हैं ! लेकिन इस भाषा की कोई अपनी लिपि नहीं है !
स्थानीय श्री शारदा विलास स्कूल के ४०० में से १५० छात्र राज्य शिक्षा
बोर्ड के निर्देशों के अनुरूप कक्षा छह से आठ तक पहली भाषा के रूप में
संस्कृत पढ़ते हैं ! कर्नाटक के स्कूलों में त्रिभाषा सूत्र के तहत दूसरी
भाषा अंग्रेज़ी और तीसरी भाषा कन्नड़ या तमिल या कोई अन्य क्षेत्रीय भाषा
पढ़ाई जाती है ! फ़िलहाल भाषा विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट में है !
"संस्कृत ऐसी भाषा है जिससे आप पुरानी परंपराएँ और मान्यताएँ सीखते हैं.
यह ह्रदय की भाषा है और यह कभी नहीं मर सकती !" संस्कृत भाषा ने इस गाँव
के नौजवानों को इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई करने के लिए गाँव से बाहर
जाने से रोका नहीं है ! "अगर आप संस्कृत भाषा में गहरे उतर जाएं तो यह
मदद करती है ! ऐसे व्यक्ति जिन्होंने थोड़ी भी वैदिक गणित सीखी है इससे
उन्हें मदद मिली ! दूसरे लोग कैलकुलेटर का प्रयोग करते हैं जबकि वैदिक
गणित सीखे लोगों को कैलकुलेटर की ज़रूरत नहीं पड़ती !"
हालांकि जीविका की चिंता की वज़ह से वेद पढ़ने में लोगों की रुचि कम हो
गई है ! मत्तूरु में संस्कृत का प्रभाव काफ़ी गहरा है ! गाँव की
गृहिणीयां तो आमतौर पर संकेथी बोलती हैं, लेकिन अपने बेटे या परिवार के
किसी और सदस्य से ग़ुस्सा होने पर संस्कृत बोलने लगती हैं ! मत्तूरु गाँव
में सुपारी की सफ़ाई का काम करती महिलाएँ मज़दूर तमिल भाषी संस्कृत समझ
लेते हैं ! हालांकि इनमे से कुछ इसे बोल नहीं पाते, लेकिन इनके बच्चे बोल
लेते हैं !
यहाँ के लोग इस पर उपजे विवाद को संस्कृत के विरुद्ध षड्यंत्र मानते है !
मत्तूरु के निवासी मानते है कि जिस तरह यूरोप की भाषाएँ यूरोप में बोली
जाती हैं उसी तरह हमें संस्कृत बोलने की ज़रूरत है ! संस्कृत सीखने का
खास फायदा यह है कि इससे न केवल आपको भारतीय भाषाओं को बल्कि जर्मन और
फ़्रेंच जैसी भाषाओं को भी सीखने में सहायता मिलती है! ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

तुर्क लुटेरा बख्तियार खिलजी ने विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय को जला के नष्ट कर दिया था।


एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाव के तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर नष्ट कर दिया था।
                                  गया (बिहार) : अत्यंत सुनियोजित ढंग से और विस्तृत क्षेत्र में बना हुआ नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन दुनिया का संभवत: पहला विश्वविद्यालय था,जहां न सिर्फ देश के, बल्कि विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते थे। इस विश्वविद्यालय की स्थापना गुप्त शासक कुमारगुप्त प्रथम ने ४५०-४७० ई. केबीच की थी। पटना से ८८.५ किलोमीटर दक्षिण-पूर्व और राजगीर से ११.५किलोमीटर उत्तर में स्थापित इस विश्वविद्यालय में तब १२ हजार छात्र और२००० शिक्षक हुआ करते थे। गुप्तवंश के पतन के बाद भी सभी शासक वंशों नेइसकी समृद्धि में अपना योगदान जारी रखा। लेकिन एक सनकी और चिड़चिड़ेस्वभाव के तुर्क लुटेरे ने नालंदा विश्वविद्यालय को जला कर इसके अस्तित्व को पूर्णत: नष्ट कर दिया। यह प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। इस विश्वविद्यालय में विभिन्न धर्मोंके तथा अनेक देशों के छात्र पढ़ते थे। इस महान विश्वविद्यालय केभग्नावशेष इसके वैभव का अहसास करा देते हैं। प्रसिद्ध चीनी यात्रीह्वेनसांग ने ७ वीं शताब्दी में अपने जीवन का एक वर्ष एक विद्यार्थी औरएक शिक्षक के रूप में यहां व्यतीत किया था। प्रसिद्ध 'बौद्ध सारिपुत्र'का जन्म यहीं पर हुआ था।यह विश्व का प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालय था। विकसित स्थिति मेंइसमें विद्यार्थियों की संख्या करीब १०,००० एवं अध्यापकों की संख्या २०००थी। सातवीं शती में जब ह्वेनसांग आया था, १०,००० विद्यार्थी और १५१०आचार्य नालंदा विश्वविद्यालय में थे। इस विश्वविद्यालय में भारत केविभिन्न क्षेत्रों से ही नहीं, बल्कि कोरिया, जापान, चीन, तिब्बत,इंडोनेशिया, फारस तथा तुर्की से भी विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे।नालंदा के विशिष्ट शिक्षाप्राप्त स्नातक बाहर जाकर बौद्ध धर्म का प्रचारकरते थे। इस विश्वविद्यालय की नौवीं सदी से बारहवीं सदी तक अंतरराष्ट्रीयख्याति रही थी। नालंदा विश्वविद्यालय को एक सनकी और चिड़चिड़े स्वभाववाले तुर्क लुटेरे बख्तियार खिलजी ने ११९९ ई. में जला कर पूर्णत: नष्ट करदिया। उसने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ाकर लिया था।ऐसा कहा जाता है कि बख्तियार खिलजी एक बार बहुत बीमार पड़ गया। उसकेहकीमों ने उसे ठीक करने की पूरी कोशिश की, मगर वह स्वस्थ नहीं हो सका।किसी ने उसे नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्यराहुल श्रीभद्र से इलाज कराने की सलाह दी। उसे यह सलाह पसंद नहीं आई।उसने सोचा कि कोई भारतीय वैद्य उसके हकीमों से उत्तम ज्ञान कैसे रख सकताहै और वह किसी काफ़िर से अपना इलाज क्यों करवाए। फिर भी उसे अपनी जानबचाने के लिए उनको बुलाना पड़ा। जब वैद्यराज इलाज करने पहुंचे तो उसने उनके सामने शर्त रखी कि वह उनकेद्वारा दी कोई दवा नहीं खाएगा, लेकिन किसी भी तरह वह ठीक करे, वर्ना मरनेके लिए तैयार रहे। बेचारे वैद्यराज को नींद नहीं आई, बहुत उपाय सोचा और अगले दिन उस सनकी बख्तियार खिलजी के पास कुरान लेकर चले गए। उन्होंने कहाकि इस कुरान की पृष्ठ संख्या इतने से इतने तक पढ़ लीजिये, आप ठीक होजाएंगे!वैद्यराज के कहे अनुसार, उसने कुरान पढ़ा और ठीक हो गया। लेकिन ठीक होनेपर खुश होने की जगह उसे बड़ी झुंझलाहट हुई और गुस्सा आया कि उसके हकीमोंसे इन भारतीय वैद्यों का ज्ञान श्रेष्ठ क्यों है?बौद्ध धर्म और आयुर्वेद का एहसान मानने व वैद्य को पुरस्कार देने के बदलेबख्र्तियार खिलजी ने नालंदा विश्वविद्यालय में ही आग लगवा दिया। उसनेपुस्तकालयों को भी जला कर राख कर दिया। वहां इतनी पुस्तकें थी कि आग लगीभी तो तीन माह तक पुस्तकें धू-धू करके जलती रहीं। यही नहीं, उसने अनेकधर्माचार्यों और बौद्ध भिक्षुओं को मार डाला।बता दें कि नालंदा विश्वविद्यालय प्राचीन भारत में उच्च शिक्षा कासर्वाधिक महत्वपूर्ण और विख्यात केंद्र था। प्रवेश परीक्षा अत्यंत कठिनहोती थी। अत्यंत प्रतिभाशाली विद्यार्थी ही प्रवेश पा सकते थे। उन्हेंतीन कठिन परीक्षा स्तरों को उत्तीर्ण करना होता था। यह विश्व का प्रथमऐसा दृष्टांत है। शुद्ध आचरण और संघ के नियमों का पालन करना अत्यंतआवश्यक था।

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सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए आगे आऐँ। हमारी धार्मिक शिक्षा व्यवस्था ही हमारा अस्तित्व है।

सनातन संस्कृति की रक्षा के लिए आगे आऐँ। हिन्दू भाईयोँ और बहनोँ क्या आप मैकाले द्वारा बनायी गयी शिक्षा प्रणाणी बदलबाने के लिए आगे आऐँगे जिससे लोग जागृत होँ और हम सब एक साथ मिल कर हिन्दुत्ववादी संगठनोँ द्वारा समाज को बता सके की धर्म संकट मेँ है हम सबको पढने के लिए गुरुकुल और तक्षिला जैसा विद्यालय चाहिए जिससे देश और धर्म की रक्षा हो सके। क्या आप अपने गौरवशाली इतिहास भूल गये जहाँ ज्ञानवान होने पर ही हमारी पहचान थी वहीँ आज के अधुनिक समय मेँ पाश्चात्य सभ्यता प्रणाणी द्वारा हमेँ मूर्ख बनाया जा रहा है और वही भारत के बाहर हजारोँ संस्कृत विद्यालय चलाये जाते हैँ और हमेँ हमारी संस्कृति से दूर किया जा रहा है आप खुद सोचिए हम कब तक बिना शिक्षा के जीवनयापन कर पाऐँगे? कब तक अंग्रेजी भाषा के गुलाम बने रहेँगे? कब तक विदेशी कानूनोँ को झेलते रहेँगे? कब तक अपनी और माँ बहन बेटियोँ की इज्जत लुटबाते रहेँगे? हमेँ आगे आना ही होगा हमेँ ही वीर शिवाजी, चन्द्रगुप्त, महाराणा प्रताप, भगत सिँह, सुभाष चन्द्र वोस, बनना पढेगा नहीँ तो धीरे धीरे सब खत्म होता जा रहा है । हमारी सुदृण शिक्षा व्यवस्था ही हमारा अस्तित्व है। जय सनातन धर्म। जय श्री कृष्ण । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

पारिवारिक नाम संस्कृत मेँ ......

पारिवारिक नाम संस्कृत मेँ ...... जनक: - पिता । माता - माता । पितामह: - दादा । पितामही - दादी । प्रपितामह: - परदादा । प्रतितामही - परदादी । मातामह: - नाना । मातामही - नानी । प्रमातामह: - परनाना । प्रमातामही - परनानी । वृद्धप्रतिपितामह - वृद्धपरनाना । पितृव्य: - चाचा । पितृव्यपत्नी - चाची । पितृप्वसृपितृस्वसा - फुआ । पितृस्वसा - फूफी । पैतृष्वस्रिय: - फुफेराभाई । पति: - पति । भार्या - पत्नी । पुत्र: / सुत: / आत्मज: - पुत्र । स्नुषा - पुत्र वधू । जामातृ - जँवाई ( दामाद ) । आत्मजा - पुत्री । पौत्र: - पोता । पौत्री - पोती । प्रपौत्र:, प्रपौत्री - पतोतरा । दौहित्र: - पुत्री का पुत्र । दौहितत्री - पुत्री का पुत्री । देवर: - देवर । यातृ,याता - देवरानी । ननांदृ, ननान्दा - ननद । अनुज: - छोटाभाई । अग्रज: - बड़ा भाई । भ्रातृजाया, प्रजावती - भाभी । भ्रात्रिय: , भ्रातृपुत्र: - भतीजा । भ्रातृसुता - भतीजी । पितृव्यपुत्र: - चचेराभाई । पितृव्यपुत्री - चचेरी बहन । आवुत्त: - बहनोई । भगिनी - बहिन । स्वस्रिय: , भागिनेय: - भानजा । नप्तृ,नप्ता - नाती । मातुल: - मामा । मातुली - मामी । मातृष्वसृपति - मौसा । मातृस्वसृ , मातृस्वसा - मौसी । मातृष्वस्रीय: - मौसेरा भाई । श्वशुर: - ससुर । श्वश्रू: - सास । श्याल: - साला । सम्बन्धीन् - समधी । सम्बन्धिनि - समधिन । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

पशव: । (पशुओँ के संस्कृत नाम)

पशव: । (पशुओँ के संस्कृत नाम) उंट - उष्ट्र‚ क्रमेलकः । उद्बिलाव - उद्बिलाव । कछुआ - कच्छप: । केकडा - कर्कट: ‚ कुलीरः । कुत्ता - श्वान:, कुक्कुर: कौलेयकः‚ सारमेयः । कुतिया – सरमा‚ शुनि । कंगारू - कंगारुः । कनखजूरा – कर्णजलोका । खरगोश - शशक: । गाय - गो, धेनु: । गैंडा - खड्.गी । गीदड (सियार) - श्रृगाल:‚ गोमायुः । गिलहरी - चिक्रोड: । गिरगिट - कृकलास: । गोह – गोधा । गधा - गर्दभ:, रासभ:‚ खरः । घोडा - अश्व:, सैन्धवम्‚ सप्तिः‚ रथ्यः‚ वाजिन्‚ हयः । चूहा - मूषक: । चीता - तरक्षु:, चित्रक: । चित्तीदार घोडा - चित्ररासभ: । छछूंदर - छुछुन्दर: । छिपकली – गृहगोधिका । जिराफ - चित्रोष्ट्र: । तेंदुआ – तरक्षुः । दरियाई घोडा - जलाश्व: । नेवला - नकुल: । नीलगाय - गवय: । बैल - वृषभ: ‚ उक्षन्‚ अनडुह । बन्दर - मर्कट: । बाघ - व्याघ्र:‚ द्वीपिन् । बकरी - अजा बकरा - अज: । बनमानुष - वनमनुष्य: । बिल्ली - मार्जार:, बिडाल: । भालू - भल्लूक: । भैस - महिषी । भैंसा – महिषः । भेंडिया - वृक: । भेंड - मेष: । मकड़ी – उर्णनाभः‚ तन्तुनाभः‚ लूता । मगरमच्छ - मकर: ‚ नक्रः । मछली – मत्स्यः‚ मीनः‚ झषः । मेंढक - दर्दुरः‚ भेकः । लोमडी -लोमशः । शेर - सिंह:‚ केसरिन्‚ मृगेन्द्रः‚ हरिः । सुअर - सूकर:‚ वराहः । सेही – शल्यः । हाथी - हस्ति, करि, गज: । हिरन - मृग: । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

पुष्पनाम संस्कृतम्। (संस्कृत मेँ फूलोँ के नाम)

पुष्पनाम संस्कृतम्। (संस्कृत मेँ फूलोँ के नाम) १ कनेर - कर्णिकार: । २ कमल (नीला) - इन्दीवरम् । ३ कमल (श्वेत) - कैरवम् । ४ कमल (लाल) - कोकनदम्, पद्मम् । ५ कुमुदनी - कुमुदम् । ६ कुन्द - कुन्दम् । ७ केवडा - केतकी । ८ गुलाब - पाटलम् । ९ गेंदा - स्थलपद्मम् । १० चम्पा - चम्पक: । ११ चमेली - चमेली । १२ जवापुष्प - जपापुष्पम् । १३ जूही - यूथिका । १४ दुपहरिया - बन्धूक: । १५ नेवारी - नवमालिका । १६ बेला - मल्लिका । १७ मौलसरी - बकुल: । १८ रातरानी - रजनीगन्धा । १९ हरसिंगार - शेफालिका । २० मालती - मालतीपुष्प । ॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐॐ

२० पाठोँ मेँ संस्कृत सीखेँ। (संधान संस्कृत-प्रवेश की ओर से....)

२० पाठोँ मेँ संस्कृत सीखेँ। (संधान संस्कृत-प्रवेश की ओर से....)


               संस्कृत का अध्ययन आरम्भ करने वाले छात्रों के लिए पाठ्यक्रम प्रस्तुत करते हुए हमें बहुत प्रसन्नता हो रही है। इस पाठ्यक्रम की कुछ विशेषताएँ निम्नलिखित हैं।

1. पाठ्यक्रम के प्रथम के दो पाठों में देवनागरी लिपि की संस्कृत से संबंधित कुछ बातों की ओर ध्यान दिलाया गया है जिसे संस्कृत का अध्ययन आरम्भ करने वालों के लिए जानना आवश्यक है।
2. पाठ्यक्रम में संस्कृत व्याकरण के बजाय संस्कृत भाषा सिखाने पर बल दिया गया है। प्रायः संस्कृत की प्रारम्भिक पुस्तकों में व्याकरण की रूपावलियों और नियमों को सिखाने पर बल रहता है जिससे संस्कृत भाषा में अन्तर्दृष्टि नहीं मिलती। इस पाठ्यक्रम के छात्र यह अनुभव करेंगे कि वे आरम्भ से ही वास्तविक संस्कृत भाषा के संपर्क में आ रहे हैं और जैसे-जैसे उनका पाठ्यक्रम आगे बढ़ेगा वैसे-वैसे उनका संस्कृत भाषा से अधिकाधिक परिचय होता जाएगा। उन्हें संस्कृत भाषा बोझ नहीं लगेगी अपितु इसके सीखने में उन्हें आनन्द आने लगेगा। भाषा के साथ ही व्याकरण को भी समुचित महत्त्व दिया गया है और व्याकरण के नियमों को क्रमिक रूप से सिखाया गया है।
3. प्रायः संस्कृत शिक्षण में यह माना जाता है कि आरम्भ में ही छात्रों को संज्ञाओं और धातुओं की रूपावलियाँ रटा दी जाएँ। इससे भाषा शिक्षण एकदम अरुचिकर और उबाऊ हो जाता है। वे संस्कृत के वाक्यों, कहानियों, श्लोकों को बार-बार पढ़े। इस प्रकार वे नियमों को सहजरूप में आत्मसात् कर लेते हैं और उन्हें स्मरण करने के लिए उन्हें किसी प्रकार का अतिरिक्त प्रयास नहीं करना पड़ता।
4. इस पाठ्यक्रम में विषयवस्तु को भी क्रमिक रूप से प्रस्तुत किया गया है। व्याकरण का अनावश्यक विस्तार नहीं दिया गया है। व्याकरण के शिक्षण-बिन्दुओं को इस प्रकार प्रस्तुत किया गया है कि छात्र आरम्भ से ही वास्तविक संस्कृत वाक्यों को पढ़ना शुरू कर देते हैं वे स्वयं संस्कृत के वाक्य बनाने लगते हैं। सभी पाठों को छोटे-छोटे सुविधाजनक खंडों में विभाजित किया गया है। तीसरे पाठ के बाद से पाठ के प्रत्येक खंड के आरम्भ में उस खंड में पढ़ाए जाने वाले विषय के संकेत के लिएसं(संझा),वि.(विशेषण),क्रि.(क्रिया) आदि अक्षर दिए गए हैं ताकि उस खंड का विषय एक दृष्टि में ही पता चल जाए।
5. किसी भाषा को सीखने के लिए अभ्यास का विशेष महत्त्व होता है। प्रत्येक पाठ में पर्याप्त अभ्यास दिए गए हैं जिनके उत्तर पाठ के अंत में दे दिए गए हैं ताकि छात्र अपने द्वारा किए गए अभ्यासों का मिलान किसी बाहरी सहायता के बिना स्वयं कर सकें।
6. इस पाठ्यक्रम में संस्कृत भाषा के बोलचाल के रूप को भी सिखाने पर विशेष बल दिया गया है। आज यद्यपि बोलचाल के लिए संस्कृत का व्यवहार करने वाले लोगों की संख्या बहुत अधिक नहीं है, पर संस्कृत अभी पूर्णतया जीवन्त भाषा है क्योंकि संस्कृत भाषा में पाए जाने वाले विचार आज भी जन सामान्य की विचार धारा और जीवन पद्धति को प्रभावित करते हैं आगे भी ऐसा करते रहेंगे। कोई भी भाषा हमारे कानों और वाकयंत्र के माध्यम से हमारे अन्तःकरण में प्रवेश करती है। इसलिए इस पाठ्यक्रम में शुद्ध उच्चारण और मौखिक अभ्यास पर विशेष बल दिया गया है। आरम्भ से ही शब्दावली और वाक्यों के अभ्यास के लिए सरल वार्तालाप-अभ्यास दिए गए हैं। इससे उनमें संस्कृत भाषा का व्यवहार करने का आत्मविश्वास पैदा होता है। संस्कृत में श्लोकों के गायन का विशेष महत्त्व है। अधिकांश पाठों में चुने हुए श्लोक दिए गए हैं। छात्रों को इनके गायन के लिए प्रोत्साहित किया गया है।
7. अनुच्छेदों के नीचे नए संस्कृत शब्दों के अर्थ दिए गए हैं। पाठों के अन्त में सभी पाठों के कठिन शब्दों की शब्दावली दे दी गई है। जो अपरिचित शब्दों का अर्थ जानने में आपकी सहायता करेंगे।
8. संस्कृत भाषा अन्य सैकड़ों भाषाओं के समान ही एक भाषा मात्र नहीं है। इस भाषा में गहनतम आध्यात्मिक और बौद्धिक विचारों की परम्परा सुरक्षित है। संस्कृत के छात्र केवल संस्कृत भाषा ही सीखना नहीं चाहते अपितु वे इसमें अभिव्यक्त विचारों को भी जानना और आत्मसात् करना चाहते हैं। इस प्राचीन भाषा में कुछ ऐसे गहनतम और कालनिरपेक्ष विचार हैं जो विश्व में अन्यत्र कहीं भी उपलब्ध नहीं है।
                   इस प्रारम्भिक पाठ्यक्रम का निर्माण करते समय हमने इस बात का ध्यान रखा है कि छात्र इन गहनतम विचारों से परिचित हो सकें। हमें आशा है इस प्रारम्भिक पाठ्यक्रम को समाप्त करने के बाद छात्र भगवद् गीता, उपनिषदों के कुछ भागों को स्वयं पढ़ सकेंगे।  

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पाठ्यक्रम की विषय-सूची
पाठ-1
देवनागरी लिपि के स्वर और व्यंजन, ध्वनियों का वर्गीकरण, शुद्ध उच्चारण का महत्त्व।
पाठ-2
अकारान्त शब्दों में '' का उच्चारण, संयुक्ताक्षरों के विभिन्न रूप,
नासिक्य ध्वनियाँ, संयुक्ताक्षरों के पुराने रूप, संस्कृत वाक्य,
प्रार्थना।
पाठ-3
अकारान्त पुंलिंग, नपुंसकलिंग और आकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञाओं तथा
अस्मद्, युष्मद, तद्, एतद् सर्वनामों के प्रथमा (कर्ताकारक) और षष्ठी
विभक्ति (संबंध कारक) के रूप।
पाठ-4
अस् धातु के लट् लकार के रूप, शरीर के अंगों के संस्कृत नाम, संस्कृत के
विशेषण, 'हाँ-नहीं' उत्तरवाले प्रश्न, '' का प्रयोग, कुछ स्थानवाचक
अव्यय।
पाठ-5
गण की धातुओं का लट् लकार; अकारांत पुंलिंग और नपु. लिंग तथा आकारांत
स्त्री. संज्ञाओं की द्वितीया विभक्ति; सर्वनाम भवत् की प्रथमा और षष्ठी
विभक्ति, एक वार्तालाप।
पाठ-6
अस्मद्, युष्मद् तथा तद्, एतद्, किम्, यद् और सर्व की द्वितीया विभक्ति,
संस्कृत वाक्यों में शब्द-क्रम, भू-गण की कुछ और धातुएँ, यद् और तद् के
बीच सह-संबन्ध, समयवाचक अव्यय।
पाठ-7
अकारांत पुंलिंग व नपु. लिंग और आकारांत स्त्रीलिंग संज्ञाओं तथा
सर्वनामों के तृतीया, चतुर्थी और पंचमी विभक्तियों के रूप; एक वार्तालाप।
पाठ-8
दिव् गण की धातुए और कृ धातु के वर्तमान काल (लट् लकार) के रूप, संधि के
कुछ नियम, संस्कृत के तीन श्लोक, एक पत्र।
पाठ-9
अकारान्त पुंलिंग व नपु. लिंग और आकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञाओं और
सर्वनामों के सप्तमी और संबोधन के रूप तथा पूरी रूपावली।
पाठ-10
तुद्-गण और चुर्-गण की धातुएँ, धातुओं का अ-वर्ग, स्वर संधि के कुछ नियम,
एक वार्तालाप और श्लोक।
पाठ-11
उकारान्त और इकारान्त पुंलिंग संज्ञाएँ, इदम् और स्व सर्वनामों के रूप,
भूतकाल (लङ् लकार)।
पाठ-12
चित् और स्म निपात; संधि का एक नियम, तस्(त:) प्रत्यय, निजवाचक 'स्वयम्';
सिंह-शशकयो: कथा; एक वार्तालाप और दो श्लोक
पाठ-13
ईकारान्त और ऊकारान्त तथा इकारान्त और उकारान्त स्त्रीलिंग संज्ञाओं के
रूप; आत्मनेपद में वर्तमान काल (लट् लकार) और भूतकाल (लङ् लकार) के रूप।
पाठ-14
इकारान्त और उकारान्त नपुं. लिंग संज्ञाओं, विशेषणों और एक से दस तक
संख्याओं के रूप, स्वर संधि, एक वार्तालाप, दो श्लोक।
पाठ-15
लोट् लकार एवं विधिलिङ्; कथा-लोभस्य फलम्, प्रार्थना के दो श्लोक।
पाठ-16
सामान्य भविष्यत् काल (लृट्); धातुओं के सेट् और अनिट् वर्ग, कर्तृवाच्य
से कृत् प्रत्यय; त्वा, , 'चतुर: वानर:' कथा।
पाठ-17
कृदन्त तुम् प्रत्यय, कर्मवाच्य, सप्ताह के दिन, समय और ऋतु वाचक शब्द,
दिशाओं के नाम, पूरण संख्याएँ, कथा- 'दशम: त्वमसि'
पाठ-18
ऋकारान्त संज्ञाओं के रूप; भाववाच्य; कृत प्रत्यय- तव्य, अनीय, ; एक
संवाद, कथाऱ 'भर्तृहरे: वैराग्यम्'
पाठ-19
व्यंजनांत पुंलिंग और स्त्रीलिंग संज्ञाएँ तथा विशेषण; सम्राट् अशोक की
कहानी, गीता के चार श्लोक।
पाठ-20
व्यंजनांत नपुंसंक लिंग संज्ञाएँ और विशेषण, कर्मवाच्य का कृत् प्रत्यय त
और कर्तृवाच्य का कृत् प्रत्यय तवत्, मित्र को पत्र।

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