शनिवार, 1 जून 2019

संस्कृत भाषा को बढावा देने के लिए ऑटो चालक के बेटों ने उठाया संस्कृत के प्रसार का बीड़ा


संस्कृत भाषा को बढावा देने के लिए ऑटो चालक के बेटों ने उठाया संस्कृत के प्रसार का बीड़ा

उज्जैन : राघव और माधव दोनों जुड़वा भाई हैं । इनकी विशेषता यह है कि, ये आज के आम युवाओं से जुदा हैं । दोनों ने एक मिशन अपने हाथ में लिया है, जो अनूठा है । राघव और माधव की इच्छा है कि, देवभाषा संस्कृत का विस्तार हो और आगामी पीढ़ी इसमें संवाद करना सीखे । जुड़वा भाइयों ने इसके लिए दस दिन का कोर्स डिजाइन किया है । दोनों गांव-गांव जाकर देवभाषा का विस्तार करना चाहते हैं ।

राघव और माधव के पिता अनूप पंडित व इनकी माता आशा भी संस्कृत में एमए हैं । अनूप पहले बैंक में नौकरी करते थे । अब ऑटो रिक्शा चलाते हैं । अनूप बताते हैं कि, राघव और माधव की बचपन से ही संस्कृत में रूचि थी । दोनों घर पर संवाद भी इसी भाषा में करते हैं । इनकी रूचि को देखते हुए पहले बाल गंगाधर तिलक वेद विद्या प्रतिष्ठान मालीपुरा में दाखिला दिलाया । प्रारंभिक शिक्षा के बाद इन्हें श्री राज राजेश्वरी धाम धामनोद भेजा गया । यहां दोनों भाइयों ने राघवानंदजी महाराज से वेद और संस्कृत का ज्ञान लिया । पश्चात उज्जैन के पं. जगदीश चंद्र भट्ट ने दोनों को इस विद्या को प्रयोग में लाना सिखाया ।

फिलहाल दोनों भाई संस्कृत महाविद्यालय से शास्त्री की उपाधि प्राप्त कर रहे हैं । साथ ही बच्चों को निशुल्क संस्कृत की शिक्षा देते हैं । राघव और माधव ने बताया कि, उनकी इच्छा देवभाषा संस्कृत को देश के हर गांव तक ले जाने की है । वे चाहते हैं कि, देश का हर बच्चा अपनी मूल भाषा को जाने । इसके लिए दस दिन का एक कोर्स भी डिजाइन किया है । दस दिन में कोई भी व्यक्ति आसानी से संस्कृत में संवाद करना सीख सकता है । उपाधि प्राप्त होते ही देशभर में मिशन की शुरुआत कर दी जाएगी ।


बता दें कि, देवभाषा संस्कृत का विस्तार करने के लिए देश विदेश में बडी मात्रा में प्रयास जारी है । यूरोप के प्रमुख देश जर्मनी में पिछले कुछ वर्षों से संस्कृत को लेकर जो रूचि उत्पन्न होनी शुरू हुई थी, वह अब लगभग सच्चार्इ में परिवर्तित हो चुकी है ! सरलता से विश्वास नहीं होता, परन्तु यही सच है कि, वर्तमान में जर्मनी के १४ विश्वविद्यालयों में संस्कृत और भारतीय विद्याओं पर न केवल पढ़ाई चल रही है, बल्कि इसके लिए बाकायदा अलग से विभाग गठित किए गए हैं। इसी प्रकार ब्रिटेन के चार विश्वविद्यालय संस्कृत की पढ़ाई जारी रखे हुए हैं। यूनिवर्सिटी ऑफ हेडेलबर्ग के प्रोफ़ेसर अक्सेल माइकल्स बताते हैं कि, जब १५ वर्ष पहले हमने संस्कृत विभाग शुरू किया था, तो दो-तीन वर्षों में ही उसे बन्द करने के बारे में सोचने लगे थे। जबकि आज की स्थिति यह है कि, संस्कृत की पढ़ाई करने के इच्छुक यूरोपीय देशों से हमें इतने आवेदन मिल रहे हैं कि, हमें उन्हें मना करना पड़ रहा है कि, स्थान खाली नहीं है ! अभी तक ३४ देशों के २५४ छात्र संस्कृत का कोर्स कर रहे हैं और यह संख्या प्रतिवर्ष बढ़ती ही जा रही है !

प्रशासनिक उपेक्षा के बाद भी एक एेसा गांव जहां अनपढ़ भी बोलते हैं संस्कृत में

प्रशासनिक उपेक्षा के बाद भी एक एेसा गांव जहां अनपढ़ भी बोलते हैं संस्कृत में

राजगढ : बीते १४ वर्ष से संस्कृत को सामान्य बोलचाल में अपनाने वाले झिरी गांव में समय बीतने के साथ अब संस्कृत बोलने वालों की संख्या घटती जा रही है। इसके पीछे प्रशासनिक उपेक्षा को कारण बताया जा रहा है। वहीं गांव को संस्कृतभाषी बनाने की पृष्ठभूमि तैयार करने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कुछ पदाधिकारियों की मानें तो सरकार ग्रामीणों की रुचि को प्रोत्साहित ही नहीं कर सकी। लगभग १४ वर्ष से ग्रामीण गांव में संस्कृत विद्यालय खोलने की मांग कर रहे हैं परंतु सरकार ने इस मांग पर कोई पहल नहीं की।

हालांकि स्वयंसेवी अब भी हार मानने को तैयार नहीं है। गांव में ही सरकारी विद्यालय में जनभागीदारी से प्रतिदिन एक घंटे निःशुल्क संस्कृत संभाषण कक्षा लगाकर नई पीढ़ी को संस्कृत से जोड़ा जा रहा है। आरएसएस के प्रांतीय गौ सेवा प्रमुख उदयसिंह चौहान के अनुसार, गांव में वर्ष २००६-०७ में जिला प्रशासन द्वारा कराए गए सर्वे के अनुसार ७० प्रतिशत ग्रामीण निर्बाध गति से संस्कृत में संवाद करने लगे थे।

यह संख्या अब घटकर ५० प्रतिशत के आसपास रह गई है। आरएसएस के विभाग संघचालक लक्ष्मीनारायण चौहान के अुनसार ग्राम स्तर पर संस्कृत को बढ़ावा देने सरकार से कुछ नहीं मिला है, जो कुछ भी प्रयास हो रहे हैं, वह स्थानीय स्तर पर जनभागीदारी से किए जा रहे हैं।

कान्वेंट के बच्चों को भी दे रहे निःशुल्क संस्कृत शिक्षा
जनभागीदारी से प्रतिदिन सरकारी विद्यालय में सुबह ८ से ९ बजे तक निःशुल्क संस्कृत संभाषण कक्षाएं लगाई जा रही हैं। इसमें सामाजिक कार्यकर्ता शीला चौहान एवं पवित्रा चौहान आम विद्यार्थियों, युवाओं सहित कान्वेंट विद्यालयों में अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने वाले बच्चे भी संस्कृत सीखकर इसे सामान्य बोलचाल में अपना रहे हैं। सरस्वती शिशु मंदिर में एक कक्षा संस्कृत संभाषण की लग रही है।

गांव में लगभग १२५ परिवारों में लगभग ११०० लोग निवासरत हैं। इनमें ९० परिवार पिछड़ा वर्ग, ३५ परिवार अजा सहित एक-एक परिवार सामान्य एवं अजजा वर्ग के हैं। गांव की सरदारबाई (६२), कमलाबाई चौहान (६८) एवं सीमा चौहान (२६) सहित करीब दो दर्जन महिलाएं अनपढ़ होकर भी फर्राटेदार संस्कृत संभाषण करने में निपुण हो गई हैं। गांव का एक घर ऐसा है, जिसमें सभी सदस्य संस्कृत में संवाद करते हैं, उस घर को संस्कृत गृहम की उपाधि से नवाजा गया है।

ऐसे संभव हुआ यह सब
वर्ष २००३ में संस्कृत भारती के सहयोग से दो वर्ष के लिए विस्तारिका के रूप में महिला विमला पन्ना को यहां भेजा था। मूलतः छत्तीसगढ़ के जशपुर जिले के चोगलीबहार गांव की इस महिला ने गांव में नित्य सुबह, दोपहर एवं शाम को क्रमशः बच्चों, महिलाओं एवं पुरुष वर्ग को निःशुल्क संस्कृत संभाषण करना सिखाया। पन्ना बताती हैं कि महज ६ माह में ही गांव के ७० प्रतिशत लोग संस्कृत की सरलता को समझकर जीवनचर्या में उपयोग करने लगे। कुछ वर्षों बाद उनकी नौकरी शिक्षा विभाग में लग गई एवं संभाषण कक्षाओं का क्रम रुक गया। पन्ना अभी भ्याना के उच्च विद्यालय में संस्कृत की अध्यापिका हैं एवं झिरी में ही रहती हैं। उनके विषय संस्कृत में सभी बच्चों को ९० प्रतिशत से अधिक अंक मिलते हैं।

जहां समाज जाग्रत, वहां सो रही सरकार

संस्कृत भाषा को लेकर झिरी गांव के लोगों में खासी रुची है, संस्कृत के मामले में हम झिरी को देश में मॉडल के तौर पर विकसित करना चाहते हैं, लेकिन जहां समाज खड़ा रहता है, वहां सरकार सोती रहती है। हमारे साथ भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। संस्कृत को सामान्य बोलचाल की भाषा बनाने के लिए सरकार ने बीते चौदह वर्षों में सरकार गांव में एक संस्कृत विद्यालय तक नहीं खोल सकी है। प्रशासनिक उपेक्षा के शिकार होकर भी हमारा प्रयास निरंतर जारी है। सरकारी विद्यालय में प्रतिदिन सुबह 8 से 9 बजे तक निःशुल्क संस्कृत संभाषण कक्षाएं लगाकर गांव को पूरी तरह संस्कृत भाषी बनाना चाहते है।

संस्कृत दुनिया की सबसे स्पष्ट भाषा, मैं खुद संस्कृत बोलने की प्रैक्टिस करता हूँ : नासा प्रमुख।

संस्कृत दुनिया की सबसे स्पष्ट भाषा, मैं खुद संस्कृत बोलने की प्रैक्टिस करता हूँ : नासा प्रमुख।
क्या आपको पता है की नासा  प्रमुख रोबर्ट लाइटफुट जूनियर खुद संस्कृति बोलने की प्रैक्टिस करते है, और वो संस्कृत भाषा को सीख रहे है, उन्होंने संस्कृत पर कहा था की ये दुनिया की सबसे स्पष्ट भाषा है, और मुझे समझ में नहीं आता की भारतीयों ने इसके महत्त्व को क्यों नहीं समझा और इसे छोड़ दिया
आपको बता दें की पहले भारतवर्ष में संस्कृत ही बोली जाती थी पर आज बहुत ही कम लोग संस्कृत बोल पाते है, संस्कृत बोलने वालो की संख्या भारत में मात्र कुछ हज़ार में है, आज हम आपको संस्कृत के बारे में कुछ जानकारियां दे रहे है जिस से आपको गर्व होगा
1. संस्कृत को सभी भाषाओं की जननी माना जाता है।
2. संस्कृत उत्तराखंड की आधिकारिक भाषा है।
3. अरब लोगो की दखलंदाजी से पहले संस्कृत भारत की राष्ट्रीय भाषा थी।
4. NASA के मुताबिक, संस्कृत धरती पर बोली जाने वाली सबसे स्पष्ट भाषा है।
5. संस्कृत में दुनिया की किसी भी भाषा से ज्यादा शब्द है। वर्तमान में संस्कृत के शब्दकोष में 102 अरब 78 करोड़ 50 लाख शब्द है।
6. संस्कृत किसी भी विषय के लिए एक अद्भुत खजाना है।  जैसे हाथी के लिए ही संस्कृत में 100 से ज्यादा शब्द है।
7. NASA के पास संस्कृत में ताड़पत्रो पर लिखी 60,000 पांडुलिपियां है जिन पर नासा रिसर्च कर रहा है।
8. फ़ोबर्स मैगज़ीन ने जुलाई,1987 में संस्कृत को Computer Software के लिए सबसे बेहतर भाषा माना था।
9. किसी और भाषा के मुकाबले संस्कृत में सबसे कम शब्दो में वाक्य पूरा हो जाता है।
10. संस्कृत दुनिया की अकेली ऐसी भाषा है जिसे बोलने में जीभ की सभी मांसपेशियो का इस्तेमाल होता है।
11. अमेरिकन हिंदु युनिवर्सिटी के अनुसार संस्कृत में बात करने वाला मनुष्य बीपी, मधुमेह,कोलेस्ट्रॉल आदि रोग से मुक्त हो जाएगा। संस्कृत में बात करने से मानव शरीरका तंत्रिका तंत्र सदा सक्रिय रहता है जिससे कि व्यक्ति का शरीर सकारात्मक आवेश (PositiveCharges) के साथ सक्रिय हो जाता है।
12. संस्कृत स्पीच थेरेपी में भी मददगार है यह एकाग्रता को बढ़ाती है।
13. कर्नाटक के मुत्तुर गांव के लोग केवल संस्कृत में ही बात करते है।
14. सुधर्मा संस्कृत का पहला अखबार था, जो 1970 में शुरू हुआ था।
आज भी इसका ऑनलाइन संस्करण उपलब्ध है।
15. जर्मनी में बड़ी संख्या में संस्कृतभाषियो की मांग है।  जर्मनी की 14 यूनिवर्सिटीज़ में संस्कृत पढ़ाई जाती है।
16. नासा के वैज्ञानिकों के अनुसार जब वो अंतरिक्ष ट्रैवलर्स को मैसेज भेजते थे  तो उनके वाक्य उलट हो जाते थे। इस वजह से मैसेज का अर्थ ही बदल जाता था। उन्होंले कई भाषाओं का प्रयोग किया लेकिन हर बार यही समस्या आई।
आखिर में उन्होंने संस्कृत में मैसेज भेजा क्योंकि संस्कृत के वाक्य उल्टे  हो जाने पर भी अपना अर्थ नही बदलते हैं। जैसे - अहम् विद्यालयं गच्छामि।  विद्यालयं गच्छामि अहम्।  गच्छामिअहम् विद्यालयं । उक्त तीनो के अर्थ में कोई अंतर नहीं है।
17. आपको जानकर हैरानी होगी कि Computer द्वारा गणित के सवालो को हल करने वाली विधि यानि Algorithms संस्कृत में बने है ना कि अंग्रेजी में।
18. नासा के वैज्ञानिको द्वारा बनाए जा रहे 6th और 7th जेनरेशन Super Computers संस्कृतभाषा पर आधारित होंगे जो 2034 तक बनकर तैयार हो जाएंगे।
19. संस्कृत सीखने से दिमाग तेज हो जाता है और याद करने की शक्ति बढ़ जाती है।  इसलिए London और Ireland के कई स्कूलो में संस्कृत को Compulsory  Subject बना दिया है।
20. इस समय दुनिया के 17 से ज्यादा देशो की कम से कम एक University  में तकनीकी शिक्षा के कोर्सेस में संस्कृत पढ़ाई जाती है।

संस्कृत इतनी समृद्ध भाषा है की नासा के वैज्ञानिक भी इसका अध्यन करते है, उनका कहना होता है की संस्कृत भाषा में विज्ञान को और सरलता से समझा जा सकता है क्यूनि ये दुनिया की सबसे स्पष्ट भाषा है

संस्कृत मंत्रों के उच्चारण से बढती है स्मरणशक्ति – डॉ. जेम्स हार्टजेल, न्यूरो साइंटिस्ट, अमेरिका


संस्कृत मंत्रों के उच्चारण से बढती है स्मरणशक्ति – डॉ. जेम्स हार्टजेल, न्यूरो साइंटिस्ट, अमेरिका
हमें पता है कि संस्कृत हमारी प्राचीन भाषा है । हिन्दुआें के धर्मग्रंथ भी इसी भाषा में है । संस्कृत को हम देववाणी भी कहते है । प्राचीन काल में शिक्षा इसी भाषा में दी जाती थी । इसलिए प्राचीन काल के लोग संस्कारी, चारित्र्यवान, शिलवान, धर्मपरायण, कर्तव्यनिष्ठ थे। परंतु जैसे ही मेकॉले की शिक्षा पद्धती भारत में आर्इ, हमारी महान संस्कृत को हम भुल गए । मेकाॅले की मॉडर्न शिक्षाप्रणाली से समाज अधोगती की आेर जाता दिखार्इ दे रहा है। जिसके परिणाम आज हम देख रहे है कि, सभी आेर भ्रष्ठाचार, बलात्कार, व्यभीचार, घोटाले पनप रहे है । यह किसकी देन है ? आज जहां भारतीय अपनी प्राचीन संस्कृति तथा संस्कृत भाषा को पिछडापन मानकर पाश्चिमी सभ्यता को चुन रहे है, वही पश्चिमी लोग भारत की महान संस्कृती तथा संस्कृत भाषा की आेर आकर्षित हो रहे है । उसपर संशोधन कर रहे है एवं भारतीय संस्कृती की महानता विश्व के सामने ला रहे है । इसके कर्इ उदाहरण हमने देखे है । एेसा ही एक संशोधन आज हम देखेंगे । जिससे आपको अपने भारतीय होनेपर गर्व महसुस होगा । . . . तो आइए संस्कृत भाषा का महत्त्व समझकर उसे बढावा देने हेतु प्रयास करने का संकल्प करते है ।
एक अमेरिकी पत्रिका में दावा किया गया है कि, वैदिक मंत्रों को याद करने से दिमाग के उसे हिस्से में बढोतरी होती है जिसका काम संज्ञान लेना है, यानी की चीजों को याद करना है ।

जनसत्ता समाचारपत्र में छपे समाचार के अनुसार, डॉ. जेम्स हार्टजेल नाम के न्यूरो साइंटिस्ट के इस शोध को साइंटिफिक अमेरिकन नाम के जरनल ने प्रकाशित किया है । न्यूरो साइंटिस्ट डॉ. हार्टजेल ने अपने शोध के बाद ‘द संस्कृत इफेक्ट’ नाम का टर्म तैयार किया है । वह अपने रिपोर्ट में लिखते हैं कि भारतीय मान्यता यह कहती है कि वैदिक मंत्रों का लगातार उच्चारण करने और उसे याद करने का प्रयास करने से स्मरणशक्ति और सोच बढती है । इस धारणा की जांच के लिए डॉ. जेम्स और इटली के ट्रेन्टो यूनिवर्सिटी के उनके साथी ने भारत स्थित नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के डॉ. तन्मय नाथ और डॉ. नंदिनी चटर्जी के साथ टीम बनाई ।

द हिन्दू’ में छपी रिपोर्ट के अनुसार, एक्सपर्ट की इस टीम ने ४२ वॉलंटियर्स को चुना, जिनमें २१ प्रशिक्षित वैदिक पंडित (२२ साल) थे । इन लोगों ने ७ सालों तक शुक्ला यजुर्वेद के उच्चारण में पारंगत प्राप्त की थी । ये सभी पंडित देहली के एक वैदिक विद्यालय के थे । जबकि एक कॉलेज के छात्रों में २१ को संस्कृत उच्चारण के लिए चुना गया । इस टीम ने इन सभी ४२ प्रतिभागियों के ब्रेन की मैपिंग की । इसके लिए आधुनिक तकनीक का उपयोग किया गया । नेशनल ब्रेन रिसर्च सेंटर के पास मौजूद इस तकनीक से दिमाग के अलग अलग हिस्सों का आकार की जानकारी ली जा सकती है ।


टीम ने जब २१ पंडितों और २१ दूसरे वालंटियर्स के ब्रेन की मैपिंग की तो दोनों में काफी अंतर पाया गया । उन्होंने पाया कि वे छात्र जो संस्कृत उच्चारण में पारंगत थे उनके दिमाग का वो हिस्सा, जहां से याददाश्त, भावनाएं, निर्णय लेने की क्षमता नियंत्रित होती है, वो ज्यादा सघन था । इसमें ज्यादा अहम बात यह है कि दिमाग की संरचना में ये परिवर्तन तात्कालिक नहीं थे बल्कि वैज्ञानिकों के अनुसार, जो छात्र वैदिक मंत्रों के उच्चारण में पारंगत थे उनमें बदलाव लंबे समय तक रहने वाले थे । इसका अर्थ यह है कि संस्कृत में प्रशिक्षित छात्रों की याददाश्त, निर्णय लेने की क्षमता, अनुभूति की क्षमता लंबे समय तक कायम रहने वाली थी ।

संस्कृत भाषा की महानता व उपयोगिता जानकर आप भी रह जायेंगे दंग।


संस्कृत भाषा की महानता व उपयोगिता जानकर आप भी रह जायेंगे दंग
संस्कृत में 1700 धातुएं, 70 प्रत्यय और 80 उपसर्ग हैं, इनके योग से जो शब्द बनते हैं, उनकी संख्या 27 लाख 20 हजार होती है। यदि दो शब्दों से बने सामासिक शब्दों को जोड़ते हैं तो उनकी संख्या लगभग 769 करोड़ हो जाती है। संस्कृत इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज की सबसे प्राचीन भाषा है और सबसे वैज्ञानिक भाषा भी है। इसके सकारात्मक तरंगों के कारण ही ज्यादातर श्लोक संस्कृत में हैं। भारत में संस्कृत से लोगों का जुड़ाव खत्म हो रहा है लेकिन विदेशों में इसके प्रति रुझाान बढ़ रहा है।

ब्रह्मांड में सर्वत्र गति है। गति के होने से ध्वनि प्रकट होती है । ध्वनि से शब्द परिलक्षित होते हैं और शब्दों से भाषा का निर्माण होता है। आज अनेकों भाषायें प्रचलित हैं । किन्तु इनका काल निश्चित है कोई सौ वर्ष, कोई पाँच सौ तो कोई हजार वर्ष पहले जन्मी। साथ ही इन भिन्न भिन्न भाषाओं का जब भी जन्म हुआ, उस समय अन्य भाषाओं का अस्तित्व था। अतः पूर्व से ही भाषा का ज्ञान होने के कारण एक नयी भाषा को जन्म देना अधिक कठिन कार्य नहीं है। किन्तु फिर भी साधारण मनुष्यों द्वारा साधारण रीति से बिना किसी वैज्ञानिक आधार के निर्माण की गयी सभी भाषाओं मे भाषागत दोष दिखते हैं । ये सभी भाषाए पूर्ण शुद्धता,स्पष्टता एवं वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे की बातों को समझने के साधन मात्र के उद्देश्य से बिना किसी सूक्ष्म वैज्ञानिकीय चिंतन के बनाई गयी। किन्तु मनुष्य उत्पत्ति के आरंभिक काल में, धरती पर किसी भी भाषा का अस्तित्व न था।

 तो सोचिए किस प्रकार भाषा का निर्माण संभव हुआ होगा?

शब्दों का आधार ध्वनि है, तब ध्वनि थी तो स्वाभाविक है शब्द भी थे। किन्तु व्यक्त नहीं हुये थे, अर्थात उनका ज्ञान नहीं था ।

उदाहरणार्थ कुछ लोग कहते है कि अग्नि का आविष्कार फलाने समय में हुआ।

तो क्या उससे पहले अग्नि न थी महानुभावों? अग्नि तो धरती के जन्म से ही है किन्तु उसका ज्ञान निश्चित समय पर हुआ। इसी प्रकार शब्द व ध्वनि थे किन्तु उनका ज्ञान न था । तब उन प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य जीवन की आत्मिक एवं लौकिक उन्नति व विकास में शब्दो के महत्व और शब्दों की अमरता का गंभीर आकलन किया । उन्होने एकाग्रचित्त हो ध्वानपूर्वक, बार बार मुख से अलग प्रकार की ध्वनियाँ उच्चारित की और ये जानने में प्रयासरत रहे कि मुख-विवर के किस सूक्ष्म अंग से ,कैसे और कहाँ से ध्वनि जन्म ले रही है। तत्पश्चात निरंतर अथक प्रयासों के फलस्वरूप उन्होने परिपूर्ण, पूर्ण शुद्ध,स्पष्ट एवं अनुनाद क्षमता से युक्त ध्वनियों को ही भाषा के रूप में चुना । सूर्य के एक ओर से 9 रश्मिया निकलती हैं और सूर्य के चारो ओर से 9 भिन्न भिन्न रश्मियों के निकलने से कुल निकली 36 रश्मियों की ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने और इन 36 रश्मियो के पृथ्वी के आठ वसुओ से टकराने से 72 प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती हैं । जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन बने। इस प्रकार ब्रह्माण्ड से निकलने वाली कुल 108 ध्वनियों पर संस्कृत की वर्णमाला आधारित है। ब्रह्मांड की इन ध्वनियों के रहस्य का ज्ञान वेदों से मिलता है। इन ध्वनियों को नासा ने भी स्वीकार किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन ऋषि मुनियों को उन ध्वनियों का ज्ञान था और उन्ही ध्वनियों के आधार पर उन्होने पूर्णशुद्ध भाषा को अभिव्यक्त किया। अतः प्राचीनतम आर्य भाषा जो ब्रह्मांडीय संगीत थी उसका नाम "संस्कृत" पड़ा। संस्कृत – संस् + कृत् अर्थात श्वासों से निर्मित अथवा साँसो से बनी एवं स्वयं से कृत , जो कि ऋषियों के ध्यान लगाने व परस्पर-संप्रक से अभिव्यक्त हुयी।



Knowing the greatness and utility of

Sanskrit language, you will also be stunned.

कालांतर में पाणिनी ने नियमित व्याकरण के द्वारा संस्कृत को परिष्कृत एवं सर्वम्य प्रयोग में आने योग्य रूप प्रदान किया। पाणिनीय व्याकरण ही संस्कृत का प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है। दिव्य व दैवीय गुणों से युक्त, अतिपरिष्कृत, परमार्जित, सर्वाधिक व्यवस्थित, अलंकृत सौन्दर्य से युक्त , पूर्ण समृद्ध व सम्पन्न , पूर्णवैज्ञानिक देववाणी संस्कृत – मनुष्य की आत्मचेतना को जागृत करने वाली, सात्विकता में वृद्धि , बुद्धि व आत्मबलप्रदान करने वाली सम्पूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। अन्य सभी भाषाओ में त्रुटि होती है पर इस भाषा में कोई त्रुटि नहीं है। इसके उच्चारण की शुद्धता को इतना सुरक्षित रखा गया कि सहस्त्रों वर्षो से लेकर आज तक वैदिक मन्त्रों की ध्वनियों व मात्राओं में कोई पाठभेद नहीं हुआ और ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे बल्कि विश्व के आधुनिक विद्वानों और भाषाविदों ने भी एक स्वर में संस्कृत को पूर्णवैज्ञानिक एवं सर्वश्रेष्ठ माना है।

संस्कृत की सर्वोत्तम शब्द-विन्यास युक्ति के, गणित के, कंप्यूटर आदि के स्तर पर नासा व अन्य वैज्ञानिक व भाषाविद संस्थाओं ने भी इस भाषा को एकमात्र वैज्ञानिक भाषा मानते हुये इसका अध्ययन आरंभ कराया है और भविष्य में भाषा-क्रांति के माध्यम से आने वाला समय संस्कृत का बताया है। अतः अंग्रेजी बोलने में बड़ा गौरव अनुभव करने वाले, अंग्रेजी में गिटपिट करके गुब्बारे की तरह फूल जाने वाले कुछ महाशय जो संस्कृत में दोष गिनाते हैं उन्हें कुँए से निकलकर संस्कृत की वैज्ञानिकता का एवं संस्कृत के विषय में विश्व के सभी विद्वानों का मत जानना चाहिए।

नासा को हमने खड़ा नहीं किया है अपनी तारीफ करवाने के लिए…नासा की वेबसाईट पर जाकर संस्कृत का महत्व क्या है पढ़ लो ।

काफी शर्म की बात है कि भारत की भूमि पर ऐसे खरपतवार पैदा हो रहे हैं जिन्हें अमृतमयी वाणी संस्कृत में दोष व विदेशी भाषाओं में गुण ही गुण नजर आते हैं वो भी तब जब विदेशी भाषा वाले संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं ।

अतः जब हम अपने बच्चों को कई विषय पढ़ा सकते हैं तो संस्कृत पढ़ाने में संकोच नहीं करना चाहिए। देश विदेश में हुये कई शोधो के अनुसार संस्कृत मस्तिष्क को काफी तीव्र करती है जिससे अन्य भाषाओं व विषयों को समझने में काफी सरलता होती है , साथ ही यह सत्वगुण में वृद्धि करते हुये नैतिक बल व चरित्र को भी सात्विक बनाती है। अतः सभी को यथायोग्य संस्कृत का अध्ययन करना चाहिए।

आज दुनिया भर में लगभग 6900 भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन भाषाओं की जननी कौन है?

नहीं?

कोई बात नहीं आज हम आपको दुनिया की सबसे पुरानी भाषा के बारे में विस्तृत जानकारी देने जा रहे हैं।

दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है :- संस्कृत भाषा ।

आइये जाने संस्कृत भाषा का महत्व :

संस्कृत भाषा के विभिन्न स्वरों एवं व्यंजनों के विशिष्ट उच्चारण स्थान होने के साथ प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के सात ऊर्जा चक्रों में से एक या एक से अधिक चक्रों को निम्न प्रकार से प्रभावित करके उन्हें क्रियाशील – उर्जीकृत करता है :-

मूलाधार चक्र – स्वर '' एवं क वर्ग का उच्चारण मूलाधार चक्र पर प्रभाव डाल कर उसे क्रियाशील एवं सक्रिय करता है।

        स्वर '' तथा च वर्ग का उच्चारण स्वाधिष्ठान चक्र को उर्जीकृत  करता है।

        स्वर  '' तथा ट वर्ग का उच्चारण मणिपूरक चक्र को सक्रिय एवं उर्जीकृत करता है।

       स्वर  'लृ' तथा त वर्ग का उच्चारण अनाहत चक्र को प्रभावित करके उसे उर्जीकृत एवं सक्रिय करता है।

        स्वर '' तथा प वर्ग का उच्चारण विशुद्धि चक्र को प्रभावित करके उसे सक्रिय करता है।

    ईषत्  स्पृष्ट  वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से आज्ञा चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रियता प्रदान करता  है।

     ईषत् विवृत वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से

सहस्त्राधार चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रिय करता है।

इस प्रकार देवनागरी लिपि के  प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के किसी न किसी उर्जा चक्र को सक्रिय करके व्यक्ति की चेतना के स्तर में अभिवृद्धि करता है। वस्तुतः संस्कृत भाषा का प्रत्येक शब्द इस प्रकार से संरचित (design) किया गया है कि उसके स्वर एवं व्यंजनों के मिश्रण (combination) का उच्चारण करने पर वह हमारे विशिष्ट ऊर्जा चक्रों को प्रभावित करे। प्रत्येक शब्द स्वर एवं व्यंजनों की विशिष्ट संरचना है जिसका प्रभाव व्यक्ति की चेतना पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसीलिये कहा गया है कि व्यक्ति को शुद्ध उच्चारण के साथ-साथ बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए। शब्दों में शक्ति होती है जिसका दुरूपयोग एवं सदुपयोग स्वयं पर एवं दूसरे पर प्रभाव डालता है। शब्दों के प्रयोग से ही व्यक्ति का स्वभाव, आचरण, व्यवहार एवं व्यक्तित्व निर्धारित होता है।

उदाहरणार्थ जब 'राम' शब्द का उच्चारण किया जाता है है तो हमारा अनाहत चक्र जिसे ह्रदय चक्र भी कहते है सक्रिय होकर उर्जीकृत होता है। 'कृष्ण' का उच्चारण मणिपूरक चक्र – नाभि चक्र को सक्रिय करता है। 'सोह्म' का उच्चारण दोनों 'अनाहत' एवं 'मणिपूरक' चक्रों को सक्रिय करता है।

वैदिक मंत्रो को हमारे मनीषियों ने इसी आधार पर विकसित किया है। प्रत्येक मन्त्र स्वर एवं व्यंजनों की एक विशिष्ट संरचना है। इनका निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शुद्ध उच्चारण ऊर्जा चक्रों को सक्रिय करने के साथ साथ मष्तिष्क की चेतना को उच्चीकृत करता है। उच्चीकृत चेतना के साथ व्यक्ति विशिष्टता प्राप्त कर लेता है और उसका कहा हुआ अटल होने के साथ-साथ अवश्यम्भावी होता है। शायद आशीर्वाद एवं श्राप देने का आधार भी यही है। संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता एवं सार्थकता इस तरह स्वयं सिद्ध है।

भारतीय शास्त्रीय संगीत के सातों स्वर हमारे शरीर के सातों उर्जा चक्रों से जुड़े हुए हैं । प्रत्येक का उच्चारण सम्बंधित उर्जा चक्र को क्रियाशील करता है। शास्त्रीय राग इस प्रकार से विकसित किये गए हैं जिससे उनका उच्चारण / गायन विशिष्ट उर्जा चक्रों को सक्रिय करके चेतना के स्तर को उच्चीकृत करे। प्रत्येक राग मनुष्य की चेतना को विशिष्ट प्रकार से उच्चीकृत करने का सूत्र (formula) है। इनका सही अभ्यास व्यक्ति को असीमित ऊर्जावान बना देता है।

संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं। घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है। ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है। जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।

संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ? यह विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है। चार महत्वपूर्ण विशेषताएँ:- 1. अनुस्वार (अं ) और विसर्ग (अ:): संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं -यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि। नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं-यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।

विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भवरे की तरह गुंजन करना होता है और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा । जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- " राम फल खाता है"इसको संस्कृत में बोला जायेगा- " राम: फलं खादति"=राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है। संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना होता है ।

2.शब्द-रूप:-संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं- यथा:- रम् (मूल धातु)-राम: रामौ रामा:;रामं रामौ रामान् ;रामेण रामाभ्यां रामै:; रामाय रामाभ्यां रामेभ्य: ;रामत् रामाभ्यां रामेभ्य:; रामस्य रामयो: रामाणां; रामे रामयो: रामेषु ;हे राम ! हेरामौ ! हे रामा : ।ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है और इन 25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है। सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं -आत्मा (पुरुष), (अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार, (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण, (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्, (तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द,( महाभूत 5) पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश।

3.द्विवचन:-संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है। जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

4. सन्धि:-संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।"इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

यथा:- 1 इत्यहं जानामि। 2 अहमिति जानामि। 3 जानाम्यहमिति । 4 जानामीत्यहम्। इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं नीरोग हो जाता है। इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं।

अमरभाषा है संस्कृत

संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है।

संस्कृत के एक वैज्ञानिक भाषा होने का पता उसके किसी वस्तु को संबोधन करने वाले शब्दों से भी पता चलता है। इसका हर शब्द उस वस्तु के बारे में, जिसका नाम रखा गया है, के सामान्य लक्षण और गुण को प्रकट करता है। ऐसा अन्य भाषाओं में बहुत कम है। पदार्थों के नामकरण ऋषियों ने वेदों से किया है और वेदों में यौगिक शब्द हैं और हर शब्द गुण आधारित हैं ।

इस कारण संस्कृत में वस्तुओं के नाम उसका गुण आदि प्रकट करते हैं। जैसे हृदय शब्द। हृदय को अंगेजी में हार्ट कहते हैं और संस्कृत में हृदय कहते हैं।

अंग्रेजी वाला शब्द इसके लक्षण प्रकट नहीं कर रहा, लेकिन संस्कृत शब्द इसके लक्षण को प्रकट कर इसे परिभाषित करता है। बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 में हृदय शब्द का अक्षरार्थ इस प्रकार किया है- तदेतत् र्त्यक्षर हृदयमिति, हृ इत्येकमक्षरमभिहरित, द इत्येकमक्षर ददाति, य इत्येकमक्षरमिति।

अर्थात हृदय शब्द हृ, हरणे द दाने तथा इण् गतौ इन तीन धातुओं से निष्पन्न होता है। हृ से हरित अर्थात शिराओं से अशुद्ध रक्त लेता है, द से ददाति अर्थात शुद्ध करने के लिए फेफड़ों को देता है और य से याति अर्थात सारे शरीर में रक्त को गति प्रदान करता है। इस सिद्धांत की खोज हार्वे ने 1922 में की थी, जिसे हृदय शब्द स्वयं लाखों वर्षों से उजागर कर रहा था ।

संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द रूप बनाए जाते, जो उन्हें व्याकरणीय अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूल शब्द के अंत में प्रत्यय लगाकर बनाए जाते हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अंतःश्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को महापुरुषों ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है। संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। देवनागरी लिपि वास्तव में संस्कृत के लिए ही बनी है, इसलिए इसमें हरेक चिन्ह के लिए एक और केवल एक ही ध्वनि है।

देवनागरी में 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं। संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं, बल्कि संस्कारित भाषा भी है, अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है, जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं, बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।

विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का प्रायः एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं। सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। संस्कृत भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है संधि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं, तो वहां संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इसे कम्प्यूटर अर्थात कृत्रिम बुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है। शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। 


संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं, जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं।  इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएं ग्रहण करने में सहायता मिलती है। वैदिक ग्रंथों की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरंतर होती आ रही है। संस्कृत केवल एक भाषा मात्र नहीं है, अपितु एक विचार भी है। संस्कृत एक भाषा मात्र नहीं, बल्कि एक संस्कृति है और संस्कार भी है। संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है और वसुधैव कुटुंबकम की भावना भी है ।