शनिवार, 28 अक्तूबर 2017

दुर्ग (छत्तीसगढ) : यहां संस्कृत होगी बोलचाल की भाषा, ऐसे हो रहे प्रयास !

दुर्ग (छत्तीसगढ) : यहां संस्कृत होगी बोलचाल की भाषाऐसे हो रहे प्रयास !

                      देवभाषा संस्कृत को बढावा देनेवाले संस्कृत विद्यामंडलम् तथा छत्तीसगढ सरकार का अभिनंदन ! भारत के अन्य राज्य भी इनका अनुकरण करेयही हिन्दूआें की अपेक्षा है । – संपादकहिन्दूजागृति

                      दुर्गभिलाई : अब वह दिन दूर नहीं जब लोग बोलचाल की भाषा में संस्कृत का इस्तेमाल करेंगे ! संस्कृत को आम भाषा बनाने के लिए दुर्ग जिले में २० जनभाषा केन्द्र खोले जा रहे है। प्रदेश में दुर्ग जिले में इसकी शुरुआत पहली बार की जा रही है !
संस्कृत विद्यामंडलम्‌ और जिला शिक्षा विभाग ने इसे सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है। इस जनभाषा केन्द्र की कार्ययोजना जिला शिक्षा अधिकारी आशुतोष चावरे और संस्कृत विद्यामंडलम्‌ के सदस्य आचार्य नीलेश शर्मा ने तैयार की है। शिक्षामंत्री केदार कश्यप के समक्ष कार्य योजना का प्रस्ताव दिया गया था।
                     प्रस्ताव को मंत्री ने अनुशंसित कर विद्यामंडलम्‌ को भेजी। इन केन्द्रों में दुर्ग जिला शिक्षा विभाग के संस्कृत विषय विशेषज्ञ शिक्षकों की खास भूमिका रहेगी। दुर्ग जिले के १८६ संस्कृत शिक्षकों में से ऐसे २२ शिक्षकों का चयन किया गया हैजिन्हें संस्कृत में महारत हासिल है। खास बात यह है कि ये शिक्षक समाजसेवी के रूप में जनभाषा केन्द्र का संचालन करेंगे और कोई शुल्क नहीं लेंगे।

आगच्छतुउपविशतु जैसे बोलचाल की होगी भाषा
                 जनभाषा केन्द्र में बोलचाल की भाषा इस तरह लोगों को सिखाई जाएगी। मसलन आइए को आगच्छतु कहेंगे। बैठिए को उपविशतुनमस्कार को नमोनमःधन्यवाद को धन्यवादःखाईए को खादतुग्रहण कीजिए को स्वीकारयतु जैसे बोलचाल भाषा होगी।
आसपास के बच्चेयुवा हो या कोई भी व्यक्ति उन्हें इस केन्द्र से जोड़ेंगे और संस्कृत के ऐसे ही शब्दों की सीख देंगे। जनभाषा केन्द्र गांवों और बस्तियों में शुरू की जा रही है। यहां किसी भी सार्वजनिक भवन में यह केन्द्र हर दिन शाम को दो से तीन घंटे चलेगा।
चयनित संस्कृत शिक्षक इन केन्द्रों को ऐसे युवक के सौंप देंगे जो इसका नियमित व बेहतर संचालन आगे करता रहे। संस्कृत शिक्षक फिर दूसरी जगह केन्द्र शुरू करेंगे। यह सतत प्रक्रिया चलती रहेगी और लोगों के बीच इस तरह संस्कृत प्रचलन में आता रहेगा।

इन स्थानों पर संस्कृत जनभाषा केन्द्र
                 तिलक स्कूल दुर्गबोरईखुर्सीपाररिसाली भिलाईबोरसी दुर्गवैशालीनगर भिलाईमेड़ेसराजामुलअंजोराखकुरूदसेलूदजामगांव आरखुड़मुड़ीजामगांव एमभनसुलीबिरेझरबोरीरानीतराईओदरहागहनखपरीलिटिया में संस्कृत जनभाषा केंद्र खुलेंगे।
जनभाषा केन्द्र खुलने से होंगे और भी फायदे
१.     ग्यारहवी और बारहवी में संस्कृत वैकल्पिक विषय होने के बाद दसवीं उत्तीर्ण ७० प्रतिशत बच्चे यह विषय छोड़ देते हैं !
२.     वर्तमान में दुर्ग जिले में ६ शासकीय संस्कृत विद्यालय चल रहे है। जहां वर्तमान में ३८५ विद्यार्थी पढ़ते हैं !
३.     छठवी से दसवीं तक सभी विद्यार्थी संस्कृत विषय अनिवार्य रूप से पढ़ रहे है। जिले में करीब एक लाख विद्यार्थी इस विषय को पढ़ रहे है !

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

संस्कृतनाटक

त्रयः मत्स्याः
दृश्यम् 1
समुतिः— ह्रदोऽयं कियान् सुन्दरः.. अरण्यमिदं कियत् शान्तम्..
कालमतिः— आम्.. सत्यम्.. सुन्दरमेव ।
मन्दमतिः— म् म् म्..
समुतिः— वयं मित्राणि सर्वदा सुखेन अत्र भविष्यामः.. निर्मलेऽस्मिन् जले.. विहरन्तः.. खादन्तः.. हसन्तः.. खेलन्तः..। मन्दमतिः— तथा..। जल्पन्तः.. शयानाः...
समुतिः— वयं एकत्र भवामः, सप्रेम जीवामः किन्तु.. जाने कुतः.. तदापि कदाचित् भविष्यति सति विपत्तौ मम भयं भवति।
कालमतिः— अहं तु कालमनुसृत्य चरामि। त्वं सदा अधिकं चिन्तयसि..। अलं चिन्तया।
मन्दमतिः— आम्। वृथा त्रस्तः भवसि।
कालमतिः— सुमते, त्वं तु विजानासि सर्वम्। आपदः रक्षिष्यसि अस्मान्। सर्वदा तव परामर्शैरेव किल ह्रदे वयं सर्वे सुखेन भवामः। अधुना चिन्तां त्यज, आगच्छ, खेलामः।
समुतिः— आम्। अस्तु.. आगच्छ, मन्दमते.. ।
मन्दमतिः— म् म्

दृश्यम् 2
समुतिः— अद्य मम मनः खिद्यते। (किमपि श्रुण्वन्) तत्र कोऽपि वार्तालापं करोति। इतः पश्यामि। तत्र पुरुषौ किमपि सँल्लपतः। किं वा वदतः तौ? (श्रुणोति)
धीवरः 1— ह्रदोऽयं मत्स्यैः पूर्णः अस्ति। श्वः आगत्य अत्र जालैः मीनान् आहरामः।
धीवरः 2— आम्। अद्य तु जालं नानीतम्। याहि।
धीवरः 1— मत्स्यान् एतान् दृष्ट्वा गमनेच्छा नास्ति.. अधुनैव तान् गृहीत्वा निर्बध्य विक्रीय कियद्धनं लप्स्ये इति विचारेण नन्दामि..।
धीवरः 2— नन्द, नन्द। श्वः अन्यानपि धीवरान् आनयावः। अधिकस्याधिकं फलम्। आगच्छ.. चलावः।
(द्वौ निस्सरतः)
समुतिः— (सभयं) भगवन्, किमिदं..? मत्स्यबन्धकाः आगत्य अस्मान् धरिष्यन्ति.. अहो.. महापदो महापदः..
कालमतिः— किमभवत्? किं चिन्तयसि? किं भणसि आत्मनि..?
समुतिः— श्वः वयं सर्वे मरिष्यामः। आगच्छन्तु, ते मत्स्योपजीविनः आस्मान् धरिष्यन्ति। ह्रदे सर्वान् वद.. अविलम्बं चलामः इतः अन्यत्र।
कालमतिः— अहो, कियान् भीतो भवान्!! मास्तु भयः।
मन्दमतिः— सर्वं मृषा। न कोऽपि आगमिष्यति.. न किमपि करिष्यति वा।
समुतिः— अलं विवादेन। चलतु। मास्तु चर्चा। अवश्यं प्राणाः रक्षणीयाः।
कालमतिः— श्वः किल आपदः समयः!! श्वः पश्यामः.. कः क्लेशः? अहं तु कालानुगतो जीवी अस्मि।
मन्दमतिः— अहं तु कुत्रापि न गमिष्यामि। गच्छन्तु ये गमनेच्छुकाः। अहं धैर्यशाली।
समुतिः— बाढम्। अहं तु प्राणान् रक्षामि। ह्रदे ये अन्ये मत्स्याः, तानपि ज्ञापयामि। अन्यत्र सुरक्षितं स्थानमेष्यामि च।
कालमतिः— साधु..। गच्छ तात यथासुखम्।
मन्दमतिः— सर्वेऽत्र भयभीताः। अहं तु निश्चलः। इहि त्वमेकाकी।
समुतिः— मन्दः त्वम्। यदा ते कैवर्ताः आगत्य स्वेच्छां परिपूर्य, स्वकार्यं निर्वर्त्य निर्गमिष्यन्ति, तदा पुनरायामि। यदि जीवेयुः भवन्तः, तर्हि मिलिष्यामि।
कालमतिः— शुभं भूयात्तव।
मन्दमतिः— शुभमस्तु।
(सुमतिः निर्गच्छति)

दृश्यम् 3
धीवराः— अहो आनन्दः, अहो हर्षः.. सर्वे मत्स्याः अस्माकम्। गृह्णन्तु.. तत्र जालं क्षिपन्तु..। अरे मीन, कुत्र तरसि? आगच्छ, जाले पत। अहहहह अहहहह।
मीनाः— हा धिक्। आपदः, आपदः। विपन्ना वयम्। रक्ष रक्ष। इतः धाव। तत्र जालं नास्ति.. तत्र तर। हा अहो।
कालमतिः— यदुक्तं सुमत्या, तत् सत्यम्। अधुना किं वा कर्तव्यम्? कियद्दूरं धावामि? कथं रक्षामि..
(कश्चित् मात्स्यिकः कालमतिं धरति)
कालमतिः— अपेहि, त्यज। मां विसृज। गच्छ.. अहो, अहमपि पतितः जाले। अधुना को वा रक्षेन्माम्? सुमत्याः वचनं श्रोतव्यमासीत्।
मन्दमतिः— अहं न भीतः। अहं रक्षिष्यामि स्वम्। (कण्ठगतप्राणः विचलति)
कालमतिः— अयं तु भीतेर्विषयः मन्दमते। अहं तु उपायेन रक्षामि स्वप्राणान्। निर्गतप्राण इव आत्मानं दर्शयामि। त्वमपि तथा कुरु। श्वासमपि निर्बध्य तिष्ठ। मा चल।
मन्दमतिः— जलेन विना मम प्राणाः व्यपगच्छन्ति.. कथं वा अचलं तिष्ठेयम्?
कालमतिः— तूष्णीं भव। किमहं जलान्तः भवामि? ममापि सैव स्थितिः यथा तव। किन्तु प्राणान् रक्षितुमेव एष उपायः।
मन्दमतिः— अहो, धिक्, हा, अहो.. रक्ष। रक्ष।
कालमतिः— (आत्मनि) एषः बुद्धिहीनः। अहं तु विगतप्राणः इव नटामि। (तथैवाचरति अचलं च तिष्ठति)
मन्दमतिः— म्रियेऽहम्। मा धर माम्। त्यज। अपसृज।
धीवरः1— (मन्दमतिं दृष्ट्वा) सः न मृतोऽधुनापि। जाले एव भवतु सः। (कालमतिं दृष्ट्वा) मृतः एषः मत्स्यः। इमं द्रोण्यां क्षिप। (जालिकः तं द्रोण्यां क्षिपति)
कालमतिः— (आत्मनि) रक्षितोऽहम्। उपायः सफलो जातः। जालात् बहिः क्षिप्तोहं झटिति जले कूर्दामि, वेगन अन्तः तीर्त्वा आत्मानं रक्षामि च। (तथाचरति)
मन्दमतिः— हा धिङ्, मृतोऽहम्।
कालमतिः— (सदुःखम्) एषः मन्दभाग्यः मृतः। अन्तिमे क्षणेऽपि मूर्ख इवाचरितवान्। श्वः सुमतिः आगमिष्यति। तदानीं आवां द्वावेव भवावः। गतः एषः सुहृत्।
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संस्कृत नामानि

संस्कृत नामानि

अल्पाहारः(Tiffin)
Hotel - उपाहारशाला
Cantteen - उपाहारगृहम्
Tiffin center - उपाहारकेंद्रम्
Breakfast - प्रातराशः
Idly - शाल्यपूपः
Puri - पूरिका
Blackgram dosa - माषदोस
Moong dosa - मुद् गदोसा
Onion dosa - पलांडुदोसा
Masala dosa - सोपस्करदोसा
Wheet upama - गोधूमपिष्टिका
Vada - वटिका
Vada pav -वटिकरोटिका
Samosa - समाशः
Kachori - मुद् गपूर्णिका
Pani puri - जलपूरीका
Bread - मृदुरोटिका
Cake - स्निग्धपिष्टकम्
Biscuit - सुपिष्टकम्
Burger - शाकरोटिका
Pizza - पिष्टजा
Fruit jam - फलपाकः
Butter - नवनीतम्
Milk cream - मस्तु
Snacks - उपाहारः
Mirchi bajji - मरीचभर्जी
Brinjal bajji - वार्ताकभर्जी
Alu bajji - आलुकभर्जी
Chips - कासालुः
Pakodi - पक्ववटी
Palak pakodi - जीवन्तीपक्ववटी
Tamarind chutney -    तिन्त्रिण्युपसेचनम् 
Groundnut power - कलायचूर्णम्
Mirchi power - मरीचचूर्णम्
Ginger chutney - आर्द्रकोपसेचनम्
Sand witch - सम्पुटाशः
Alu chips with pounded rice  - आलुपृथुकम्
Tea centre - चायकेन्द्रम्
Tea party - सपीतिः
Milk - क्षीरम्
Tea powder -चायचूर्णम्
Coffee powder - काफीचूर्णम्
Decoction - क्वाथः
Sugar - शर्करा
Tea - चायम्
Coffee - काफी
Grean tea - हरितचायम्
Cold coffee - शीतलकापी
Cool drink - शीतलपानीयम्
Straw - नालम्
Honey - मधु
Fruit juice - फलरसः
Brittel milk - पीयूषः
Chocolate - चाकलेहः
Chewing gum - चर्वणकम्
Jaggery water -गुडपानकम्
Sharbath - फलपानीयम्
Soda water - विक्षारजलम्
Vegetable soup -शाकतरला
Sprouts - अङ्कुराः
Moong sprouts - मुद्गाङ्कुराः
Groundnut sprouts  - कलायांकुराः
Channa sprouts - चणकाङ्कुराः
Fluffed rice laddu - लाजमोदकम्
Pounded rice - पृथुकम्
Fluffed rice - लाजः
Fried chana - अभ्यूषः
Mango paste layer - आम्रमण्डकः
Shiraa - मोहनभोगः
Boondi laddu - लड्डुकम्
Ravva laddu -चुर्णलड्डुकम्
Besan laddu -कुट्टितलड्डुकम्
Motichur laddu - मुक्ताचूर्णलड्डूकम्
Poli(Holige) - पोलिकः
Atraasa - अतिरसः
Jilebi - अमृतशष्कुली
Mysorepak - मैसूरपिष्टकम्
Rasagulla - रसगोलकम्
Gulab jamun - पानकगोलकम्
Kova - गव्या
Kova cake - गव्यपिटकः
Agra halwa - आग्रारसवती
Kara boondi - क्षारबिन्दवः
Kara mixture - मिश्रितम्
Chakli - शष्कुली
Lunch - अहराशः
Dinner - नक्ताशः
Leaf plate - विस्तरी
Curry - व्यञ्जनम्
Dal curry - शाकसूपः
Dal - सूपः
Stuffed curry - सोपस्करशाकः
Fried roti - अङ्गाररोटिका
Wheet roti - गोधूमरोटिका
Jowari roti - जूर्णरोटिका
Ragi grain - कोद्रवकबलम्
Ragi roti - कोद्रवरोटिका
Oiled roti - तैलरोटिका
Rice - अन्नम्
Mango rice - आम्रोदनम्
Chitranna - चित्रान्नम्
Pulihora - कृसरान्नाम्
Fried rice -भर्जितान्नम्
Seasoned cooked rice - उपस्कृतोदनम्
Lemon rice - जंबीरोदनम्
Fried curry - भर्जितशाकम्
Sambar - क्वथितम्
Rasam - सारः
Chutuney - उपसेचनम्
Pickle - उपदंशः
Ghee - घृतम्
Paayasa - पायसम्
Saabakki paayasa - सागुपायसम्
Shaavige kheer - सूत्रिकापायसम्
Papad - पर्पटः
Moong papad - मुद्गपर्पटः
Disigned papad - परिकल्पवर्ध्यम्
Rice papad - सागुवर्ध्यम्
Vada - माषवटिका
Curd vada - दधिवटिका
Buttermilk - तक्रम्
Curd rice - दद्यन्नम्
Ice cream - पयोहिमम्
Lassi - स्वादुमथितम्

महिषासुर मर्दिनी स्त्रोत्तम्

अयि गिरिननि नंदितमेदिनि
विश्वविनोदिनि नंदनुते
गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि
विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि
दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि
किल्बिषमोषिणि घोषरते।

अयि गिरिननि नंदितमेदिनि
विश्वविनोदिनि नंदनुते
गिरिवर विंध्य शिरोधिनिवासिनि
विष्णुविलासिनि जिष्णुनुते।

भगवति हे शितिकण्ठकुटुंबिनि
भूरि कुटुंबिनि भूरि कृते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्य कपर्दिनि शैलसुते॥

सुरवरवर्षिणि दुर्धरधर्षिणि
दुर्मुखमर्षिणि हर्षरते
त्रिभुवनपोषिणि शंकरतोषिणि
किल्बिषमोषिणि घोषरते।

दनुज निरोषिणि दितिसुत रोषिणि
दुर्मद शोषिणि सिन्धुसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्य कपर्दिनि शैलसुते॥

अयि जगदंब मदंब कदंब
वनप्रिय वासिनि हासरते
शिखरि शिरोमणि तुङ्ग हिमालय
श्रृंग निजालय मध्यगते।

मधु मधुरे मधु कैटभ गंजिनि
कैटभ भंजिनि रासरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्य कपर्दिनि शैलसुते॥

अयि शतखण्ड विखण्डित रुण्ड
वितुण्डित शुण्ड गजाधिपते
रिपु गज गण्ड विदारण चण्ड
पराक्रम शुण्ड मृगाधिपते।

निज भुज दण्ड निपातित
खण्ड विपातित मुण्ड भटाधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

अयि रण दुर्मद शत्रु वधोदित
दुर्धर निर्जर शक्तिभृते
चतुर विचार धुरीण महाशिव
दूतकृत प्रमथाधिपते।

दुरित दुरीह दुराशय दुर्मति
दानव दूत कृतांतमते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

अयि शरणागत वैरि वधूवर
वीर वराभय दायकरे
त्रिभुवन मस्तक शूल विरोधि
शिरोधि कृतामल शूलकरे।

दुमिदुमि तामर दुंदुभिनाद
महो मुखरीकृत तिग्मकरे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

अयि निज हुँकृति मात्र निराकृत
धूम्र विलोचन धूम्र शते
समर विशोषित शोणित बीज
समुद्भव शोणित बीज लते।

शिव शिव शुंभ निशुंभ
महाहव तर्पित भूत पिशाचरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

धनुरनु संग रणक्षणसंग
परिस्फुर दंग नटत्कटके
कनक पिशंग पृषत्क निषंग
रसद्भट शृंग हतावटुके।

कृत चतुरंग बलक्षिति रंग
घटब्दहुरंग रटब्दटुके
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

जय जय जप्य जयेजय शब्द
परस्तुति तत्पर विश्वनुते
झण झण झिञ्जिमि झिंगकृत नूपुर
सिंजित मोहित भूतपते।

नटित नटार्ध नटी नट नायक
नाटित नाट्य सुगानरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

अयि सुमनः सुमनः सुमनः
सुमनः सुमनोहर कांतियुते
श्रित रजनी रजनी रजनी
रजनी रजनीकर वक्त्रवृते।

सुनयन विभ्रमर भ्रमर
भ्रमर भ्रमर भ्रमराधिपते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

सहित महाहव मल्लम तल्लिक
मल्लित रल्लक मल्लरते
विरचित वल्लिक पल्लिक मल्लिक
भिल्लिक भिल्लिक वर्ग वृते।

सितकृत पुल्लिसमुल्ल सितारुण
तल्लज पल्लव सल्ललिते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

अविरल गण्ड गलन्मद
मेदुर मत्त मतङ्गज राजपते
त्रिभुवन भूषण भूत कलानिधि
रूप पयोनिधि राजसुते।

अयि सुद तीजन लालसमानस
मोहन मन्मथ राजसुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

कमल दलामल कोमल कांति
कलाकलितामल भाललते
सकल विलास कलानिलयक्रम
केलि चलत्कल हंस कुले।

अलिकुल सङ्कुल कुवलय मण्डल
मौलिमिलद्भकुलालि कुले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

कर मुरली रव वीजित कूजित
लज्जित कोकिल मंजुमते
मिलित पुलिन्द मनोहर गुंजित
रंजितशैल निकुंज गते।

निजगुण भूत महाशबरीगण
सदगुण संभृत केलितले
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

कटितट पीत दुकूल विचित्र
मयूखतिरस्कृत चंद्र रुचे
प्रणत सुरासुर मौलिमणिस्फुर
दंशुल सन्नख चंद्र रुचे।

जित कनकाचल मौलिपदोर्जित
निर्भर कुंजर कुंभकुचे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

विजित सहस्रकरैक सहस्रकरैक
सहस्रकरैकनुते
कृत सुरतारक संगरतारक
संगरतारक सूनुसुते।

सुरथ समाधि समान समाधि
समाधि समाधि सुजातरते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

पदकमलं करुणानिलये वरिवस्यति
योऽनुदिनं स शिवे
अयि कमले कमलानिलये
कमलानिलयः स कथं न भवेत्।

तव पदमेव परंपदमित्यनुशीलयतो
मम किं न शिवे
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

कनकल सत्कल सिन्धु जलैरनु
सिंचिनुते गुण रंगभुवम
भजति स किं न शचीकुच कुंभ
तटी परिरंभ सुखानुभवम्।

तव चरणं शरणं करवाणि
नतामरवाणि निवासि शिवं
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

तव विमलेन्दुकुलं वदनेन्दुमलं
सकलं ननु कूलयते
किमु पुरुहूत पुरीन्दुमुखी
सुमुखीभिरसौ विमुखीक्रियते।

मम तु मतं शिवनामधने
भवती कृपया किमुत क्रियते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

अयि मयि दीनदयालुतया
कृपयैव त्वया भवितव्यमुमे
अयि जगतो जननी कृपयासि
यथासि तथानुमितासिरते।

यदुचितमत्र भवत्युररि
कुरुतादुरुतापमपा कुरुते
जय जय हे महिषासुरमर्दिनि
रम्यकपर्दिनि शैलसुते॥

शुक्रवार, 13 अक्तूबर 2017

संस्कृत के मंत्रों से कराई गई शादी अवैध : अनिल विज

संस्कृत के मंत्रों से कराई गई शादी अवैध : अनिल विज

हरियाणा सरकार के कैबिनेट मंत्री अनिल विज

नई देहली : इंडिया टीव्ही में आए समाचार के अनुसार, हरियाणा सरकार में स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी संभाल रहे अनिल विज ने कहा कि, संस्कृत के मंत्रों से कराए गई शादियां अवैध हैं । इस बयान के पीछे उन्होंने यह तर्क दिया कि, चूंकि संस्कृत दूल्हा और दुल्हन को समझ में नहीं आते इसलिए इस तरह की शादियों को वैध नहीं ठहराया जा सकता ।
संस्कृत समझ में नही आती इसलिए विवाह अवैध बताना बहुत ही हास्यास्पद है । विवाह अवैध ठहराने के बजाय मंत्रीजी सभी को संस्कृत पढाने के लिए प्रयास क्यो नहीं करते ? आज विदेशी लोग संस्कृत का महत्त्व जानकर संस्कृत सिखने का प्रयास कर रहे है आैर हम संस्कृत की उपेक्षा कर रहै है ।
आयरलैंड के एक विद्यालय में संस्कृत विभाग के अध्यक्ष Rutger Kortenhost ने संस्कृत का गुणगान करते हुए कहां है कि, संस्कृत क्यों ? इसका उत्तर देने से पहले हमें संस्कृत के गुणों पर ध्यान देना होगा। अपनी आवाज की सुमधुरता, उच्चारण की शुद्धता और रचना के सभी आयामों में संपूर्णता के कारण यह सभी भाषाओं से श्रेष्ठ है ! यही कारण है कि अन्य भाषाओं की भांति मौलिक रूप से कभी भी इसमें पूरा परिवर्तन नहीं हुआ। मनुष्य के इतिहास की सबसे पूर्ण भाषा होने के कारण इसमें परिवर्तन की कभी कोई आवश्यकता ही नहीं पड़ी… !"
बता दें कि, युरोपीय देशों में संस्कृत के प्रति रूचि बढ रही है । यूरोप के प्रमुख देश जर्मनी में पिछले कुछ वर्षों से संस्कृत को लेकर जो रूचि उत्पन्न होनी शुरू हुई थी, वह अब लगभग सच्चार्इ में परिवर्तित हो चुकी है ! सरलता से विश्वास नहीं होता, परन्तु यही सच है कि, वर्तमान में जर्मनी के १४ विश्वविद्यालयों में संस्कृत और भारतीय विद्याओं पर न केवल पढ़ाई चल रही है, बल्कि इसके लिए बाकायदा अलग से विभाग गठित किए गए हैं ।
हिन्दुआें की यही मांग है कि, संस्कृत की उपेक्षा करने के बजाय लोगों को संस्कृत सिखाने के लिए सरकार प्रयास करें, ताकी लोगों को इसकी महानता समझ में आए ।
भारत में भी कर्इ जगह संस्कृत को बढावा देने के लिए प्रयास हो रहा है । इस प्रयासो में उल्लेखनीय प्रयास है, लखनऊ के न‍िशातगंज में स्थित सब्जी मंडी का । सभी सब्ज‍ियों के नाम संस्कृत में ल‍िखे हैं । इसके ल‍िए मंडी में हर जगह बोर्ड भी लगाए गए हैं । यही नहीं, दुकानदार भी हमेशा सब्ज‍ियों के नाम संस्कृत में ही लेते हैं । इस मार्केट में रोजाना सब्जी खरीदनेवाले अब संस्कृत में सब्जी के भाव पूछते हैं और खरीदकर ले जाते हैं !

रविवार, 1 अक्तूबर 2017

संस्कृत में संभाषण क्योँ करना चाहिए ?

संस्कृत में संभाषण क्योँ करना चाहिए ?

                               संस्कृत में बात करने से संस्कृत भाषा का अभ्यास सरल और शीघ्र हो जाता है ! जो भाषा दैनिक व्यवहार में आती है वह बढती है और उसका विकास होत...
                               संस्कृत में बात करने से संस्कृत भाषा का अभ्यास सरल और शीघ्र हो जाता है ! जो भाषा दैनिक व्यवहार में आती है वह बढती है और उसका विकास होता है ! संस्कृत भाषा के विकास के लिए संस्कृत में व्यवहार अनिवार्य है ! लिखे हुए को पढने की अपेक्षा बोली हुई भाषा का श्रवण करने से उसका सरलता से बोध होता है ! ध्वनि, अभिनय, मुख के भाव और परिसर (वातावरण) आदि इसके कारण है ! अतः संस्कृत संभाषण से 'संस्कृत सरल है' जनमानस में इस भावना का निर्माण होगा ! संभाषण में चैतन्य होता है अतः अन्य व्यक्ति भी बोलने को उत्साहित होता है ! इस प्रकार संस्कृत भाषा व्यक्ति तक पहुँचती है ! जाति, मत, प्रदेशादि भेद-भाव के बिना ही सब लोगों को इसका ज्ञान होता है !
                               संस्कृत भाषा संस्कृति की वाहिका है ! इस कारण से यदि यह दैनिक व्यवहार में आती है तो संस्कृति के जीवनादर्शन भी व्यवहार में आयेंगे ! संस्कृत संभाषण से लोगों के ह्रदय में स्वाभिमान का निर्माण होता है ! समाज के उपेक्षित वर्ग, जो लोग बहुत समय से संस्कृत शिक्षण से वंचित रहे उनमे संस्कृत शिक्षण से बहुत परिवर्तन होता है ! समग्र देश के नगर व गाँव में संस्कृत संभाषण शिविर चलाने से ऐसा अनुभव हुआ है ! इस प्रकार सामाजिक समरसता लाने में, सामाजिक परिवर्तन करने में संस्कृत संभाषण की एक महत्वपूर्ण भूमिका होगी !
                               आज विद्यालयों में संस्कृत भाषा को अन्य भाषाओं (हिंदी, अंग्रेजी, तेलगु, फ़ारसी आदि) के माध्यम से पढ़ाया जाता है ! हिंदी, उर्दू, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच इत्यादि भाषाएँ उन्ही भाषाओँ के माध्यम से पढ़ाई जाती है ! इसी प्रकार संस्कृत भी संस्कृत के माध्यम से पढ़ाई जानी चाहिए तभी संस्कृत शिक्षण सरल होगा ! संस्कृत-शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन लाने के लिए संस्कृत संभाषण ही माध्यम हो सकता है !

संस्कृत संभाषण से ही संस्कृत शिक्षा क्षेत्र में परिवर्तन संभव है !


                               इस देश की अस्मिता का आधार इस देश की संस्कृति है ! अतः भारत के नवोत्थान के लिए, सांस्कृतिक पुनरुज्जीवन करना होगा ! अब जन जागरण के लिए, जन संगठन के लिए, जन शिक्षण के लिए और जन संस्कार के लिए संस्कृत संभाषण एक सशक्त एवं प्रमुख साधन है, जैसे स्वतंत्रता आन्दोलन में चरखा ! संस्कृत संभाषण एक होम्योपैथिक गोली की तरह है जो देखने में छोटी परन्तु उसका परिणाम दूरगामी है ! वह रोग के मूल को नष्ट कर देती है ! संभाषण ही संजीवनी है ! संस्कृत में संभाषण करना मानो वस्तुतः वह वाग्देवता की उपासना है, सुरसरस्वती का समाराधन है !

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

संस्कृत भाषा की महानता एवं उपयोगिता।




संस्कृत भाषा की महानता एवं उपयोगिता।

संस्कृत दिवस : 7 अगस्त



संस्कृत में 1700 धातुएं, 70 प्रत्यय और 80 उपसर्ग हैं, इनके योग से जो शब्द बनते हैं, उनकी संख्या 27 लाख 20 हजार होती है। यदि दो शब्दों से बने सामासिक शब्दों को जोड़ते हैं तो उनकी संख्या लगभग 769 करोड़ हो जाती है। संस्कृत इंडो-यूरोपियन लैंग्वेज की सबसे प्राचीन भाषा है और सबसे वैज्ञानिक भाषा भी है। इसके सकारात्मक तरंगों के कारण ही ज्यादातर श्लोक संस्कृत में हैं। भारत में संस्कृत से लोगों का जुड़ाव खत्म हो रहा है लेकिन विदेशों में इसके प्रति रुझाान बढ़ रहा है।

 ब्रह्मांड में सर्वत्र गति है। गति के होने से ध्वनि प्रकट होती है । ध्वनि से शब्द परिलक्षित होते हैं और शब्दों से भाषा का निर्माण होता है। आज अनेकों भाषायें प्रचलित हैं । किन्तु इनका काल निश्चित है कोई सौ वर्ष, कोई पाँच सौ तो कोई हजार वर्ष पहले जन्मी। साथ ही इन भिन्न भिन्न भाषाओं का जब भी जन्म हुआ, उस समय अन्य भाषाओं का अस्तित्व था। अतः पूर्व से ही भाषा का ज्ञान होने के कारण एक नयी भाषा को जन्म देना अधिक कठिन कार्य नहीं है। किन्तु फिर भी साधारण मनुष्यों द्वारा साधारण रीति से बिना किसी वैज्ञानिक आधार के निर्माण की गयी सभी भाषाओं मे भाषागत दोष दिखते हैं । ये सभी भाषाए पूर्ण शुद्धता,स्पष्टता एवं वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। क्योंकि ये सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे की बातों को समझने के साधन मात्र के उद्देश्य से बिना किसी सूक्ष्म वैज्ञानिकीय चिंतन के बनाई गयी। किन्तु मनुष्य उत्पत्ति के आरंभिक काल में, धरती पर किसी भी भाषा का अस्तित्व न था।

  तो सोचिए किस प्रकार भाषा का निर्माण संभव हुआ होगा?
शब्दों का आधार ध्वनि है, तब ध्वनि थी तो स्वाभाविक है शब्द भी थे। किन्तु व्यक्त नहीं हुये थे, अर्थात उनका ज्ञान नहीं था ।
उदाहरणार्थ कुछ लोग कहते है कि अग्नि का आविष्कार फलाने समय में हुआ।

   तो क्या उससे पहले अग्नि न थी महानुभावों? अग्नि तो धरती के जन्म से ही है किन्तु उसका ज्ञान निश्चित समय पर हुआ। इसी प्रकार शब्द व ध्वनि थे किन्तु उनका ज्ञान न था । तब उन प्राचीन ऋषियों ने मनुष्य जीवन की आत्मिक एवं लौकिक उन्नति व विकास में शब्दो के महत्व और शब्दों की अमरता का गंभीर आकलन किया । उन्होने एकाग्रचित्त हो ध्वानपूर्वक, बार बार मुख से अलग प्रकार की ध्वनियाँ उच्चारित की और ये जानने में प्रयासरत रहे कि मुख-विवर के किस सूक्ष्म अंग से ,कैसे और कहाँ से ध्वनि जन्म ले रही है। तत्पश्चात निरंतर अथक प्रयासों के फलस्वरूप उन्होने परिपूर्ण, पूर्ण शुद्ध,स्पष्ट एवं अनुनाद क्षमता से युक्त ध्वनियों को ही भाषा के रूप में चुना । सूर्य के एक ओर से 9 रश्मिया निकलती हैं और सूर्य के चारो ओर से 9 भिन्न भिन्न रश्मियों के निकलने से कुल निकली 36 रश्मियों की ध्वनियों पर संस्कृत के 36 स्वर बने और इन 36 रश्मियो के पृथ्वी के आठ वसुओ से टकराने से 72 प्रकार की ध्वनि उत्पन्न होती हैं । जिनसे संस्कृत के 72 व्यंजन बने। इस प्रकार ब्रह्माण्ड से निकलने वाली कुल 108 ध्वनियों पर संस्कृत की वर्णमाला आधारित है। ब्रह्मांड की इन ध्वनियों के रहस्य का ज्ञान वेदों से मिलता है। इन ध्वनियों को नासा ने भी स्वीकार किया है जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्राचीन ऋषि मुनियों को उन ध्वनियों का ज्ञान था और उन्ही ध्वनियों के आधार पर उन्होने पूर्णशुद्ध भाषा को अभिव्यक्त किया। अतः प्राचीनतम आर्य भाषा जो ब्रह्मांडीय संगीत थी उसका नाम "संस्कृत" पड़ा। संस्कृत संस् + कृत् अर्थात श्वासों से निर्मित अथवा साँसो से बनी एवं स्वयं से कृत , जो कि ऋषियों के ध्यान लगाने व परस्पर-संप्रक से अभिव्यक्त हुयी।

 कालांतर में पाणिनी ने नियमित व्याकरण के द्वारा संस्कृत को परिष्कृत एवं सर्वम्य प्रयोग में आने योग्य रूप प्रदान किया। पाणिनीय व्याकरण ही संस्कृत का प्राचीनतम व सर्वश्रेष्ठ व्याकरण है। दिव्य व दैवीय गुणों से युक्त, अतिपरिष्कृत, परमार्जित, सर्वाधिक व्यवस्थित, अलंकृत सौन्दर्य से युक्त , पूर्ण समृद्ध व सम्पन्न , पूर्णवैज्ञानिक देववाणी संस्कृत मनुष्य की आत्मचेतना को जागृत करने वाली, सात्विकता में वृद्धि , बुद्धि व आत्मबलप्रदान करने वाली सम्पूर्ण विश्व की सर्वश्रेष्ठ भाषा है। अन्य सभी भाषाओ में त्रुटि होती है पर इस भाषा में कोई त्रुटि नहीं है। इसके उच्चारण की शुद्धता को इतना सुरक्षित रखा गया कि सहस्त्रों वर्षो से लेकर आज तक वैदिक मन्त्रों की ध्वनियों व मात्राओं में कोई पाठभेद नहीं हुआ और ऐसा सिर्फ हम ही नहीं कह रहे बल्कि विश्व के आधुनिक विद्वानों और भाषाविदों ने भी एक स्वर में संस्कृत को पूर्णवैज्ञानिक एवं सर्वश्रेष्ठ माना है।


 संस्कृत की सर्वोत्तम शब्द-विन्यास युक्ति के, गणित के, कंप्यूटर आदि के स्तर पर नासा व अन्य वैज्ञानिक व भाषाविद संस्थाओं ने भी इस भाषा को एकमात्र वैज्ञानिक भाषा मानते हुये इसका अध्ययन आरंभ कराया है और भविष्य में भाषा-क्रांति के माध्यम से आने वाला समय संस्कृत का बताया है। अतः अंग्रेजी बोलने में बड़ा गौरव अनुभव करने वाले, अंग्रेजी में गिटपिट करके गुब्बारे की तरह फूल जाने वाले कुछ महाशय जो संस्कृत में दोष गिनाते हैं उन्हें कुँए से निकलकर संस्कृत की वैज्ञानिकता का एवं संस्कृत के विषय में विश्व के सभी विद्वानों का मत जानना चाहिए।
   नासा को हमने खड़ा नहीं किया है अपनी तारीफ करवाने के लिएनासा की वेबसाईट पर जाकर संस्कृत का महत्व क्या है पढ़ लो ।

 काफी शर्म की बात है कि भारत की भूमि पर ऐसे खरपतवार पैदा हो रहे हैं जिन्हें अमृतमयी वाणी संस्कृत में दोष व विदेशी भाषाओं में गुण ही गुण नजर आते हैं वो भी तब जब विदेशी भाषा वाले संस्कृत को सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं ।

 अतः जब हम अपने बच्चों को कई विषय पढ़ा सकते हैं तो संस्कृत पढ़ाने में संकोच नहीं करना चाहिए। देश विदेश में हुये कई शोधो के अनुसार संस्कृत मस्तिष्क को काफी तीव्र करती है जिससे अन्य भाषाओं व विषयों को समझने में काफी सरलता होती है , साथ ही यह सत्वगुण में वृद्धि करते हुये नैतिक बल व चरित्र को भी सात्विक बनाती है। अतः सभी को यथायोग्य संस्कृत का अध्ययन करना चाहिए।

 आज दुनिया भर में लगभग 6900 भाषाओं का प्रयोग किया जाता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इन भाषाओं की जननी कौन है?

 नहीं?

 कोई बात नहीं आज हम आपको दुनिया की सबसे पुरानी भाषा के बारे में विस्तृत जानकारी देने जा रहे हैं।
 दुनिया की सबसे पुरानी भाषा है :- संस्कृत भाषा ।

 आइये जाने संस्कृत भाषा का महत्व :
संस्कृत भाषा के विभिन्न स्वरों एवं व्यंजनों के विशिष्ट उच्चारण स्थान होने के साथ प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के सात ऊर्जा चक्रों में से एक या एक से अधिक चक्रों को निम्न प्रकार से प्रभावित करके उन्हें क्रियाशील उर्जीकृत करता है :-

 मूलाधार चक्र स्वर '' एवं क वर्ग का उच्चारण मूलाधार चक्र पर प्रभाव डाल कर उसे क्रियाशील एवं सक्रिय करता है।
        स्वर '' तथा च वर्ग का उच्चारण स्वाधिष्ठान चक्र को उर्जीकृत  करता है।
        स्वर  '' तथा ट वर्ग का उच्चारण मणिपूरक चक्र को सक्रिय एवं उर्जीकृत करता है।
       स्वर  'लृ' तथा त वर्ग का उच्चारण अनाहत चक्र को प्रभावित करके उसे उर्जीकृत एवं सक्रिय करता है।
        स्वर '' तथा प वर्ग का उच्चारण विशुद्धि चक्र को प्रभावित करके उसे सक्रिय करता है।
    ईषत्  स्पृष्ट  वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से आज्ञा चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रियता प्रदान करता  है।
     ईषत् विवृत वर्ग का उच्चारण मुख्य रूप से

 सहस्त्राधार चक्र एवं अन्य चक्रों को सक्रिय करता है।
इस प्रकार देवनागरी लिपि के  प्रत्येक स्वर एवं व्यंजन का उच्चारण व्यक्ति के किसी न किसी उर्जा चक्र को सक्रिय करके व्यक्ति की चेतना के स्तर में अभिवृद्धि करता है। वस्तुतः संस्कृत भाषा का प्रत्येक शब्द इस प्रकार से संरचित (design) किया गया है कि उसके स्वर एवं व्यंजनों के मिश्रण (combination) का उच्चारण करने पर वह हमारे विशिष्ट ऊर्जा चक्रों को प्रभावित करे। प्रत्येक शब्द स्वर एवं व्यंजनों की विशिष्ट संरचना है जिसका प्रभाव व्यक्ति की चेतना पर स्पष्ट परिलक्षित होता है। इसीलिये कहा गया है कि व्यक्ति को शुद्ध उच्चारण के साथ-साथ बहुत सोच-समझ कर बोलना चाहिए। शब्दों में शक्ति होती है जिसका दुरूपयोग एवं सदुपयोग स्वयं पर एवं दूसरे पर प्रभाव डालता है। शब्दों के प्रयोग से ही व्यक्ति का स्वभाव, आचरण, व्यवहार एवं व्यक्तित्व निर्धारित होता है। 

 उदाहरणार्थ जब 'राम' शब्द का उच्चारण किया जाता है है तो हमारा अनाहत चक्र जिसे ह्रदय चक्र भी कहते है सक्रिय होकर उर्जीकृत होता है। 'कृष्ण' का उच्चारण मणिपूरक चक्र नाभि चक्र को सक्रिय करता है। 'सोह्म' का उच्चारण दोनों 'अनाहत' एवं 'मणिपूरक' चक्रों को सक्रिय करता है।

 वैदिक मंत्रो को हमारे मनीषियों ने इसी आधार पर विकसित किया है। प्रत्येक मन्त्र स्वर एवं व्यंजनों की एक विशिष्ट संरचना है। इनका निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार शुद्ध उच्चारण ऊर्जा चक्रों को सक्रिय करने के साथ साथ मष्तिष्क की चेतना को उच्चीकृत करता है। उच्चीकृत चेतना के साथ व्यक्ति विशिष्टता प्राप्त कर लेता है और उसका कहा हुआ अटल होने के साथ-साथ अवश्यम्भावी होता है। शायद आशीर्वाद एवं श्राप देने का आधार भी यही है। संस्कृत भाषा की वैज्ञानिकता एवं सार्थकता इस तरह स्वयं सिद्ध है।


 भारतीय शास्त्रीय संगीत के सातों स्वर हमारे शरीर के सातों उर्जा चक्रों से जुड़े हुए हैं । प्रत्येक का उच्चारण सम्बंधित उर्जा चक्र को क्रियाशील करता है। शास्त्रीय राग इस प्रकार से विकसित किये गए हैं जिससे उनका उच्चारण / गायन विशिष्ट उर्जा चक्रों को सक्रिय करके चेतना के स्तर को उच्चीकृत करे। प्रत्येक राग मनुष्य की चेतना को विशिष्ट प्रकार से उच्चीकृत करने का सूत्र (formula) है। इनका सही अभ्यास व्यक्ति को असीमित ऊर्जावान बना देता है।


 संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं बल्कि संस्कारित भाषा है इसीलिए इसका नाम संस्कृत है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद् नहीं बल्कि महर्षि पाणिनि; महर्षि कात्यायिनि और योग शास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं। इन तीनों महर्षियों ने बड़ी ही कुशलता से योग की क्रियाओं को भाषा में समाविष्ट किया है। यही इस भाषा का रहस्य है । जिस प्रकार साधारण पकी हुई दाल को शुध्द घी में जीरा; मैथी; लहसुन; और हींग का तड़का लगाया जाता है;तो उसे संस्कारित दाल कहते हैं। घी ; जीरा; लहसुन, मैथी ; हींग आदि सभी महत्वपूर्ण औषधियाँ हैं। ये शरीर के तमाम विकारों को दूर करके पाचन संस्थान को दुरुस्त करती है।दाल खाने वाले व्यक्ति को यह पता ही नहीं चलता कि वह कोई कटु औषधि भी खा रहा है; और अनायास ही आनन्द के साथ दाल खाते-खाते इन औषधियों का लाभ ले लेता है। ठीक यही बात संस्कारित भाषा संस्कृत के साथ सटीक बैठती है। जो भेद साधारण दाल और संस्कारित दाल में होता है ;वैसा ही भेद अन्य भाषाओं और संस्कृत भाषा के बीच है।


 संस्कृत भाषा में वे औषधीय तत्व क्या है ? यह विश्व की तमाम भाषाओं से संस्कृत भाषा का तुलनात्मक अध्ययन करने से स्पष्ट हो जाता है। चार महत्वपूर्ण विशेषताएँ:- 1. अनुस्वार (अं ) और विसर्ग (अ:): संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण और लाभदायक व्यवस्था है, अनुस्वार और विसर्ग। पुल्लिंग के अधिकांश शब्द विसर्गान्त होते हैं -यथा- राम: बालक: हरि: भानु: आदि। नपुंसक लिंग के अधिकांश शब्द अनुस्वारान्त होते हैं-यथा- जलं वनं फलं पुष्पं आदि।

 विसर्ग का उच्चारण और कपालभाति प्राणायाम दोनों में श्वास को बाहर फेंका जाता है। अर्थात् जितनी बार विसर्ग का उच्चारण करेंगे उतनी बार कपालभाति प्रणायाम अनायास ही हो जाता है। जो लाभ कपालभाति प्रणायाम से होते हैं, वे केवल संस्कृत के विसर्ग उच्चारण से प्राप्त हो जाते हैं।उसी प्रकार अनुस्वार का उच्चारण और भ्रामरी प्राणायाम एक ही क्रिया है । भ्रामरी प्राणायाम में श्वास को नासिका के द्वारा छोड़ते हुए भवरे की तरह गुंजन करना होता है और अनुस्वार के उच्चारण में भी यही क्रिया होती है। अत: जितनी बार अनुस्वार का उच्चारण होगा , उतनी बार भ्रामरी प्राणायाम स्वत: हो जायेगा । जैसे हिन्दी का एक वाक्य लें- " राम फल खाता है"इसको संस्कृत में बोला जायेगा- " राम: फलं खादति"=राम फल खाता है ,यह कहने से काम तो चल जायेगा ,किन्तु राम: फलं खादति कहने से अनुस्वार और विसर्ग रूपी दो प्राणायाम हो रहे हैं। यही संस्कृत भाषा का रहस्य है। संस्कृत भाषा में एक भी वाक्य ऐसा नहीं होता जिसमें अनुस्वार और विसर्ग न हों। अत: कहा जा सकता है कि संस्कृत बोलना अर्थात् चलते फिरते योग साधना करना होता है ।

 2.शब्द-रूप:-संस्कृत की दूसरी विशेषता है शब्द रूप। विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का एक ही रूप होता है,जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 25 रूप होते हैं। जैसे राम शब्द के निम्नानुसार 25 रूप बनते हैं- यथा:- रम् (मूल धातु)-राम: रामौ रामा:;रामं रामौ रामान् ;रामेण रामाभ्यां रामै:; रामाय रामाभ्यां रामेभ्य: ;रामत् रामाभ्यां रामेभ्य:; रामस्य रामयो: रामाणां; रामे रामयो: रामेषु ;हे राम ! हेरामौ ! हे रामा : ।ये 25 रूप सांख्य दर्शन के 25 तत्वों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

 जिस प्रकार पच्चीस तत्वों के ज्ञान से समस्त सृष्टि का ज्ञान प्राप्त हो जाता है, वैसे ही संस्कृत के पच्चीस रूपों का प्रयोग करने से आत्म साक्षात्कार हो जाता है और इन 25 तत्वों की शक्तियाँ संस्कृतज्ञ को प्राप्त होने लगती है। सांख्य दर्शन के 25 तत्व निम्नानुसार हैं -आत्मा (पुरुष), (अंत:करण 4 ) मन बुद्धि चित्त अहंकार, (ज्ञानेन्द्रियाँ 5) नासिका जिह्वा नेत्र त्वचा कर्ण, (कर्मेन्द्रियाँ 5) पाद हस्त उपस्थ पायु वाक्, (तन्मात्रायें 5) गन्ध रस रूप स्पर्श शब्द,( महाभूत 5) पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश।

 3.द्विवचन:-संस्कृत भाषा की तीसरी विशेषता है द्विवचन। सभी भाषाओं में एक वचन और बहुवचन होते हैं जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। इस द्विवचन पर ध्यान दें तो पायेंगे कि यह द्विवचन बहुत ही उपयोगी और लाभप्रद है। जैसे :- राम शब्द के द्विवचन में निम्न रूप बनते हैं:- रामौ , रामाभ्यां और रामयो:। इन तीनों शब्दों के उच्चारण करने से योग के क्रमश: मूलबन्ध ,उड्डियान बन्ध और जालन्धर बन्ध लगते हैं, जो योग की बहुत ही महत्वपूर्ण क्रियायें हैं।

 4. सन्धि:-संस्कृत भाषा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता है सन्धि। ये संस्कृत में जब दो शब्द पास में आते हैं तो वहाँ सन्धि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। उस बदले हुए उच्चारण में जिह्वा आदि को कुछ विशेष प्रयत्न करना पड़ता है।ऐसे सभी प्रयत्न एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति के प्रयोग हैं।"इति अहं जानामि" इस वाक्य को चार प्रकार से बोला जा सकता है, और हर प्रकार के उच्चारण में वाक् इन्द्रिय को विशेष प्रयत्न करना होता है।

 यथा:- 1 इत्यहं जानामि। 2 अहमिति जानामि। 3 जानाम्यहमिति । 4 जानामीत्यहम्। इन सभी उच्चारणों में विशेष आभ्यंतर प्रयत्न होने से एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति का सीधा प्रयोग अनायास ही हो जाता है। जिसके फल स्वरूप मन बुद्धि सहित समस्त शरीर पूर्ण स्वस्थ एवं नीरोग हो जाता है। इन समस्त तथ्यों से सिद्ध होता है कि संस्कृत भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान की भाषा ही नहीं ,अपितु मनुष्य के सम्पूर्ण विकास की कुंजी है। यह वह भाषा है, जिसके उच्चारण करने मात्र से व्यक्ति का कल्याण हो सकता है। इसीलिए इसे देवभाषा और अमृतवाणी कहते हैं।

 अमरभाषा है संस्कृत
संस्कृत भाषा का व्याकरण अत्यंत परिमार्जित एवं वैज्ञानिक है।

 संस्कृत के एक वैज्ञानिक भाषा होने का पता उसके किसी वस्तु को संबोधन करने वाले शब्दों से भी पता चलता है। इसका हर शब्द उस वस्तु के बारे में, जिसका नाम रखा गया है, के सामान्य लक्षण और गुण को प्रकट करता है। ऐसा अन्य भाषाओं में बहुत कम है। पदार्थों के नामकरण ऋषियों ने वेदों से किया है और वेदों में यौगिक शब्द हैं और हर शब्द गुण आधारित हैं ।
इस कारण संस्कृत में वस्तुओं के नाम उसका गुण आदि प्रकट करते हैं। जैसे हृदय शब्द। हृदय को अंगेजी में हार्ट कहते हैं और संस्कृत में हृदय कहते हैं।

 अंग्रेजी वाला शब्द इसके लक्षण प्रकट नहीं कर रहा, लेकिन संस्कृत शब्द इसके लक्षण को प्रकट कर इसे परिभाषित करता है। बृहदारण्यकोपनिषद 5.3.1 में हृदय शब्द का अक्षरार्थ इस प्रकार किया है- तदेतत् र्त्यक्षर हृदयमिति, हृ इत्येकमक्षरमभिहरित, द इत्येकमक्षर ददाति, य इत्येकमक्षरमिति।
अर्थात हृदय शब्द हृ, हरणे द दाने तथा इण् गतौ इन तीन धातुओं से निष्पन्न होता है। हृ से हरित अर्थात शिराओं से अशुद्ध रक्त लेता है, द से ददाति अर्थात शुद्ध करने के लिए फेफड़ों को देता है और य से याति अर्थात सारे शरीर में रक्त को गति प्रदान करता है। इस सिद्धांत की खोज हार्वे ने 1922 में की थी, जिसे हृदय शब्द स्वयं लाखों वर्षों से उजागर कर रहा था ।


 संस्कृत में संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण और क्रिया के कई तरह से शब्द रूप बनाए जाते, जो उन्हें व्याकरणीय अर्थ प्रदान करते हैं। अधिकांश शब्द-रूप मूल शब्द के अंत में प्रत्यय लगाकर बनाए जाते हैं। इस तरह यह कहा जा सकता है कि संस्कृत एक बहिर्मुखी-अंतःश्लिष्टयोगात्मक भाषा है। संस्कृत के व्याकरण को महापुरुषों ने वैज्ञानिक स्वरूप प्रदान किया है। संस्कृत भारत की कई लिपियों में लिखी जाती रही है, लेकिन आधुनिक युग में देवनागरी लिपि के साथ इसका विशेष संबंध है। देवनागरी लिपि वास्तव में संस्कृत के लिए ही बनी है, इसलिए इसमें हरेक चिन्ह के लिए एक और केवल एक ही ध्वनि है।

 देवनागरी में 13 स्वर और 34 व्यंजन हैं। संस्कृत केवल स्वविकसित भाषा नहीं, बल्कि संस्कारित भाषा भी है, अतः इसका नाम संस्कृत है। केवल संस्कृत ही एकमात्र भाषा है, जिसका नामकरण उसके बोलने वालों के नाम पर नहीं किया गया है। संस्कृत को संस्कारित करने वाले भी कोई साधारण भाषाविद नहीं, बल्कि महर्षि पाणिनि, महर्षि कात्यायन और योगशास्त्र के प्रणेता महर्षि पतंजलि हैं।

 विश्व की सभी भाषाओं में एक शब्द का प्रायः एक ही रूप होता है, जबकि संस्कृत में प्रत्येक शब्द के 27 रूप होते हैं। सभी भाषाओं में एकवचन और बहुवचन होते हैं, जबकि संस्कृत में द्विवचन अतिरिक्त होता है। संस्कृत भाषा की सबसे महत्त्वपूर्ण विशेषता है संधि। संस्कृत में जब दो अक्षर निकट आते हैं, तो वहां संधि होने से स्वरूप और उच्चारण बदल जाता है। इसे कम्प्यूटर अर्थात कृत्रिम बुद्धि के लिए सबसे उपयुक्त भाषा माना जाता है। शोध से ऐसा पाया गया है कि संस्कृत पढ़ने से स्मरण शक्ति बढ़ती है। 


 संस्कृत ही एक मात्र साधन हैं, जो क्रमशः अंगुलियों एवं जीभ को लचीला बनाते हैं।  इसके अध्ययन करने वाले छात्रों को गणित, विज्ञान एवं अन्य भाषाएं ग्रहण करने में सहायता मिलती है। वैदिक ग्रंथों की बात छोड़ भी दी जाए, तो भी संस्कृत भाषा में साहित्य की रचना कम से कम छह हजार वर्षों से निरंतर होती आ रही है। संस्कृत केवल एक भाषा मात्र नहीं है, अपितु एक विचार भी है। संस्कृत एक भाषा मात्र नहीं, बल्कि एक संस्कृति है और संस्कार भी है। संस्कृत में विश्व का कल्याण है, शांति है, सहयोग है और वसुधैव कुटुंबकम की भावना भी है ।